अपने पति और बच्चे के साथ रहने वाली आसिया बीबी घर से निकलकर काम के लिए खेतों में गईं. लाहौर से दक्षिण पूर्व में क़रीब 40 मील दूरी पर उनका गांव इतानवाला काफी हरा भरा इलाक़ा है, जहां फलों के कई बगीचे हैं. ये पाकिस्तानी पंजाब के सबसे उपजाऊ इलाकों में एक है.
गांव की दूसरी महिलाओं की तरह आसिया इन बगीचों में काम करती थीं. वो जून का महीना था जब महिलाएं फालसा इकट्ठा करने के लिए खेतों में जमा हुई थीं. चिलचिलाती धूप में,कई घंटे काम करने के बाद थकी और प्यासी महिलाएं सुस्ताने के लिए थोड़ी देर बैठ गईं थी. किसी ने आसिया को नज़दीक के कुएं से पानी निकालकर लाने को कहा था.

आसिया बीबी
उन्होंने पानी निकाला, जग में भरा और लाते वक्त प्यास के चलते उससे दो चार घूंट पानी पी लिया, इसके बाद उन्होंने जग मुस्लिम महिलाओं को थमाया. लेकिन वे सब इस बात से नाराज़ हो गईं.
आप भी सोच रहे होंगे, इसमें ऐसी कौन सी बात हो गई थी. दरअसल आसिया ईसाई हैं. पाकिस्तान में कई कट्टरपंथी मुसलमान दूसरी धार्मिक आस्था वाले के हाथों से खाना पीना पसंद नहीं करते हैं. वे मानते हैं कि जो मुसलमान नहीं हैं, वे अशुद्ध होते हैं.
साथ काम करने वाली महिलाओं ने आसिया से कहा कि तुम गंदी हो और तुम्हें उसी जग में पानी नहीं पीना चाहिए था. बात विवाद तक पहुंच गई, दोनों तरफ से कहासुनी भी हो गई.

वो ट्यूब वेल जहां से आसिया ने पानी लिया था
पांच दिन बाद, आसिया के घर में जबरन पुलिस आ धमकी और कहा कि आसिया ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान किया है. घर के बाहर गुस्साई भीड़ थी, जिसमें गांव के मौलवी भी शामिल थे. वे आसिया पर ईशनिंदा का आरोप लगा रहे थे. आसिया को जबर्दस्ती खींचकर बाहर निकाला गया.
गुस्से से तमतमाई भीड़ ने पुलिस के सामने ही आसिया को पीटना शुरू कर दिया. आसिया को गिरफ़्तार किया गया और उन पर ईशनिंदा का मुक़दमा चला. सुनवाई के दौरान आसिया खुद को निर्दोष बताती रहीं, लेकिन साल 2010 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. बीते नौ साल से वे जेल में एकांतवास या कहें काल कोठरी की सजा भुगत रहीं थीं.
पाकिस्तान में इस्लाम और पैगंबर के ख़िलाफ़ ईशनिंदा करने वालों को आजीवन कैद या फिर मौत की सजा दी जाती है. लेकिन कई बार ईशनिंदा के आरोप निजी खुन्नस निकालने के लिए लगाए जाते हैं. एक बार जिस किसी पर ईशनिंदा के आरोप लग जाते हैं तो सुनवाई शुरू होने से पहले ही उस पर और उसके परिवार वालों पर हमले शुरू हो जाते हैं.
मैं करीब साल भर पहले एक गोपनीय जगह पर आसिया के शौहर आशिक से मिली. आशिक और उनके बच्चे आसिया की गिरफ़्तारी के बाद इधर-उधर छिपकर रहने को मजबूर थे.
आशिक ने बताया, "अगर किसी क़रीबी की मौत हो जाए, तो कुछ दिनों में मरहम लग जाता है. लेकिन मां जीवित हो और उसे उसके बच्चों से अलग कर दिया जाए... जिस तरह से आसिया हम लोगों के बीच से ले जाई गईं थीं, तब दुख हद से गुजर जाता है."

आशिक मसीह (दाहिने) और ईशम मसीह (बाएं): आसिया बीबी की बेटी और शौहर
पर्दे से घिरे बरामदे में बैठे आशिक खुद को संयत रखने की भरसक कोशिश करते हैं लेकिन कई बार उनका चेहरा गमगीन हो उठता है.
"हर पल डर में रह रहे हैं, सुरक्षा का डर हमेशा सताता है. हम लोगों के साथ कुछ भी हो सकता है. मैं बच्चों को केवल स्कूल भेजता हूं, घर के बाहर खेलने पर रोक लगी है, हम सबकी आज़ादी छिन चुकी है."
"असुरक्षा औरअनिश्चितता के कई साल बीतने के बाद भी आशिक ने आसिया को लेकर उम्मीद नहीं छोड़ी. मैंने अपनी आज़ादी खोई, मेरा घर और मेरी आजीविका सब छीन गई, लेकिन मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी. मैं आसिया की रिहाई के लिए कोशिश करता रहा."

