चीन के जासूसों की तलाश

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    अमरीका ने चीन के ख़िलाफ़ एक बड़ा अभियान छेड़ा हुआ है. ये अभियान चीन की कारोबारी ख़ुफ़िया जानकारियां चुराने के ख़िलाफ़ है.

    अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि चीन की सरकार अपनी कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए पश्चिमी देशों से तकनीकी जानकारियों की चोरी कर रहा है, ताकि मुक़ाबले में आगे निकल सके.

    पर, ब्रिटेन में चीन की इस चोरी के ख़िलाफ़ अमरीका जैसा कोई अभियान नहीं चल रहा है.
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    वो गहरा राज़

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    ये बात एक अप्रैल 2018 की है. ईस्टर की छुट्टियां चल रही थीं. चू यानजुन बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स के बेहद व्यस्त इलाक़े सेंटे कैथरीन के भीड़ भरे बार और रेस्तरां के दरमियान घूम रहे थे. ये जगह ब्रसेल्स के मशहूर ग्रैंड प्लेस से ज़्यादा दूरी पर नहीं है.

    चू यानजुन हवाई सफ़र कर के नीदरलैंड के एम्सटर्डम शहर पहुंचे थे. वहां से वो सड़क के रास्ते बेल्जियम में दाख़िल हुए थे. ये चू यानजुन की छुट्टियां यूरोप में बिताने का पहला पड़ाव था.

    लेकिन, हक़ीक़त ये थी कि अमरीकी अधिकारियों के मुताबिक़ यानजुन सैलानी नहीं थे.

    चू यानजुन असल में एक अमरीकी इंजीनियर से मिलने के लिए ब्रसेल्स पहुंचे थे. ये अमरीकी बेहद ख़ास इंजीनियर था. वो विमान के इंजन की डिज़ाइन बनाने की अगुवा कंपनी जीई एविएशन के लिए काम करता था. जीई एविएशन ने कई दशक और करोड़ों डॉलर लगाकर ऐसा मैटीरियल विकसित किया था, जो हल्के, मज़बूत और सस्ते फैन ब्लेड बनाने में काम आ सके. ये फ़ैन ब्लेड विमान के इंजन में लगते हैं.

    अमरीका ने जो आरोप लगाए हैं उनके मुताबिक़, यानजुन को ये उम्मीद थी कि जीई एविएशन का इंजीनियर उन्हें ये तकनीकी सीक्रेट जानकारी देगा.असल में यानजुन एक चीनी सैलानी नहीं, बल्कि अमरीकी अधिकारियों के मुताबिक़, वो चीन के राज्य सुरक्षा मंत्रालय (एमएसएस) का एक अधिकारी है.

    ब्रसेल्स में चू यानजुन के साथ चौंकाने वाला वाक़िया पेश आया.

    ब्रसेल्स में अमरीका के एविएशन इंजीनियर से मिलने की उम्मीद लगाए बैठे चू का स्वागत बेल्जियम की पुलिस ने किया. असल में उनके ख़िलाफ़ एफ़बीआई ने गिरफ़्तारी का अंतरराष्ट्रीय वारंट जारी किया हुआ था. जिसके तहत बेल्जियम की पुलिस ने चू यानजुन को गिरफ़्तार कर लिया.

    गिरफ़्तारी के कुछ देर बाद चू यानजुन

    गिरफ़्तारी के कुछ देर बाद चू यानजुन

    कारोबारी रूप से अहम तकनीकी जानकारियां चुराने का चू यानजुन का मिशन मार्च, 2017 में शुरू हुआ था.

    अमरीका की कंपनी जीई एविएशन को चीन की नानजिंग यूनिवर्सिटी ऑफ एरोनॉटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमिक्स से एक ई-मेल मिला.

    जीई एविएशन दुनिया भर में कारोबारी और सैन्य विमानों को इंजन की सप्लाई करती है. जो ई-मेल नानजिंग यूनिवर्सिटी से भेजा गया था, उसमें जीई एविएशन के इंजीनियर को चीन आने का न्यौता दिया गया था.

    उस इंजीनियर से पूछा गया था कि क्या वो जानकारियों के आदान-प्रदान के लिए चीन आना पसंद करेगा?

    यूनिवर्सिटी की तरफ़ से भेजे गए ई-मेल में इस सफ़र का ख़र्च उठाने की बात भी कही गई थी.

    अमरीका ने चू यानजुन पर जो आरोप पत्र तैयार किया है, उसके मुताबिक़, मई 2017 में जीई एविएशन के इंजीनियर को ये सुझाव दिया गया कि वो विमान के इंजनों में इस्तेमाल के लिए विकसित किए गए, नए मैटीरियल के बारे में जानकारी दे.

    जीई एविएशन का ये कर्मचारी एक हफ़्ते के लिए चीन गया भी. उसने 2 जून, 2017 को वहां नानजिंग यूनिवर्सिटी के अधिकारियों से मुलाक़ात और बात की.

