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बतौर पत्रकार, जो कुछ मैंने देखा... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पंजाब के जालंधर में बतौर पत्रकार 21 नवंबर, 1981 की तारीख को मैंने अपना कामकाज संभाल लिया था. अभी अपना काम शुरू किए मुझे एक सप्ताह ही बीता था कि मुझे चरमपंथी सिख संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले से मुलाक़ात का मौक़ा मिला. मुलाक़ात, अमृतसर से 35 किलोमीटर दूर चौक मेहता स्थित उनके मुख्यालय में. 29 नवंबर की रात सिखों की एक धर्म प्रचार संस्था, दमदमी टकसाल के अहाते में धमाका हुआ जिसमें जरनैल सिंह के तीन शिष्यों की मौत हो गई. जरनैल इस संस्था के प्रमुख थे उन दिनों. मैंने और जिओ मैगजीन के एक जर्मन पत्रकार ने धमाके की जगह का निरीक्षण किया. हमने देखा की तीनों मृतकों के शव सफेद कपड़ों में लिपटे पड़े हुए थे. मुआयना करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुँचे कि जिस विस्फोटक की वजह से मौतें हुई हैं, वो दरअसल, बाहर से नहीं लगाए गए थे. हालांकि ऑल इंडिया सिख फ़डरेशन के अध्यक्ष अमरीक सिंह ऐसा ही दावा कर रहे थे. बाद में यह साबित भी हो गया था कि एक देसी बम उस समय फटा जब उसे बालू से भरी बाल्टी में रखकर कहीं और रखने का काम किया जा रहा था. हम लोगों ने बालू से आधी भरी लोहे की बाल्टी भी देखी थी. उस समय पंजाब में ख़ालिस्तान की माँग ज़ोर पकड़ रही थी. सितंबर, 1981 में पंजाब केसरी अख़बार के संस्थापक संपादक लाला जगत नारायण की हत्या के 11 दिन बाद यानी 20 सितंबर 1981 को भिंडरांवाले के आत्मसमर्पण कर दिया था. उन्हें गिरफ़्तार किया गया और फिर 29 सितंबर को उनकी रिहाई भी हो गई, बिना किसी आरोप के. इस घटनाक्रम के बाद भिंडरांवाले पंजाब में एक चर्चित शख़्सियत बन चुके थे. कई बातें सामने आ रही थीं. मसलन, ख़ालिस्तानी मुद्रा, जिसे सिखों की एक आबादी गर्व के साथ अपने पास जमा कर रही थी. इस जर्मन पत्रकार ने कुछ ख़ालिस्तानी मुद्रा मुझको दिखाईं भी. टकसाल में भिंडरांवाले से मिलकर हम लोग एक ही साथ अपने पैतृक शहर अमृतसर पहुँचे और स्वर्ण मंदिर का दौरा किया. इसके बाद हम होटल मोहन इंटरनेशनल पहुँचे जहाँ जर्मन पत्रकार रुके हुए थे. हम दोनों ने बम धमाके पर तफ़्सील से बातचीत की और विस्फ़ोटकों के कुछ रफ़ स्केच भी बनाए. इस दौरान हम लोग पंजाब पुलिस की नज़र में आ चुके थे. ऐसा स्वभाविक भी था. विश्वास तब हो गया जब अगली सुबह मुझे एक सिख पुलिस इंस्पेक्टर रंधावा ने रोका और मेरी तलाशी ली. बम स्केचों के बारे में बहुत सारे सवाल करने के बाद इंस्पेक्टर रंधावा जिस एक बात से सबसे ज़्यादा विचलित नज़र आए, वो था मेरे ब्रीफ़केस से मिला सिगरेट का पैकेट. मैं यूएनआई के पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान का सबूत उन्हें दे चुका था पर उन्होंने मुझसे कहा कि मैं पंजाब में सिगरेट नहीं पी सकता क्योंकि तंबाकू सिख धर्म में निषेध है. दूसरी बात यह थी कि पंजाब में पुलिस को अपनी दाढ़ी को खुला छोड़ने की इजाज़त नहीं थी पर उस समय चरमपंथ की प्रभाव में सिखों का एक तबक़ा पुलिस में रहते हुए भी दाढ़ी को बांधना छोड़ चुका था. इन दोनों बातों का ज़िक्र मैंने जालंधर रेंज के उन दिनों डीआईजी रहे एएस अटवाल के किया तो उन्होंने भी अपनी चिंता ही व्यक्त की. कोई लगभग दो वर्ष बाद यानी 25 अप्रैल, 1983 में अठवाल को गोली मार दी गई. अठवाल उस वक़्त खालिस्तानी चरमपंथियों की गोली के शिकार बने जब के अपने हाथों में प्रसाद लेकर अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर परिसर से बाहर आ रहे थे. ********************************* ...