आशिक मसीह (दाहिने) और ईशम मसीह (बाएं): आसिया बीबी की बेटी और शौहर
आसिया की गिरफ्तारी के नौ साल बाद आख़िरकार बीते साल वो 31 अक्टूबर का दिन आ ही गया, जब आशिक की दुआएं कबूल हुईं.
हज़ारों कट्टर मुसलमानों की उम्मीदों के उलट, पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने सबूत के अभाव में पहले दी गई सजा को रद्द करते हुए आसिया बीबी को रिहा करने का आदेश दिया था.
आदेश के कुछ ही घंटों के अंदर सड़कों पर लोग इसके विरोध में उतर आए. ये सब लोग एक ही मांग कर रहे थे, "आसिया बीबी को मौत की सज़ा दो.आसिया बीबी को मौत की सज़ा दो."
लगातार तीन दिनों तक विरोध प्रदर्शन करने वालों ने सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए हर संभव दबाव डाला. मुख्य सड़कों को बंद कर दिया गया, कारों और बसों को जला दिया गया, टोल बूथों पर तोड़-फोड़ की गई.
इतना ही नहीं, पुलिस अधिकारियों पर भी हमले हुए. ख़ासकर पूर्वी पंजाब में, जहां हिंसा की घटनाओं को देखते हुए को देखते हुए दफ़्तर,बाज़ार और स्कूलों को बंद करना पड़ा क्योंकि सड़क पर चलना संभव नहीं रह गया था.
इस दौरान पूरे देश में डर और आतंक का माहौल था जबकि सरकार कहीं दिखाई नहीं दे रही थी.

आसिया बीबी की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद कट्टरपंथी सियासी जमात तहरीक-ए-लबैक के समर्थक सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करते हुए
इसके बाद पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने देश को टेलीविजन के ज़रिए संबोधित किया. उन्होंने विरोध प्रदर्शन करने वालों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे लोग सरकार से टकराव का रास्ता नहीं चुनें.
तीन दिनों तक चली उथल-पुथल के बाद सरकार ने कहा कि वो किसी भी ख़ून ख़राबे को रोकने के लिए विद्रोह पर उतारू लोगों से बातचीत करेगी.

सड़कों पर तहरीक-ए-लबैक के समर्थक
आसिया बीबी की रिहाई के तुरंत बाद ख़ादिम हुसैन रिज़वी और उनकी धार्मिक रुझान वाली राजनीतिक पार्टी तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान (टीएलपी) ने सोशम मीडिया के सहारे सामाजिक अव्यवस्था और हिंसा को बढ़ावा दिया था.
इन लोगों ने आसिया को रिहा करने वाले जजों की हत्या तक का फतवा जारी कर दिया, सेना में विद्रोह के लिए सैनिकों को प्रोत्साहित किया गया, इसके लिए सेना प्रमुख के बारे में ये भी प्रचारित किया गया है कि उन्होंने विश्वासघात करते हुए इस्लाम को त्याग दिया है.

तहरीक-ए-लबैक के समर्थक
इन लोगों को अपनी पार्टी से बाहर भी जोरदार समर्थन मिला, सोशल मीडिया पर फैले वीडियो क्लिप के ज़रिए समाज के सभी तबकों के हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के दिन रिज़वी का ट्वीट
जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया, व्हीलचेयर पर चलने वाले 53 साल के मौलवी रिज़वी ने ट्वीट किया, "आसिया की रिहाई इंसाफ से मरहूम करने जैसा है."
इसकी आड़ में उन्होंने घृणा फैलाने वाला अपना भाषण भी दिया.
रिजवी ने ये भी आरोप लगाया कि पश्चिमी देश इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ ईशनिंदा को बढ़ावा दे रहे हैं. अपने एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि लोग जानबूझकर ईशनिंदा करते हैं ताकि उन्हें पश्चिमी देशों से पैसा और संरक्षण मिल सके.
कुछ साल पहले तक रिज़वी एक छोटी सी मस्जिद में मौलवी हुआ करते थे. वे सरकारी कर्मचारी थे और लगभ नामालूम सी शख़्सियत फिर भी वे अपने विवादास्पद धार्मिक भाषणों के लिए जाने जाते थे.
धार्मिक उपदेश देते वक्त रिज़वी आम तौर पर सलमान तासीर की हत्या को प्रशंसात्मक लहजे से बताते रहे हैं.
तासीर उन राजनेताओं में एक थे, जो सार्वजनिक तौर पर आसिया बीबी से सहानुभूति रखते थे और ईशनिंदा क़ानून में बदलाव की वकालत करते थे.
शेखुपुरा सेंट्रल जेल में गवर्नर सलमान तासीर के दौरे के वक़्त आसिया बीबी के अंगूठे का निशान लेते हुए एक पुलिस अधिकारी
पंजाब के गवर्नर के तौर पर तासीर ने साल 2010 में आसिया बीबी से मुलाकात के लिए शेखुपुरा जेल का दौरा किया था. नक़ाब पहने आसिया के साथ उनकी जो प्रेंस कॉन्फ्रेंस आई थी, उसमें तासीर ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति से आसिया को माफ़ी दिए जाने की अपील की थी.
कुछ ही हफ़्ते बाद जनवरी की एक सर्द सुबह तासीर की हत्या उनके अपने ही बॉडीगार्ड ने कर दी. इस्लामाबाद के व्यस्त खोसार बाज़ार के बीचोंबीच 26 साल के पुलिस कमांडो मलिक मुमताज़ हुसैन क़ादरी ने गवर्नर तासीर को प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से 27 गोलियां दागीं थीं.