    चीन में ही इस अमरीकी इंजीनियर की मुलाक़ातचू यानजुन से हुई. चू असल में चीन के राज्य सुरक्षा मंत्रालय का एक अधिकारी है. जो जियांग्सू सूबे के छठवें ब्यूरो में डिप्टी डिवीज़न डायरेक्टर के पद पर काम कर रहा था.

    लेकिन, जब वो अमरीकी इंजीनियर से मिला तो चू ने अपना परिचय कू हुई के तौर पर दिया. चू ने अमरीकी विमान इंजीनियर को बताया कि वो ऐसे संगठन के लिएकाम करता है, जो विज्ञान और तकनीक को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय है.

    चू ने इस इंजीनियर को ये समझाया कि उसके चीन दौरे का ख़र्च चू ने ही उठाया है और नानजिंग यूनिवर्सिटी में लेक्चर के एवज़ में उसने अमरीकी इंजीनियर को 3500 डॉलर की फीस भी दी.

    इसके बाद से दोनों लगातार संपर्क में रहे. अमरीकी अभियोग के मुताबिक़, जीई के इंजीनियर ने चू को और भी ख़ुफ़िया कारोबारी जानकारियां भेजीं. ये साफ़ था कि जीई के इंजीनियर को लगातार अपनी कंपनी की ख़ुफ़िया जानकारियां देने के लिए कहा जा रहा था.

    इस साल फरवरी में जीई के इंजीनियर ने एक प्रेज़ेंटेशन भेजा. इस दस्तावेज़ के पहले पन्ने पर कंपनी का लोगो बना हुआ था.

    इसमें ये चेतावनी भी लिखी थी ये जानकारी जीई एविएशन की बौद्धिक संपत्ति थी और बेहद ख़ुफ़िया जानकारी थी. फिर भी, चू यानजुन इस इंजीनियर से और जानकारियां मांगता रहा.

    अमरीकी अभियोग में दोनों के बीच संवाद की विस्तार से जानकारी दी गई है, जो बेहद चौंकाने वाली है. जीई के इंजीनियर के मुताबिक़, चू यानजुन उससे जो जानकारियां मांग रहा था वो कंपनी की ख़ुफ़िया कारोबारी तकनीक के बारे में थीं.

    चू ने कहा कि वो मिलकर इस बारे में सीधे बात कर सकते हैं. चू ने इस इंजीनियर को ये भी सलाह दी कि वो कंपनी के कंप्यूटर से ये ख़ुफ़िया जानकारी सीधे अपने कंप्यूटर पर कॉपी कर ले.

    पर, जीई एविएशन कंपनी ने अपनी इस सीक्रेट फ़ाइल से अहम जानकारियां हटा दी थीं.

    इस मुकाम पर आते-आते जीई के अधिकारियों को पता चल गया था कि किस तरह उनके कारोबारी राज़ चीन तक पहुंच रहे थे.

    पता चलने के बाद ये इंजीनियर अब जांच एजेंसियों और जीई एविएशन के सतर्कता अधिकारियों के साथ पूरा सहयोग कर रहा है.

    मगर, ये बात चू यानजुन को नहीं पता थी कि वो जिस इंजीनियर से ख़ुफ़िया कारोबारी जानकारियां मांग रहा है, वो अमरीकी जांच एजेंसियों के इशारे पर काम कर रहा है.

    चू ने इस इंजीनियर से कहा कि वो कंपनी के तकनीकी राज़ एक हार्ड ड्राइव में इकट्ठे कर ले और उसे यूरोप ले आए.

    जब वो ब्रसेल्स में मिलेंगे, तो वो हा़र्ड ड्राइव ले लेगा. चू ने इस इंजीनियर से कहा, "अगर हम आगे चलकर साथ बिज़नेस करने वाले हैं, तो हम आगे भी ऐसी जानकारियों का लेन-देन करते रहेंगे."

    एक अप्रैल 2018 को चू यानजुन बेल्जियम पहुंचा और उस पर अमरीकी शिकंजा कस गया.

    अमरीका का दावा है कि चू का असल काम अमरीका और यूरोप की एविएशन और एरोस्पेस कंपनियों की ख़ुफ़िया तकनीकी जानकारियां चुराने का था. अमरीकी अभियोग के मुताबिक़, चू यानजुन साल 2013 से ही चीन की यूनिवर्सिटी और तकनीकी संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रहा था.
    उसका काम था ऐसे इंजीनियरों को तलाशना, जिनके पास ये कारोबारी राज़ हों. फिर उनसे ये तकनीकी जानकारियां हासिल की जाएं.

    इन जानकारियों को चू यानजुन चीन की सरकार को भी देता था और चीन के रिसर्चरों और कंपनियों को भी देता था. चू यानजुन के अमरीकी वक़ील ने इन आरोपों पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है. वहीं, चीन के विदेश मंत्रालय ने सभी आरोपों को झूठ करार दिया है.

    इस साल फरवरी में जीई के इंजीनियर ने एक प्रेज़ेंटेशन भेजा. इस दस्तावेज़ के पहले पन्ने पर कंपनी का लोगो बना हुआ था.