और इस तरह पंजाब में हिंदू और सिख बंट गए अभी छह अक्टूबर, 1982 की सुबह होने में देर थी, बाहर पौ भी न फटी थी कि मेरे फ़ोन की लगातार बजती घंटियों ने मुझे जगा दिया. संदेश मिला कि पंजाब परिवहन की बस से उतारकर छह हिंदू यात्रियों की हत्या कर दी गई है. गोली मारने वाले सिख थे. मैं तेज़ी से अमृतसर-जालंधर को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग की ओर लपका. पंजाब पिछले एक साल से इस तरह की हिंसक घटनाओं से रूबरू था. इसका असर यह था कि चश्मदीदों ने मुझे बताया कि उन्होंने पाँच अक्टूबर की आधी रात के बाद गोलियाँ चलने की आवाज़ सुनी पर बाहर निकलकर वजह जानने की हिम्मत नहीं की. सुबह-सुबह जागे गांववालों ने हमें बताया कि पुलिस सुबह होने के बाद ही वहाँ पहुँची, शवों को वहाँ से हटाया और आठ घायलों को अस्पताल भेजा. खून से रंगी ज़मीन रात के हमले की कहानी कह रही थी. घायलों और बचे लोगों ने बताया कि कंबलों में लिपटे कम से कम चार सिख हमलावर आए. उन्होंने बस से सभी लोगों को उतारा और फिर सिखों को अलग कर हिंदुओं को एक कतार में खड़ा कर दिया. कतार में खड़े हिंदुओं पर कार्बाइन से गोलियाँ उगल दी गईं. इस दौरान बस वहीं खड़ी रही. हालांकि हिंदुओं के ख़िलाफ़ हमलों का सिलसिला लाला जगत नारायण की हत्या के साथ शुरू हो चुका था पर यह पहला मौक़ा था जब मासूम हिंदुओं को सिख चरमपंथियों का निशाना बनाया गया था. इससे राज्य हिंदू-सिख के बीच विभाजन की राह पर चल पड़ा. यह स्थिति 1991 तक बनी रही. उधर, आम हिंदुओं की हत्या की इस घटना के बाद केंद्र में सत्तारूढ़ इंदिरा गांधी ने अपनी ही पार्टी की दरबारा सिंह की राज्य सरकार को भंग कर दिया. राज्य सीधे केंद्र के नियंत्रण में आ गया. उस वक़्त ज्ञानी जैल सिंह देश के गृहमंत्री थे. ********************************************** जब बीबीसी के मार्क टली भिंडरांवाले से मिलने पहुंचे... अमृतसर में वर्ष 1982 का बादलों से घिरा, ठिठुरन भरी ठंड वाला एक दिन. आज दरबार साहिब यानी स्वर्ण मंदिर परिसर में धूप दिखने का नाम नहीं ले रही थी और इस वजह से संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले गुरुनानक निवास की छत पर अपना रोज़ाना का ‘दरबार’ नहीं लगा पा रहे थे. गुरुनानक निवास के कमरा नंबर 47 में खाट पर भिंडरांवाले अपने युवा और जोशीले साथियों के साथ बातचीत कर रहे थे. उनके पास एक दूसरे पलंग पर मैं अधलेटा पड़ा हुआ था. अभी बातचीत चल रही रही थी कि संत भिंडरांवाले ने मुझसे कहा कि कोई अंगरेज़ पत्रकार मिलने आ रहे हैं. मैं थोड़ा सीधा हुआ ताकि उनके बैठने के लिए जगह बना सकूँ. कुछ देर बाद देखा तो सामने बीबीसी के ब्रितानी पत्रकार मार्क टली थे. उनके साथ एक युवा महिला पत्रकार भी थीं. भिंडरांवाले ने उन लोगों के लिए स्पेशल चाय लाने के लिए कहा और मेरे ज़िम्मे उनके और ब्रितानी पत्रकार के बीच दुभाषिए का काम सौंपा, क्योंकि उस समय कमरे में उनके अधिकारिक दुभाषिए हरिमंदिर सिंह संधू नहीं थे. अमृतसर खालसा कॉलेज से ग्रेजुएट, संधू ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन के महासचिव थे. दूध में पकाए गए केसर की चाय पीतल के प्यालों में लाई गई. चाय आने से पहले ही इंटरव्यू शुरू हो गया. सिर पर भगवा रंग का रूमाल बांधे मार्क टली यह चाय पीते हुए कुछ असहज दिख रहे थे. इस इंटरव्यू का सबसे ख़ास हिस्सा वो था जब भिंडरांवाले ने कहा कि वो आतंकवादी नहीं बल्कि शुद्धतावादी हैं और चाहते हैं कि हिंदू भी अपने धर्म के प्रति शुद्धतावादी हों. उनका कहना था, “मुझे उन हिंदुओं से कोई परेशानी नहीं है जो अपने धर्म के अनुसार सभी संस्कार और अनुष्ठानों का पालन करते हैं.” उसके बाद भिंडरांवाले ने माथा, दोनों कान की पालि और ठुड्डी जैसे शरीर के 16 हिस्से दिखाए और बताया कि इन हिस्सों में हिंदुओं को रोज़ तिलक लगाकर अपनी धर्म के प्रति प्रतिबद्धता का सबूत देना चाहिए. ठीक वैसे