अदालत के सामने हाजिर होने के बाद मलिक मुमताज़ हुसैन क़ादरी ने कहा था, "पैगंबर मोहम्मद की शान में हम अपनी ज़िंदगी कुर्बान करने के लिए तैयार हैं."
इसके बाद क़ादरी रातों रात लाखों लोगों के लिए हीरो बन गए थे. उन्होंने खुद कोअधिकारियों के सामने पेश करते हुए कहा था, "मुझे तासीर की हत्या करने पर कोई पछतावा नहीं है, ये मेरी धार्मिक ड्यूटी थी."
उन्होंने पुलिस अधिकारियों को कहा था, "ईशनिंदा करने वालों की सज़ा तो मौत ही हो सकती है."
सुरक्षा कारणों के चलते कुछ दिनों की देरी के बाद जब मामले की सुनवाई शुरू हुई तब क़ादरी का सैकड़ों समर्थकों ने उत्साह बढ़ाया था और उन पर गुलाब बरसाए थे.
लेकिन क़ादरी को मौत की सज़ा मिली और साल 2016 में उन्हें फांसी दे दी गई.
रिज़वी को क़ादरी की तारीफ़ करने और उन्हें शहीद बताने के चलते मौलवी की नौकरी से निकाल दिया गया. वे राजनीति में आ गए और उन्होंने अपने राजनीतिक दल टीएलपी की स्थापना की.
पार्टी के गठन के कुछ ही महीनों के अंदर, उनके कार्यकर्ताओं ने मुख्य हाइवे को बंद कर दिया. इसके चलते राजधानी इस्लामाबाद 20 दिनों तक प्रभावित रहा.
रिज़वी ने उस वक्त सरकार पर ही ईशनिंदा का आरोप लगाया था. इसकी वजह ये थी कि चुनावी शपथ के संशोधित संस्करण में पैगंबर मोहम्मद को अंतिम सत्य बताने वाला रिफ़्रेंस शामिल नहीं किया गया था.
इसके बाद बीते साल हुए चुनाव में रिज़वी ने खुद को पैगंबर मोहम्मद के सम्मान का रक्षक बताया, जिसके आधार पर उनकी छोटी सी राजनीतिक पार्टी को 20 लाख से ज़्यादा मत मिले. पूरे अभियान के दौरान इनके पोस्टर और बैनरों पर क़ादरी को शहीद बताने वाली तस्वीरें लगी हुई थीं.

खादिम हुसैन रिज़वी
बहरहाल तीन दिनों तक पाकिस्तान में चले टीएलपी के विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने सुलह का रास्ता बनाया.
सरकार इस बात पर तैयार हुई कि आसिया की रिहाई को बदलने वाली याचिका का विरोध नहीं करेगी और आसिया के देश छोड़ने पर पाबंदी लगाएगी.
याचिका दाखिल होने के बाद भीड़ हटी, आसिया को जेल से रिहा किया गया लेकिन सुरक्षा के लिहाज से उन्हें फिर हिरासत में ले लिया गया.
आख़िरकार आसिया को रिहा होने के लिए तीन महीने का इंतज़ार करना पड़ा.
पाकिस्तान में बीते 30 साल से पैगंबर मोहम्मद की निंदा करने पर मौत की सज़ा काप्रावधान है लेकिन ईशनिंदा के चलते अभी तक किसी को मौत की सज़ा नहीं दी गई है.
पाकिस्तान के सेंटर फॉर सोशल जस्टिस के मुताबिक़ अब तक पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़निंदा वाले या फिर कुरान की बेअदबी जैसे गंभीर आरोपों वाले ईशनिंदा के 1549 मामले सामनेदर्ज़ किए गए हैं.
इनमें से 75 अभियुक्तों की हत्या सुनवाई शुरू होने से पहलेकर दी गई. कई अभियुक्तों की मौत पुलिस हिरासत में हुई, कुछ को भीड़ ने मार डाला.

अभियुक्तों की धार्मिक पहचान (1987-2017)
स्रोतः सेंटर फ़ॉर सोशल जस्टिस, पाकिस्तान
ऐसा ही एक वाकया लाहौर से 30 मील दक्षिण में हिंदू देवताओं के नाम पर बसे एक छोटे से शहर कोट राधा किशन में देखने को मिला था. कोट राधा किशन के चारों तरफ हरे भरे खेत नज़र आते हैं. लेकिन हर आधे मील की दूरी पर यहां आग उगलती चिमनियां नजर आती हैं, जिनकी भट्ठियों में ईंटें पक रही होती हैं.
ईशनिंदा के आरोप में ईसाई जोड़े शहज़ाद और शमा मसीह को साल 2014 में भीड़ ने ज़िंदा जला दिया था.
स्थानीय पत्रकार राणा खालिद उस घटना को याद करते हुए एक चिमनी के पास ईंट के बने एक छोटे से कमरे की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, "उन दोनों को इसी कमरे में बंद रखा गया था ताकि उन्हें भीड़ से बचाया जा सके."