    इसमें ये चेतावनी भी लिखी थी ये जानकारी जीई एविएशन की बौद्धिक संपत्ति थी और बेहद ख़ुफ़िया जानकारी थी. फिर भी, चू यानजुन इस इंजीनियर से और जानकारियां मांगता रहा.

    अमरीकी अभियोग में दोनों के बीच संवाद की विस्तार से जानकारी दी गई है, जो बेहद चौंकाने वाली है. जीई के इंजीनियर के मुताबिक़, चू यानजुन उससे जो जानकारियां मांग रहा था वो कंपनी की ख़ुफ़िया कारोबारी तकनीक के बारे में थीं.

    चू ने कहा कि वो मिलकर इस बारे में सीधे बात कर सकते हैं. चू ने इस इंजीनियर को ये भी सलाह दी कि वो कंपनी के कंप्यूटर से ये ख़ुफ़िया जानकारी सीधे अपने कंप्यूटर पर कॉपी कर ले.

    पर, जीई एविएशन कंपनी ने अपनी इस सीक्रेट फ़ाइल से अहम जानकारियां हटा दी थीं.

    इस मुकाम पर आते-आते जीई के अधिकारियों को पता चल गया था कि किस तरह उनके कारोबारी राज़ चीन तक पहुंच रहे थे.

    पता चलने के बाद ये इंजीनियर अब जांच एजेंसियों और जीई एविएशन के सतर्कता अधिकारियों के साथ पूरा सहयोग कर रहा है.

    मगर, ये बात चू यानजुन को नहीं पता थी कि वो जिस इंजीनियर से ख़ुफ़िया कारोबारी जानकारियां मांग रहा है, वो अमरीकी जांच एजेंसियों के इशारे पर काम कर रहा है.

    चू ने इस इंजीनियर से कहा कि वो कंपनी के तकनीकी राज़ एक हार्ड ड्राइव में इकट्ठे कर ले और उसे यूरोप ले आए.

    जब वो ब्रसेल्स में मिलेंगे, तो वो हा़र्ड ड्राइव ले लेगा. चू ने इस इंजीनियर से कहा, "अगर हम आगे चलकर साथ बिज़नेस करने वाले हैं, तो हम आगे भी ऐसी जानकारियों का लेन-देन करते रहेंगे."

    एक अप्रैल 2018 को चू यानजुन बेल्जियम पहुंचा और उस पर अमरीकी शिकंजा कस गया.

    अमरीका का दावा है कि चू का असल काम अमरीका और यूरोप की एविएशन और एरोस्पेस कंपनियों की ख़ुफ़िया तकनीकी जानकारियां चुराने का था. अमरीकी अभियोग के मुताबिक़, चू यानजुन साल 2013 से ही चीन की यूनिवर्सिटी और तकनीकी संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रहा था.

    उसका काम था ऐसे इंजीनियरों को तलाशना, जिनके पास ये कारोबारी राज़ हों. फिर उनसे ये तकनीकी जानकारियां हासिल की जाएं.

    इन जानकारियों को चू यानजुन चीन की सरकार को भी देता था और चीन के रिसर्चरों और कंपनियों को भी देता था. चू यानजुन के अमरीकी वक़ील ने इन आरोपों पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है. वहीं, चीन के विदेश मंत्रालय ने सभी आरोपों को झूठ करार दिया है.

    चू यानजुन पर आरोप है कि वो नानजिंग यूनिवर्सिटी ऑफ़ एविएशन और एस्ट्रोनॉमिक्स के कई वैज्ञानिकों के साथ काम कर चुका है. ये यूनिवर्सिटी चीन के उद्योग और सूचना-प्रौद्यौगिकी मंत्रालय से जुड़ी हुई है. ये चीन के टॉप तकनीकी संस्थानों में से एक है. ये यूनिवर्सिटी चीन की विमानन कंपनियों के साथ मिलकर काम करती है.

    नानजिंग यूनिवर्सिटी ने माना है कि चू यानजुन पार्ट-टाइम छात्र था. वो यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन का कोर्स कर रहा था. लेकिन, चीन के विदेश मंत्रालय की तरह नानजिंग यूनिवर्सिटी ने भी चू पर लगे जासूसी के आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया है.

    यूनिवर्सिटी का कहना है, "हमारा संस्थान बौद्धिक संपदा के विकास में योगदान देता है और कानूनी तौर पर ही इसका इस्तेमाल करता है. हम ने बौद्धिक संपदा के अधिकारों का हमेशा सम्मान किया है और इसकी चोरी को हम कतई समर्थन नहीं देते."

    नानजिंग यूनिवर्सिटी ऑफ़ एविएशन और एस्ट्रोनॉमिक्स, नानजिंग

    नानजिंग यूनिवर्सिटी ऑफ़ एविएशन और एस्ट्रोनॉमिक्स, नानजिंग

    अप्रैल 2014 में चू यानजुन ने एक ऐसी योजना के बारे में चर्चा की थी जिसमें सैन्य विमानों में ईंधन भरने वाले विमानों के पुर्ज़े हासिल किए जाने थे.