ही, जैसे कोई सिख बिना बाल कटवाए, पगड़ी और कड़ा पहनकर देता है. मार्क टली और उनकी महिला साथी के जाने के बाद मैंने भिंडरांवाले से कहा कि अगर हिंदू आपकी बात मानकर अपने शरीर के 16 हिस्सों पर तिलक लगाने लगें तो बंदर जैसे लगने लगेंगे. एक हिंदू पत्रकार के मुंह से ऐसा सुनकर भिंडरांवाले अवाक रह गए. लेकिन कमरे में मौजूद उनके चेले, संधू और बाकी लोगों के ठहाके फूट पड़े. इसके बाद मेरे ताल्लुकात भिंडरांवाले से और प्रगाढ़ होते गए. उस आदमी से, जिसके जीते जी हिंदू उससे ख़ौफ़ खाते थे. ********************************************** पत्रकारिता से जुड़े लोग भी निशाना बने पंजाब के जालंधर का गर्म थपेड़े की दोपहर वाला एक दिन. मई का महीना, वर्ष 1984. यूएनआई से मेरे दो सहकर्मी, जाल कंबाटा और वीके वरदाराजन 11 मई की सुबह जालंधर पहुँचे थे. मैंने उनके साथ घर पर बीयर पी और फिर हमने खाना खाया. वैसे दिन में बीयर पीना बहुत कम ही होता था. अरे बता दूँ, मेरे दोनों मित्र अब भी पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन दिनों लोग यूँ ही पंजाब नहीं आते थे लेकिन वरदराजन को उसकी उत्सुकता पंजाब खींच लाई थी. उनकी यह पहली पंजाब यात्रा थी. दोपहर का भोजन और आराम के बाद, (जिनका हो पाना उन दिनों के पंजाब में पत्रकारों के लिए किसी विलास से कम न था) हम तीनों ही जालंधर की पुरानी गलियों में स्थित यूएनआई के अपने दफ़्तर की सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे कि दफ़्तर में फ़ोन की घंटियाँ घनघना उठीं. शाम के पाँच बज रहे थे. फ़ोन की घंटी की आवाज़ पर मैं दफ़्तर के कमरे की ओर लपका. फ़ोन पर ट्रिब्यून के घबराए एक संवाददाता चतुर्वेदी की आवाज़ थी, “रमेशजी को गोली मार दी गई है.” इस ख़बर पर अविश्वास करने का मेरे पास कोई कारण नहीं था, क्योंकि नामदेव चौक जहाँ पंजाब केसरी के इस संपादक और उनके कार ड्राइवर को 9एमएम स्टेन कार्बाइन की गोलियों से भून दिया गया था, वहीं चतुर्वेदी रहते थे. मैंने चिल्लाकर वरदाराजन और जाल को यह ख़बर दी और दफ़्तर आने को कहा. हमारा शाम का तय निजी कार्यक्रम यहीं ख़त्म हो चुका था. रमेश चंद्र के मौत की पहली ख़बर का तार देने के बाद मैंने जाल से कहा कि वे दोनों टेलीफ़ोन के पास बैठें और मेरी और जानकारियों की प्रतीक्षा करें. मैंने अपने मोटरसाइकिल से प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) के दफ़्तर की ओर भागा जो घटनास्थल से महज 20 मीटर की दूरी पर स्थित था. घटनास्थल की ओर बढ़ते हुए मैंने देखा कि एक सफ़ेद अंबेसडर कार की पिछली सीट पर रमेश दाहिनी ओर लुढ़के पड़े थे. कार के आगे की सीट का दरवाजा खुला पड़ा था. ड्राइवर को संभवत: इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया था. कुछ दूर पर कुछ लोग पुलिस की एक जिप्सी, जिसपर उप पुलिस अधीक्षक समेत छह पुलिसवाले सवार थे, पथराव कर रहे थे. मैंने कार के अगले दरवाजे से रमेश जी के शरीर को छुआ और फिर तेज़ क़दमों से पीआईबी दफ़्तर लौट आया. पीआईबी के लोग मुझसे पूछ रहे थे कि मैंने क्या देखा. इसी बीच मैंने दफ़्तर फ़ोन किया और जाल को सारी बातें बताई. पाँच मिनट के बाद मैं अपने दफ़्तर में था. मेरे साथी यूएनआई के तार पर दो टेक में मेरे द्वारा दिया गया विवरण भेज चुके थे. उसी शाम शहर में जलाई गई अनेक इमारतों में पीआईबी का दफ़्तर और पुस्तकालय भी शामिल था. शाम तक शहर ने कर्फ़्यू की चादर ओढ़ ली थी. (वरिष्ठ पत्रकार सुरेंदर अरोड़ा वर्ष 1981 में यूएनआई समाचार सेवा के लिए बतौर पत्रकार पंजाब के जालंधर में नियुक्त हुए. इन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन का 20 बरस से ज़्यादा का समय पंजाब में रिपोर्टिंग करते बिताया है.) |
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