शहज़ाद और शमा ने जिस कमरे में पनाह ली थी
लेकिन जैसा कि खालिद बताते हैं कि स्थानीय मौलवी के नेतृत्व में जमा भीड़ इतनी गुस्साई थी कि कुछ लोग इस कमरे की छत पर चढ़ गए और उन्होंने छत तोड़कर दोनों को बाहर निकाल लिया.
खालिद कहते हैं, "उन दोनों को पहले तो लाठी और ईंटों से बुरी तरह मारा पीटा गया और उसके बाद गांव के आक्रोशित लोगों ने उन दोनों को भट्ठी में झोंक दिया."
शमा तब चार महीने की गर्भवती थीं. भीड़ इस बात पर यक़ीन कर रही थी कि शहज़ाद और शमा ने कुरान के कई पन्नों को जलाया है. शहज़ाद का परिवार आज भी इससे इनकार करता है. उनका कहना है कि दोनों ने अपने पिता के कुछ पुराने दस्तावेज़ों को जलाया था.
शमा और शहज़ाद की हत्या के आरोप में स्थानीय मौलवी सहित पांच लोगों को मौत की सज़ा हुई और गांव के ही आठ अन्य लोगों को हिंसा करने के आरोप में दो-दो साल की जेल की सज़ा हुई.
ऐसा ही एक वाकया लाहौर से 30 मील दक्षिण में हिंदू देवताओं के नाम पर बसे एक छोटे से नगर कोट राधाकिशन में देखने को मिला था.
कोट राधा किशन के चारों तरफ हरे भरे खेत नज़र आते हैं. लेकिन हर आधे मील की दूरी पर यहां आग उगलती चिमनियां नजर आती हैं, जिनकी भट्ठियों में ईंटें पक रही होती हैं.

ईंट भट्ठी
ईशनिंदा के आरोप में ईसाई जोड़े शहज़ाद और शमा मसीह को साल 2014 में भीड़ ने ज़िंदा जला दिया था.
स्थानीय पत्रकार राणा खालिद उस घटना को याद करते हुए एक चिमनी के पास ईंट के बने एक छोटे से कमरे की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, "उन दोनों को इसी कमरे में बंद रखा गया था ताकि उन्हें भीड़ से बचाया जा सके."

शहज़ाद और शमा ने जिस कमरे में पनाह ली थी
लेकिन जैसा कि खालिद बताते हैं कि स्थानीय मौलवी के नेतृत्व में जमा भीड़ इतनी गुस्साई थी कि कुछ लोग इस कमरे की छत पर चढ़ गए और उन्होंने छत तोड़कर दोनों को बाहर निकाल लिया.
खालिद कहते हैं, "उन दोनों को पहले तो लाठी और ईंटों से बुरी तरह मारा-पीटा गया और उसके बाद गांव के आक्रोशित लोगों ने उन दोनों को भट्ठी में झोंक दिया."
शमा तब चार महीने की गर्भवती थीं. भीड़ इस बात पर यक़ीन कर रही थी कि शहज़ादऔर शमा ने कुरान के कई पन्नों को जलाया है. शहज़ाद का परिवार आज भी इससे इनकार करता है. उनके घरवालों का कहना है कि दोनों ने अपने पिता के कुछ पुराने दस्तावेज़ों को जलाया था.
शमा और शहज़ाद की हत्या के आरोप में स्थानीय मौलवी सहित पांच लोगों को मौत की सज़ा हुई और गांव के ही आठ अन्य लोगों को हिंसा करने के आरोप में दो-दो साल की जेल की सज़ा हुई.
पाकिस्तान के इस विवादास्पद क़ानून की आग केवल ईसाइयों को नहीं जला रही है. इसका इस्तेमाल पाकिस्तान के अहमदिया मुसलमानों को सताने के लिए भी किया जा रहा है.
अहमदिया मुसलमानों को पाकिस्तान में गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक माना जाता है. क़ानून के मुताबिक़ अहमदिया अपनी इबादत की जगह को ना तो मस्जिद कह सकते हैं और ना ही कुरान की आयातें पढ़ सकते हैं.
इतना ही नहीं सार्वजनिक जगहों पर उन्हें अपनी धार्मिक आस्था को प्रदर्शित करने की इजाजत भी नहीं है.
असलम जमील (असली नाम नहीं) एक अहमदिया किसान हुआ करते थे. वे साल 2009 में दक्षिण पंजाब में अपने गेहूं के खेत में काम कर रहे थे, तब कुछ स्थानीय लोगों ने आकर कहा कि यहां से भागो.
असलम पर स्थानीय इमाम ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने का आरोप लगाया था, इसके बाद उनके जान के पीछे स्थानीय लोगों की भीड़ पड़ गई थी.
भरे हुए गले से असलम बताते हैं, "मौलवी ने आरोप लगाया था कि मैंने पैगंबर का नाम शौचालय में लिखने के लिए चार अहमदिया बच्चों को उकसाया, हालांकि खुदा जानता है कि ये झूठ है."