    चू पर ये आरोप भी है कि उसने चीन की एक ऐसी कंपनी में अपने संपर्क को ये दस्तावेज़ भेजे थे, जो उसने अमरीकी इंजीनियर से हासिल किए थे.

    चीन की ये कंपनी विमान के इंजन के पुर्ज़े बनाती है. ड्रोन की तकनीक विकसित करने वाली एक और अमरीकी कंपनी के अधिकारी ने चू यानजुन को कुछ तकनीकी दस्तावेज़ भेजे थे. चू ने ये जानकारी नानजिंग यूनिवर्सिटी को भेज दी थी.

    चू यानजुन करीब छह महीने तक बेल्जियम की हिरासत में रहे. इसके बाद उन्हें प्रत्यर्पण कर के अमरीका ले जाया गया.

    उनके ऊपर आर्थिक जासूसी और तकनीकी-कारोबारी राज़ चोरी करने के आरोप लगाए गए हैं. उनका मुक़दमा अगले साल शुरू होने की उम्मीद है.

    चू यानजुन ने सभी आरोपों से इनकार किया है.

    जीई एविएशन ने एक बयान में कहा है, "इस चोरी को शुरुआत में ही पकड़ लिया गया था. इस वजह से कंपनी की नई उच्च तकनीक चोरी होने से बच गई. हम जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग कर रहे हैं."

    चू यानजुन का मामला ऐसा है, जिसकी इससे पहले की कोई मिसाल नहीं मिलती. ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी ख़ुफ़िया अधिकारी को आर्थिक जानकारियां चुराने के आरोप में प्रत्यर्पित कर के अमरीका लाया गया हो.

    लेकिन, चू के ख़िलाफ़ अमरीका की सख़्त कार्रवाई के संकेत साफ़ हैं. वो कारोबारी राज़ चुराने की चीन की कोशिश को लेकर उन्हें कटघरे में खड़ा कर रहा है.

    लोग कैसे बनते हैं निशाना

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    अमरीका का कहना है कि चू यानजुन चीन की साज़िश की मिसाल हैं. ये प्लान कुछ इस तरह है. चीन की सरकार के ख़ुफ़िया अधिकारी चीन की कंपनियों के साथ मिल कर पश्चिमी देशों की तकनीकी जानकारियां चुराते हैं. फिर इन चोरी की हुई तकनीक का इस्तेमाल अपनी अर्थव्यवस्था के विकास के लिए करते हैं.

    एफबीआई के पूर्व अधिकारी बिल एवानिना कहते हैं, "अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा पर ख़तरे और हमारे हितों पर चोट के लिहाज़ से चीन हमारा दुश्मन नंबर वन है."

    बिला एवानिना अब अमरीका के काउंटर इंटेलिजेंस ऐंड सिक्योरिटी सेंटर के निदेशक हैं. वो विदेशी जासूसों के हमले से बचाने के मिशन पर काम करते हैं.

    बिल एवानिना कहते हैं, "अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा पर ख़तरे और हमारे हितों पर चोट के लिहाज़ से चीन हमारा दुश्मन नंबर वन है." 

    बिल एवानिना कहते हैं, "अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा पर ख़तरे और हमारे हितों पर चोट के लिहाज़ से चीन हमारा दुश्मन नंबर वन है." 

    विमानन क्षेत्र के कारोबारी राज़ चुराने का ये कोई पहला मामला नहीं है.
    चू यानजुन की गिरफ़्तारी के कुछ हफ़्तों बाद ही एक और मामला सामने आया था.
    इसमें कई ख़ुफ़िया अधिकारियों और हैकरों के ख़िलाफ़ आरोप लगे थे. वो भी चीन की मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टेट सिक्योरिटी की जियांग्सू शाखा से जुड़े हुए थे.

    इस मामले की शुरुआत नवंबर 2013 से हुई थी. एक चीनी जासूस ने एक फ्रेंच विमान कंपनी के चीनी मूल के अधिकारी से मुलाक़ात की थी. इस कंपनी का एक दफ़्तर चीन के सुझोऊ में भी है.

    अमरीकी अभियोग के मुताबिक़ चीन के इस ख़ुफ़िया अधिकारी ने फ्रेंच कंपनी के अधिकारी से कहा था, "मैं आज रात घोड़े को तुम्हारे पास ले आऊंगा. इससे ये होगा कि हमें शंघाई में मिलने की ज़रूरत नहीं होगी."

    इस संदेश का मतलब ये था कि वो किसी रेस्तरां में अचानकर टकरा जाने के बहाने से मिलेंगे.

    घोड़ा असल में एक कंप्यूटर वायरस का कोड था. इसकी मदद से फ्रेंच विमान कंपनी के कंप्यूटर में सेंध लगानी थी.

    25 जनवरी, 2014 को फ्रांस की कंपनी के चीनी मूल के अधिकारी ने एक पेन ड्राइव अपनी कंपनी के कंप्यूटर में लगाया. इसके बाद उसने चीन के ख़ुफ़िया अधिकारी को मोबाइल पर मैसेज भेजा कि 'घोड़े को काम पर लगा दिया है.'

    अगले महीने फ्रांस की विमान कंपनी के कंप्यूटर एक वेबसाइट से जुड़ गए, जिसे चीनी हैकरों का एक गिरोह चला रहा था.

    अमरीकी अधिकारियों को इसका पता चला तो उन्होंने फ्रांस की सरकार को इसकी ख़बर की. फ्रांस के ख़ुफ़िया अधिकारियों ने तुरंत फ्रेंच एविएशन कंपनी से संपर्क साधा. कंपनी ने मामले की जांच शुरू की.

    लेकिन, इस मामले में चीन के हैकर काफ़ी आगे थे. इस कंपनी का एक आईटी ऑफ़िसर जो चीन में तैनात था, वो चीनी हैकरों के लिए काम कर रहा था.

    इस अधिकारी ने तुरंत ही अपने हैकर साथियों को जांच के बारे में आगाह करने वाला मैसेज भेजा.

    अमरीकी अभियोग केमुताबिक़, चीन के हैकरों ने फ़ौरन ही फ्रेंच कंपनी में सेंध लगाने वाली वेबसाइट को बंद कर दिया, ताकि जांचकर्ता उन तक न पहुंच सकें.

    अमरीका का आरोप है कि साल 2010-2015 के बीच चीन के हैकरों से इस समूह ने चीन के ख़ुफ़िया अधिकारी की अगुवाई में फ्रेंच कंपनी के चीनी कर्मचारियों के साथ सांठ-गांठ से बेहद संवेदनशील जानकारियां चुरा ली थीं.
    ये जानकारी कारोबारी विमानों में इस्तेमाल होने वाले टर्बो फ़ैन इंजनों से जुड़ी हुई थी. इस मामले के सारे के सारे संदिग्ध चीन में हैं. तो, इस बात की उम्मीद कतई नहीं है कि इनके ख़िलाफ़ जासूसी का केस चल सकेगा.

    लेकिन, ये अभियोग लगाकर अमरीका चीन की ख़ुफ़िया जानकारियां चुराने की साज़िशों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्दाफ़ाश करनेमें जुटा हुआ है, ताकि चीन की सरकार पर ऐसी हरकतें रोकने का दबाव बना सके.

    इन दोनों ही मामलों से साफ़ है कि बात भले ही साइबर जासूसी की हो, मगर आज भी ये इंसानों के बग़ैर नहीं हो सकती. किसी भी कंपनी के कर्मचारी, जान-बूझकर या अनजाने में, कंपनी की ख़ुफ़िया जानकारियां दे सकते हैं.

    सवाल ये है कि चीन के ख़ुफ़िया अधिकारी आख़िर कैसे किसी कंपनी के अधिकारी की तलाश करते हैं, जो उन्हें कारोबारी सीक्रेट दे सके?

    1 नवंबर 2017 को जी चाओकुन नाम के एक अमरीकी नागरिक के ओहायो स्थित घर पर छापे मारे गए. जी चाओकुन, चीन में पैदा हुआ था. मगर वो 2013 के अगस्त महीने में अमरीका आ गया था.

    वो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिएअमरीका आया था. उसने अमरीका के इलिनॉय इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी में दाख़िला लिया. साल 2016 में वो अमरीकी सेना का रिज़र्व सैनिक बन गया.

    अमरीका का आरोप है कि जी चाओकुन से आठ इंजीनियरों के बारे में जानकारियां मांगी गई थीं. ये सभी इंजीनियर थे तो अमरीकी नागरिक. लेकिन ये सभी ताईवान या चीन में पैदा हुए थे.

    ये सभी या तो काम कर रहे थे या फिर हाल ही में विज्ञान और तकनीक से जुड़ी नौकरियों से रिटायर हुए थे. इनमें से कुछ ऐसे भी थे जो विमानन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में काम कर रहे थे.

    इन आठ इंजीनियरों में से सात अमरीकी रक्षा क्षेत्र के ठेके लेने वाली कंपनियों में काम कर चुके थे. इन्हें सिक्योरिटी क्लियरेंस मिला हुआ था.

    जी चाओकुन ने अपनी हकीकत छुपाने के लिए एक और चाल चली थी. उसने जो जानकारियां चीन में अपने संपर्कों को भेजी थीं, उन्हें 'मिडटर्म टेस्ट क्वेश्चन' के नाम से भेजा था.

    फरवरी से मई, 2018 के बीच जी चाओकुन की मुलाक़ात ऐसे लोगों से हुई, जिन्होंने उसे ये कहा कि वो चीन के ख़ुफ़िया अधिकारी हैं. जबकि हक़ीक़त में वो एफबीआई के ख़ुफ़िया अधिकारी थे.

    जी चाओकुन ने अमरीकी अधिकारियों को बताया कि चीन के ख़ुफ़िया अधिकारियों ने उससे एक रोज़गार मेले में संपर्क किया था. बाद में उसे अमरीकी इंजीनियरों के बारे में जानकारी जुटाने को कहा गया.