असलम जमील
असलम ने अंधेरा होने का इंतज़ार किया और अपने घर के पिछले दरवाज़े से निकल भागे लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि भागने से उनकी मुश्किल और बढ़ जाएगी.
ऐसे में वो कहां जाएं, ये सवाल बना हुआ था.
अगली सुबह, उन्होंने खुद को स्थानीय पुलिस स्टेशन के हवाले कर दिया. उनके केस की सुनवाई शुरू होने में दो महीने का वक्त लगा और उन्हें छह महीने जेल में बिताने पड़े.
उनका चेहरा उत्तेजित हो जाता है जब वो बताते हैं, "जज पर काफ़ी दबाव था. अदालत का पूरा कमरा मौलवियों से भरा था, लेकिन जज ने काफ़ी साहस दिखाया."
असलम पर लगे आरोपों को सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया गया. लेकिन घर लौटने के बाद असलम ने देखा कि उनके घर को लूट लिया गया है, उनके मवेशियों को भी चुरा लिया गया था.
उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि अब उन्हें देश छोड़ना होगा. उन्होंने कनाडा में शरण मांगी है.
असलम बताते हैं, "मेरे परिवार को धमकी दी गई, उन्हें परेशान किया गया. मेरी रोज़ी रोटी छीन ली गई. मुझे तबाह कर दिया गया. ज़िंदगी बचाने के लिए हम लोगों ने गांव छोड़ दिया."
जिन लोगों पर ईशनिंदा के मामले चलते हैं और जिन्हें ईशनिंदा का दोषी पाया जाता है, उनके साथ ये कलंक अदालत और जेल के बाहर भी चिपक जाता है.
शकील वाजिद (असली नाम नहीं) भी अहमदिया हैं. वे बताते हैं कि किस तरह से सुनवाई के दौरान भीड़ जमा होती है.
वे कहते हैं, "सुनवाई के दौरान जमा होने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों से निचली अदालतों के जजों पर ऊपरी अदालत के जजों की तुलना में कहीं ज़्यादा दबाव होता है. निचली अदालतों के जज के पास नाममात्र की सुरक्षा व्यवस्था होती है, उन्हें अपनी जान को भी देखना पड़ता है."
ईशनिंदा के आरोप में दोषी ठहराए जाने के बाद शकील ने पंजाब के तीन बेहद सुरक्षित जेलों में दो साल बिताए हैं.

शकील वाजिद
उन्होंने बताया कि किस तरह से ईशनिंदा के आरोपों का सामना कर रहे अभियुक्तों को एकदम अलग, अति सुरक्षा वाले बैरकों में रखा जाता है. अमूमन उन्हें मानसिक रूप से बीमार लोगों के साथ भी रखा जाता है.
ज़्यादातर समय उन्हें अपने बैरकों में बंद रखा जाता है और उनकी सुरक्षा के चलते ही उन्हें आम कैदियों के साथ खाने के लिए नहीं भेजा जाता, आशंका ये भी रहती है कि कोई उनको ज़हर ना दे दे.
शकील बताते हैं, "मेरे साथ रावलपिंडी की जेल में एक कैदी थे. वो यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर थे. वे जिस तरह से जन्नत और दोजख के बारे में बताते थे, उससे एक छात्र सहमत नहीं हुआ और उसने ईशनिंदा का मुक़दमा दर्ज करा दिया."
शकील मानते हैं कि वे उन गिने-चुने खुशकिस्मत लोगों में से हैं जिन्हें अपनी आज़ादी वापस मिली है, लेकिन आज़ादी मिलने से ज़्यादा वे इस आरोप से बरी होना चाहते हैं.
वे कहते हैं, "ईशनिंदा के इलज़ाम का चस्पा, मौत के डर से भी भयावह है. मैं इस गंभीर आरोप के साथ मरना नहीं चाहता. मैं चाहता हूं कि इस मामले में मैं बरी हो जाऊं ताकि समाज में मेरा परिवार गरिमा के साथ रह पाए."
पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानून साल 1980 के दशक से ज़्यादा सख्त बनाया गया. ऐसा देश में ध्रुवीकरण बढ़ने के साथ किया गया.
साल 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ ने हमला किया और अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी चरमपंथियों को मदद देने का अपना गुप्त अभियान शुरू किया था. पाकिस्तान अमरीका का सबसे अहम सहयोगी था.
अफ़ग़ान जिहाद में शामिल होने से पाकिस्तान को काफ़ी आर्थिक फ़ायदा मिला, लेकिन इससे देश में धार्मिक कट्टरपन भी बढ़ा.
अगले एक दशक में, देश भर में धार्मिक रूप से कट्टरपंथी समूहों की राजनीतिक और सामाजिक ताक़त तेजी से बढ़ी.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़िया उल-हक़, साल 1987
वे अब कहीं ज़्यादा सशक्त दिख रहे थे बल्कि अपनी बात मुखर रूप से रखने लगे थे.
जनरल ज़िया उल-हक़ के शासन में सरकार ने खुले तौर पर इस्लाम के बेहद कट्टर समूह वहाबियों को आगे बढ़ाया.
शरिया लागू करने के लिए क़ानून को सख़्त बनाया गया, उसमें संशोधन हुए. ताकि पाकिस्तान वास्तव में एक मुस्लिम देश बन सके.
इन हालात में पाकिस्तान की संसद ने साल 1986 में ईशनिंदा क़ानून में बदलाव किया.
मूलरूप में इस क़ानून को ब्रिटिश शासकों ने बनाया था. इस क़ानून का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के तहत हिंदू, मुसलमान, ईसाई और सिख के बीच धार्मिक कलह को नियंत्रण में रखना था.
इस क़ानून के तहत इबादत की जगह और धार्मिक वस्तुओं की सुरक्षा संभव थी. इसके अलावा धार्मिक आयोजनों में किसी तरह का व्यवधान, कब्रगाहों का अतिक्रमण और जानबूझ कर किसी की धार्मिक आस्था का अपमान करना, ये सब भी अपराध के दायरे में आता था. ऐसे मामलों में दस साल तक के कैद का प्रावधान था.
साल 1927 में राजनीतिक तनाव और विभिन्न समुदायों के बीच मनमुटाव को देखते हुए इस क़ानून का सख़्त बनाया गया था.
लेकिन साल 1986 में पाकिस्तान की संसद के नए संशोधनों से पहले तक ईशनिंदा क़ानून किसी भी धर्म का कोई पक्ष नहीं लेता था.
लेकिन 1986 में हुए संशोधनों में एक क्लॉज जोड़ा गया जिसके मुताबिक़ पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ अपमानजनक बातें भीं अपराध के दायरे में आ गईं और इसमें मौत या फिर उम्र कैद की सज़ा का प्रावधान किया गया.
सेक्शन 295-सी के इस क्लॉज का केवल एक नेता ने विरोध किया था. विरोध करने वाले नेता थे मोहम्मद हमज़ा.

मोहम्मद हमज़ा
हमज़ा की उम्र अब 90 साल से ज़्यादा हो चुकी है, वे उस दिन को आज भी याद करते हैं कि जिस दिन पाकिस्तान के नेशनल एसेंबली में इस क़ानून पर बहस हुई थी.
साल 1986 में हुई बहस में अपने संबोधन में हमज़ा ने दलील दी थी कि मौत की सज़ा की मांग करने वाले जिन इस्लामी ग्रंथों का हवाला दे रहे हैं, उस पर कोई भी फ़ैसला लेने से पहले इसकी धार्मिक विद्धानों की ओर से विस्तृत समीक्षा की ज़रूरत है. इसके बाद ही क़ानून में बदलाव के प्रस्ताव को पारित किया जाना चाहिए.
वे दावा करते हैं कि इस मुद्दे पर तब संसद में गंभीर बहस नहीं हुई थी, संसद की भूमिका गैर ज़िम्मेदाराना थी.
हमज़ा कहते हैं, "मेरा दृढ़ विश्वास है कि आप सेलेक्टिव जस्टिस (कुछ लोगों को न्याय) के साथ देश नहीं चला सकते. ऐसे क़ानून का क्या मतलब जो समाज को तोड़ने का काम करे?"
"हमारे लोग गंभीरता से सोचते नहीं हैं. वे धर्म को लेकर गैर तार्किक रूप से भावनात्मक हो जाते हैं. ऐसे में मैं जानता था कि इस क़ानून का ग़लत इस्तेमाल होगा. इसलिए मैंने इसका विरोध किया था."
उस दिन केवल हमज़ा ही क़ानून में बदलाव के ख़िलाफ़ बोले थे. उसी दिन 295-सी की धारा तत्काल प्रभाव से पारित हो गई.
हमज़ा अभी भी अपने पुराने इलाके पंजाबी शहर गोजरा में रहते हैं.
साल 2009 में आसिया को हिरासत में लिए जाने के बाद गोजरा में हिंसा भड़की और ये शहर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया.

गोजरा में एक पाकिस्तानी ईसाई महिला अपने बच्चे के साथ
क्योंकि इस शहर ईसाई सबसे बड़ी संख्या में रह रहे थे और ये अफ़वाह फैली कि इलाके में कुरान के पन्नों को अपवित्र किया गया है.
इसके बाद बस्तियों पर भीड़ ने हमला कर दिया और कई घरों में आग लगा दिया. आठ ईसाई ज़िंदा जला दिए गए.
बहुत गंभीर और धीमे आवाज़ में हमज़ा हमलों को याद करते हैं.
वे कहते हैं, "वो एक उदास दिन था. आरोपों में कोई सत्यता नहीं थी, लेकिन भीड़ आक्रोशित थी. अधिकारी जो कह रहे थे, उन पर उनका कोई ध्यान नहीं था और हालात नियंत्रण से बाहर हो गए थे."

गोजरा में दो पाकिस्तानी ईसाई अपने जले हुए घरों के बाहर, तस्वीर साल 2009 की है
पाकिस्तान के सेंटर फ़ॉर सोशल जस्टिस के मुताबिक़ जब से ईशनिंदा के मामलों में मौत की सज़ा का प्रावधान जुड़ा है तबसे ऐसे मामलों की संख्या काफ़ी बढ़ी है.
हमज़ा बताते हैं, "जिस तरह से इस क़ानून का ग़लत इस्तेमाल कमज़ोर लोगों के ख़िलाफ़ हुआ है, उससे मैं खिन्न महसूस करता हूं. धर्म एक तरह से मज़बूत राजनीतिक हथियार बन चुका है, अब ये वरदान नहीं हो कर अब श्राप बन चुका है."
इस क़ानून के आलोचकों का मानना है कि ज़मीनी स्तर पर पवित्र ग्रंथ की बातों को तोड़ मरोड़कर, ईशनिंदा का आरोप लगाकर हिंसा होती है.
पाकिस्तान में हज़ारों बच्चे मदरसे या फिर इस्लामिक बोर्डिंग स्कूल (जहां मुफ्त में पढ़ाई होती है और ये सरकारी स्कूलों के विकल्प के तौर पर काम करते हैं) में पढ़ते हैं. कई मदरसों में इस्लामी कट्टरपंथ के बारे में पढ़ाया जाता है, जिसमें ईशनिंदा को लेकर लगातार बातें होती हैं.
इससे ईशनिंदा को लेकर इतना शर्म का भाव होता है कि कुछ लोगों के दिमाग में ये बात धंस जाती है कि वे खुद को नुक़सान पहुंचाने का भी सोचने लगते हैं.
16 साल के क़ादिर (असली नाम नहीं है) एक आम किशोर हैं. वे ओकरा ज़िले के एक छोटे से गांव में रहते हैं. अपनी उम्र के आम बच्चों की तरह वे आम तौर पर अपने पिता की खेती में मदद करते हैं.
पाकिस्तान के ग्रामीण इलाकों में साक्षरता दर बेहद कम होती है, ऐसे में किशोर उम्र के बच्चे और उनके परिवार वाले धार्मिक मामलों में स्थानीय इमाम की बात अंतिम सत्य मानते हैं.