    जी के वक़ील ने इस बारे में कुछ भी बोलने से मना कर दिया. पहले की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ जी ने एफबीआई के लगाए आरोपों से इनकार किया है.

    चीन के साइबर हमले अमरीकी मीडिया में काफ़ी सुर्ख़ियां बटोर रहे हैं. लेकिन अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि अमरीकी कंपनी के अधिकारियों की मदद से तकनीकी जानकारियों की चोरी ज़्यादा गंभीर और बड़ा ख़तरा है.

    चीन के ख़ुफ़िया अधिकारियों को सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल जैसे लिंक्डइन के ज़रिए लोगों को अपने झांसे में लेने में महारत हासिल है.

    बिल एवानिना कहते हैं, "अगर आप ख़ुफ़िया सेवा के लिहाज़ से देखें, तो इस में जोखिम कम है. आप 20, 30 या 40 लोगों को 30 से 40 हज़ार ई-मेल भेजते हैं. लोग इन ई-मेल के जवाब में लिख कर भेज देते हैं कि मेरे पास ख़ुफ़िया जानकारी है. मैं इस पर प्रेज़ेंटेशन देने चीन आ सकता हूं. ये उनके लिए बहुत कामयाब तरीक़ा है."

    एक साल पहले जर्मनी की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने चेतावनी दी थी कि 10 हज़ार जर्मन नागरिकों से फ़र्ज़ी प्रोफ़ाइल के ज़रिए संपर्क साधा गया था. इन लोगों को रोज़गार देने क बहाने से टारगेट किया गया था. ये लोग बड़ी कंपनियों के सलाहकार, थिंक टैंक से जुड़े होने या विद्वान होने का दावा कर रहे थे. जबकि, हक़ीक़त में ये चीन के ख़ुफ़िया अधिकारी थे.

    ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसी के अधिकारी कहते हैं कि ब्रिटेन में भी चीन की ख़ुफ़िया एजेंसियां ऐसे काम कर रही हैं. लेकिन, ये उस स्तर का नहीं है, जैसा अमरीका में हो रहा है. ब्रिटेन की सरकार चीन की निंदा भी उतने ज़ोर-शोर से नहीं कर रही है, जितनी अमरीका का ट्रंप प्रशासन.

    अमरीकी अधिकारी निजी तौर पर ये मानते हैं कि ब्रिटेन को भी चीन के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ अपनाना चाहिए. लेकिन अब तक ब्रिटिश अधिकारियों का रवैया ढुलमुल ही रहा है.

    चीन के कारोबारी राज़ चुराने को लेकर ब्रिटेन भी सख़्त होने के संकेत दे रहा है. क्योंकि अमरीका उस पर ऐसा करने का दबाव बना रहा है.

    अमरीका की तैयारी चीन के ख़िलाफ़ कारोबारी और आर्थिक जासूसी के ऐसे और मामले उजागर करने और अभियोग लगाने की है.

    ब्रिटेन की संचार ख़ुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे अधिकारी रॉबर्ट हैनिगन कहते हैं, "ब्रिटेन के शिक्षण संस्थानों और यूनिवर्सिटी से बौद्धिक संपदा की चोरी के कई मामले सामने आए हैं, जिनके पीछे चीन का हाथ रहा है."

    रॉबर्ट कहते हैं, "ब्रिटेन ने तकनीकी और बौद्धिक संपदा की इस चोरी के ख़िलाफ़ बहुत सख़्ती से क़दम नहीं उठाया. ब्रिटेन की सरकारें, चीन से टकराव नहीं चाहती हैं. वैसे भी अमरीका के मुक़ाबले ब्रिटेन के पास इतनी ताक़त नहीं है कि वो चीन के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई कर सके. उसके साइबर हमलों को रोक सके."

    ब्रिटेन में साइबर हमलों के ख़िलाफ़ बहुत ही कम अभियोग आए हैं. एक मामले की पुलिस जांच कर रही है.

    ख़तरा क्या है?

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    ब्रिटेन के सुरक्षा अधिकारियों को इस बात की फ़िक्र ज़्यादा है कि ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं को निशाना बनाया जा रहा है, तकनीकी जानकारियां चुराई जा रही हैं.

    चिंता इस बात की है कि ऐसे संस्थानों को आसानी से निशाना बनाया जा रहा है. संस्थाओं से जुड़े लोगों को चीन आने का न्योता देकर उनसे जानकारी जुटाई जाती है. या फिर चीन के अधिकारी पश्चिमी देशों में छात्र बनकर जाते हैं और फिर कारोबारी राज़ चुरा कर लौट जाते हैं. कई बार तो चीन के लोग औपचारिक संबंध के ज़रिए भी ये जानकारियां हासिल कर लेते हैं.

    ब्रिटेन की एक बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी चीन की एक यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर रिसर्च और मैटीरियल विकसित करने का कामकर रही है.

    ये कंपनी हमेशा उन कमरों की पड़ताल कराती है, जहां साझा बैठकें होती हैं, ताकि किसी जानकारी को चोरी होने से रोका जा सके.