क़ादिर के गांव की मस्जिद के भीतर का दृश्य
जनवरी, 2016 में क़ादिर एक स्थानीय मस्जिद में नमाज के लिए गए. मौलवी ने लोगों को शांत करने के लिए एक सवाल पूछा, "आप में से कौन मोहम्मद को मानते हैं?"
क़ादिर को झपकी आ रही थी, बाक़ी लोगों ने अपने हाथ खड़े कर लिए.
मौलवी ने भीड़ से फिर कहा, "आप लोगों में से कौन मोहम्मद की बातों को नहीं मानते हैं?"
क़ादिर ने आधी नींद में अनजाने में अपना हाथ उठा दिया, इसके बाद मौलवी ने सार्वजनिक तौर पर ख़ूब डांटा फटकारा और मोहम्मद के अपमान का आरोप क़ादिर पर लगा दिया.
क़ादिर इससे काफी दुखी हुए. जब सब लोग अपने अपने घर चले गए तो क़ादिर मस्जिद के पीछे जाकर बैठ गए, वह खुद को तसल्ली देना चाहते थे.
वो गंभीरता से बताते हैं, "मैं मोहम्मद के प्रति अपने प्रेम को साबित करना चाहता था."
अपनी आस्था साबित करने के लिए क़ादिर को लगा कि उसे खुद अपना हाथ काट लेना चाहिए. इसके बाद उसने घास काटने वाली मशीन के सामने अपना दायां हाथ रख कर खुद से कलाई से हाथ काट लिया.

घास काटने वाली मशीन
क़ादिर ने बताया, "दर्द का कोई सवाल ही नहीं था. मैंने अपने पैगंबर से मोहब्बत के लिए ऐसा किया था. मैं उन्हें ये सौंपना चाहता था."
उन्होंने कटे हुए हाथ को एक थाली में रखा, उसे सफेद कपड़े से ढका और मस्जिद पहुंचकर मौलवी से अपनी ग़लती के लिए मुक्ति की मांग की.
अगले कुछ दिनों में आस-पास के गांव और शहरों से लोग आकर क़ादिर को सम्मान देने लगे और पैगंबर के प्रति उसके प्रेम की प्रशंसा करने लगे.
दो साल बाद अब क़ादिर अपना ज़्यादातर समय स्थानीय मदरसे में कुरान पढ़ते हुए बिताते हैं. लेकिन वो कहते हैं कि उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है.
वो कहते हैं, "मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि लोग क्या कहते हैं. ये मेरे और पैगंबर के बीच की बात है. आप इसे नहीं समझ सकतीं."
तस्वीरः क़ादिर के गांव की मस्जिद
लाहौर हाईकोर्ट के सामने आस-पास की इमारतें बौनी नजर आती हैं. ये शहर के ऐतिहासिक मॉल रोड पर स्थित है. लाल ईंट से बनी इमारत पर ऊंचे सफ़ेद गुंबद लगे हुए हैं. ये शहर की उन इमारतों में है जो लोगों को ब्रिटिश राज की याद दिलाती हैं.
हाई कोर्ट के आस-पास कई वकीलों के चैंबर्स हैं, जिनमें उनके जर्जर कार्यालय हैं. हाई कोर्ट की ठीक पीछे एक छोटा सा प्लाज़ा है. एक व्यस्त चाय की दुकान के ऊपर गुलाम मुस्तफ़ा चौधरी का चैंबर है.
चौधरी ईशनिंदा का विरोध करने वाले वकीलों के समूह 'ख़त्मे नबुवत' (मोहम्मद ही अल्लाह द्वारा भेजे गए अंतिम पैग़ंबर थे) के अध्यक्ष हैं.
ये लोग उन मुसलमानों को मुफ़्त सेवा देते हैं जो ईशनिंदा का मुक़दमा दर्ज कराना चाहते हैं.