    चीन के चांगशा स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ डिफेंस टेक्नॉलॉजी वहां की टॉप यूनिवर्सिटी में से एक है. इसे चीन के रक्षा और शिक्षा मंत्रालय मिलकर चलाते हैं. इस यूनिवर्सिटी के चीन की सेना से भी नज़दीकी संबंध हैं.

    एनयूडीटी, चीन के अंतरिक्ष और सुपर कंप्यूटर मिशन से बेहद क़रीब से जुड़ी हुई है. ये यूनिवर्सिटी, पश्चिमी देशों के कई संस्थानों के साथ मिलकर काम करती है.

    चीन का चांगशा स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ डिफेंस टेक्नॉलॉजी

    चीन का चांगशा स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ डिफेंस टेक्नॉलॉजी

    बीबीसी ने पाया है कि ब्रिटेन की कई यूनिवर्सिटी चीन की एनयूडीटी के साथ मिल कर रिसर्च पेपर पर काम कर रही हैं. ज़्यादातर साझा कार्यक्रम अंतरिक्ष और विमानन क्षेत्र से जुड़ा हुआ है.

    हमारा कहने का ये मतलब कतई नहीं कि चीन की हर यूनिवर्सिटी ख़ुफ़िया जानकारियों की चोरी ही कर रही है. लेकिन, इनके ज़रिए चीन अपना प्रभाव जिस तरह से बढ़ा रहा है, वो चिंता की बात है.

    ऑस्ट्रेलिया के रिसर्चर एलेक्सजोस्के कहते हैं, "ब्रिटेन के शिक्षण संस्थाओं का चीन की एनयूडीटी के साथ साझा अभियान बेहद चिंता की बात है. ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों ने सैकड़ों चीनी इंजीनियरों को ट्रेनिंग दी है. चीन की सेना असैन्य ट्रेनिंग कार्यक्रमों का इस्तेमाल अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए करती है. फिलहाल ऐसी हरकतों पर कोई नज़र नहीं रखी जा रही है."

    ब्रिटेन में एक योजना है जिसका नाम है-एकैडेमिक टेक्नॉलॉजी एप्रूवल सिस्टम यानी एटीएएस. इसे ब्रिटेन की सरकार चलाती है, ताकि शिक्षण संस्थाओं को जासूसी के ख़तरे से बचा सके.

    बिल एवानिना कहते हैं कि ज़्यादा ख़तरा उन लोगों से है, जो जासूस की परिभाषा के दायरे में नहीं आते. वो लोग वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और कारोबारियों का इस्तेमाल करते हैं. वो यहां आ सकते हैं. पश्चिमी देशों के संस्थानों में ख़ुद कोअच्छे से स्थापित कर सकते हैं. वो पश्चिमी देशों में आकर यहां की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं. फिर वो अहम प्रोजेक्ट से जुड़ जाते हैं. ये प्रोजेक्ट ख़ुफ़िया मिशन भी हो सकते हैं. बाद में चीनी मूल के ये लोग इस हैसियत में पहुंच जाते हैं कि इन जानकारियों का ग़लत इस्तेमाल कर के इसे वापस अपने देश भेज सकें.

    वैसे, हर देश ख़ुफ़िया अभियान चलाता है. दूसरे देशों की जासूसी करता है. अमरीका और ब्रिटेन भी चीन और इसकी कंपनियों के ख़िलाफ़ जासूसी मिशन चलाते हैं.

    लेकिन, पश्चिमी देशों के अधिकारियों का कहना है कि चीन के काम करने का तरीक़ा अलग है. चीन, कारोबारी राज़ हासिल करने के लिए एक ख़ास रणनीति पर अमल करता है.

    पश्चिमीदेशों की कंपनियों से मिली एडवांस तकनीक वाली इन जानकारियों को चीन अपने देश की कंपनियों को देता है. ये कंपनियां अक्सर सरकार से जुड़ी होती हैं. पश्चिमी देशों की जासूसी में ये बात नहीं होती.

    चीन, जानकारियां चोरी करने के किसी बड़े अभियान को चलाने से साफ़ इनकार करता है.

    चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का कहना है, "अमरीका की कार्रवाई से चीन के अधिकारों और इसके हितों को नुक़सान पहुंचा है. इसने चीन और अमरीका के साझा भरोसे को भी नुक़सान पहुंचाया है. इसका असर चीन और अमरीका के संबंधों पर भी पड़ेगा. हम अमरीका से अपील करते हैं कि वो ऐसी ओछी बयानबाज़ी और कार्रवाई पर फ़ौरन रोक लगाए."

    जासूसी का पलटवार

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    अमरीका का ट्रंप प्रशासन, चीन की जासूसी पर तगड़ा पलटवार करने को लेकर दृढ़संकल्प है. पिछले कुछ महीनों में अमरीकी सरकार ने चू यानजुन जैसे लोगों के ख़िलाफ़ अभियोग सार्वजनिक कर के चीन पर दबाव बनाने की कोशिश की है.