एडवोकेट चौधरी ग़ुलाम मुस्तफा
इस समूह के साथ देश भर में कोई 800 स्वयंसेवक वकील काम करते हैं.
चौधरी बताते हैं, "जब देश भर में हमारी नज़र में कोई ईशनिंदा का मामला सामने आता है तो हम शिकायत करने वाले लोगों तक पहुंचते हैं और उन्हें मुफ्त में क़ानूनी मदद मुहैया कराते हैं."
"हम ऐसा अल्लाह को ख़ुश करने और पैगंबर मोहम्मद के सम्मान की रक्षा करने के लिए कर रहे हैं, हमें पैसे का कोई लोभ नहीं है."
चौधरी ने वकील के तौर पर अपना करियर शुरू करने के बाद ये फोरम करीब 18 साल पहले स्थापित किया था, अब उनकी उम्र 50 साल के पार हो चुकी है. वे बताते हैं कि ये काम उनके लिए मिशन जैसा है.
वे बताते हैं, "ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. ईशनिंदा के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. अकेले लाहौर में 40 ईशनिंदा के मामले दर्ज हुए हैं. जो लोग ईशनिंदा करते हैं उन्हें हीरो की तरह पेश किया जाता है, ये दुखद है."
जिस तरह से आसिया बीबी का मामला सामने आया है, उससे चौधरी खुश नहीं हैं.
वे कहते हैं, "उन्होंने पैगंबर का अपमान किया था, लेकिन पश्चिम में उन्हें हीरो की तरह देखा जा रहा है."

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की लाहौर बेंच में एडवोकेट चौधरी ग़ुलाम मुस्तफा ने आसिया बीबी के ख़िलाफ़ याचिकाकर्ता (दाहिने) का प्रतिनिधित्व किया
चौधरी सलमान तासीर की हत्या करने वाले मुमताज़ क़ादरी के भी वकील थे. उनके मुताबिक़ ईशनिंदा का क़ानून वरदान की तरह है और इससे 'भीड़ का इंसाफ़' करने के मौके सामने नहीं आते.
वे आगे बताते हैं, "मुमताज़ क़ादरी पुलिस के पास गवर्नर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराने गए थे, लेकिन उनकी शिकायत सुनी नहीं गई. वे अपने हाथों में बंदूक़ उठाने के लिए मज़बूर नहीं होते अगर क़ानून ने अपना काम किया होता."
आसिया बीबी के मामले में क़ानून ने अपना काम किया, देश की सर्वोच्च अदालत तक मामला पहुंचा.
हालांकि उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं मिले, इसके बाद भी हिंसक प्रदर्शन हुए.
31 अक्टूबर को अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में जजों ने लिखा है, "ये अजीब संयोग है कि परिवादी का नाम आसिया का अरबी में मतलब दुराचारी होता है लेकिन इस मामले में जो परिस्थितजन्य साक्ष्य हैं उसे शेक्सपीयर के किंग लायर के शब्दों में कहा जाए तो उसके साथ पाप करने से ज्यादा पाप हुआ है."
इसके बावजूद सरकार आसिया बीबी को बरी किए जाने पर सु्प्रीम कोर्ट के फ़ैसले की समीक्षा करानेके लिए तैयार हो गई.
सरकार विरोध प्रदर्शन करने वालों को हटाना चाहती थी लेकिन बाद में सरकार ने तहरीक-ए-लबैक पर कार्रवाई की.
तहरीक-ए-लबैक के फायरब्रैंड नेता ख़ादिम हुसैन रिज़वी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया.
आसिया के परिवारवालों को क़रीब तीन महीने तक गोपनीय जगह पर रखा गया. वह कोर्ट से बरी ज़रूर हो गईं थीं लेकिन आज़ाद नहीं हो पाई थीं.

आसिया के शौहर आशिक़ मसीह अपनी बेटियों ईशम (दाहिने) और ईशा (बीच में) के साथ
आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर 29 जनवरी को सुनवाई की. सुनवाई कुछ घंटे तक चली.
गुलाम मुस्तफ़ा चौधरी आसिया बीबी के ख़िलाफ़ वादी सलीम के वकील के तौर पर पेश हुए थे.
वे आसिया बीबी को बरी किए जाने के फ़ैसले में कोई ग़लती नहीं साबित कर पाए. ऐसे में कोर्ट ने याचिका ख़ारिज करते हुए पुराने फ़ैसले को कायम रखा.
पाकिस्तान के चीफ़ जस्टिस ने कहा कि आसिया के ख़िलाफ़ बयान देने वालों की गवाही में एकरूपता नहीं थी. उन्होंने ये भी कहा, "झूठी गवाहियों पर हम किसी को फांसी पर कैसे चढ़ा सकते हैं."

इस्लामाबाद में सुप्रीम कोर्ट के बाहर क़ारी सलाम (बाएं) और उनके वकील चौधरी ग़ुलाम मुस्तफा मीडिया से बात करते हुए
इस पूरे मामले को देखने के बाद, ये कहा जा सकता है कि क्या दुर्भाग्य है कि झूठी गवाहियों पर आधारित एक मुक़दमे से पूरे देश का सामाजिक ताना बाना प्रभावित रहा. आख़िर में जब सरकार ने अपनी ताक़त दिखाई तो क़ानून का राज स्थापित हुआ.
इसका संदेश साफ़ है, 'भीड़ का आदेश या फिर शासन पाकिस्तान में नहीं चलेगा.'
इससे ये भी स्पष्ट हुआ कि ईशनिंदा क़ानून का ग़लत इस्तेमाल की भी देश में इजाजत नहीं है.
यह पाकिस्तान के लिए ऐतिहासिक पल था. लेकिन यह क़ानून अभी भी मौजूद है. कोई भी इसमें संशोधन या फिर उसे वापस किए जाने की बात नहीं कर रहा है.
सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान भट्टी की हत्याएं अभी भी पूरे देश की आत्मा को झकझोर रही हैं.