    ऐसे ही अन्य अभियोगों में सेमीकंडक्टर चिप, फ़ोम और जीएम चावल की तकनीक चुराने की साज़िशें शामिल हैं.

    ताक़त, पैसा और राजनीति का केंद्र अब पूरब बनता जा रहा है. ये एक ऐसी सियासी हक़ीक़तहै, जिसे अपनाने के लिए हमें तैयार होना चाहिए

    एलेक्स यंगरने, एमआई6

    बिल एवानिना कहते हैं, "मैं आप को भरोसे से बता सकता हूं कि जल्द ही ऐसी ही और भी जानकारियां सामने आएंगी."

    बिल एवानिना का कहना है कि रूस के मुक़ाबले चीन, अमरीका की सुरक्षा के लिए ज़्यादा बड़ा ख़तरा है.

    चिंता सिर्फ़ इस बात की नहीं है किचीन जासूसी की मदद से आर्थिक तरक़्क़ी करने की कोशिश कर रहा है. बल्कि इस बात की फ़िक्र ज़्यादा है कि चीन की सरकार किस तरह अपनी ताक़त का इस्तेमाल कर के दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ा रही है.

    ट्रंप प्रशासन के लिए सियासी तौर पर भी रूस से ज़्यादा चीन पर ध्यान देना ज़्यादा फ़ायदेमंद है. लेकिन, अगर आप राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अमरीकी अधिकारियों से बात करें, तो पता चलेगा कि चीन की जासूसी पर लगाम लगाने के लिए फ़ौरी एहतियात बरतने की ज़रूरत है.

    चीन की जासूसी के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ अपनाकर असल में चीन की आर्थिक और तकनीकी ताक़त को चुनौती देने की कोशिश हो रही है. अमरीका चाहता है कि दूसरे पश्चिमी देश इस मिशन में उसका साथ दें.

    ऑस्ट्रेलिया इस मामले में अमरीका के साथ खुलकर खड़ा दिखाई देता है. वो राजनीति से लेकर विश्वविद्यालयों तक में चीन के बढ़ते असर को लेकर फ़िक्रमंद है.

    जून में ऑस्ट्रेलिया ने जासूसी रोकने के लिए एक नया क़ानून पारित किया.

    इसके तहत, दूसरे देशों की सरकारों को ख़ुफ़िया जानकारियां देना, और ऐसे ख़ुफ़िया काम करना जिनसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दख़ल दिया जा सके, वो अब ऑस्ट्रेलिया में अपराध होगा.

    इस क़ानून का मक़सद हर तरह की जासूसी को ग़ैरक़ानूनी बनाना है.

    ब्रिटेन का रवैया इस मामले में संतुलित रहा है. पिछले ही महीने ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसी एमआई6 के प्रमुख एलेक्स यंगरने कहा, "ताक़त, पैसा और राजनीति का केंद्र अब पूरब बनता जा रहा है. ये एक ऐसी सियासी हक़ीक़तहै, जिसे अपनाने के लिए हमें तैयार होना चाहिए."

    ब्रिटिश सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा, "हम ख़ुफ़िया मामलों में आम तौर पर नियमित रूप से कुछ नहीं कहते. न ही हम अपने देश पर संभावित ख़तरों की खुलकर चर्चा करते हैं. सरकार, अपने देश पर तमाम ख़तरों से आगाह है. हम राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों को बहुत गंभीरता से लेते हैं."

    ब्रिटेन के वरिष्ठ अधिकारी जासूसी के मामलों पर संतुलित रुख़ अपनाने की बात करते हैं. वो चीन और अमरीका के बीच छिड़ी जासूसी की जंग के बीच में मोहरा नहीं बनना चाहते. अगर ब्रिटेन को अमरीका और चीन के बीच में किसी एक को चुनना ही पड़ा तो वो ज़ाहिर है कि अमरीका के साथ ही खड़े होंगे. मगर, ब्रिटेन चाहता है कि उसे इस चुनाव की नौबत न देखनी पड़े तो ही बेहतर.

    रॉबर्ट हैनिगन कहते हैं, "हमें अभी तक ये साफ़ नहीं हो सका है कि चीन की बढ़ती ताक़त हमारे लिए ख़तरा है या एक मौक़ा. लेकिन, ये ज़रूर है कि इस हक़ीक़त से रूबरू होना मुश्किल है."

    वहीं अमरीका के अधिकारी ये मानते हैं कि चीन की बढ़ती जासूसी को अभी चुनौती देना ज़रूरी है. वहीं, कुछ अधिकारियों का ये मानना है कि चीन ने पहले ही इतनी तरक़्क़ी कर ली है कि वो आर्थिक तौर पर लंबी छलांग लगा सके और दुनिया पर अपने प्रभाव का सिक्का जमा सके.

    अब जबकि चीन की जासूसी के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया गया है, तो भी कुछ अधिकारियों को ये लगता है कि चीन की आर्थिक प्रभाव बढ़ाने वाली योजना को रोकने में काफ़ी देर हो चुकी है.