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बुधवार, 12 नवंबर, 2008 को 13:07 GMT तक के समाचार
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दो सीपीएम नेताओं को आजीवन कारावास

सुहरिद दत्ता और देबू मलिक
मंगवार को अदालत ने सुहरिद दत्ता और देबू मलिक को दोषी पाया था.
पश्चिम बंगाल के एक कोर्ट ने तापसी मलिक हत्याकांड में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के दो नेताओं को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है.

मंगवार को इसी आदालत ने सुहरिद दत्ता और देबू मलिक को तापसी मलिक की हत्या और षडयंत्र रचने का दोषी पाया था.

बुधवार को पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले के चंदन नगर के अतिरिक्त मुख्य न्यायाधीश अमर कांति आचार्य ने दोनों नेताओं को आजीवन कारावास की सज़ा सनाई.

उल्लेखनीय है कि 18 वर्षीया तापसी मलिक सिंगुर में ज़मीन का अधिग्रहण का विरोध करने वालों में ख़ासी सक्रिय थीं. 18 दिसंबर 2006 को तापसी मलिक की लाश बुरी तरह से जली हुई हालत सिंगुर के एक खेत में मिली थी.

सुहरिद दत्ता पश्चिमी बंगाल में सीपीएम के ज़िला स्तर के जाने-माने नेता हैं और देबू मलिक पार्टी के कार्यकर्ता हैं.

उनके वकील का कहना है कि वे इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ उच्च न्यायालय में ज़ल्दी ही अपील करेंगे.

उधर तापसी मलिक के पिता फ़ैसले से खुश है लेकिन वो कहते हैं, “मै खुश हूँ कि मुल्ज़िमों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है, लेकिन मैं बहुत ख़ुश होता यदि उन्हें फांसी दी जाती.”

तृणमूल का विरोध

तापसी मलिक के माता-पिता फ़ैसले से ख़ुश हैं.

ग़ौरतलब है कि जब तापसी मलिक की कोलकाता के नज़दीक सिंगुर में लाश मिली, उस समय टाटा उद्योग समूह अपनी प्रस्तावित कार फ़ैक्टरी के लिए ज़मीन अधिग्रहण प्रक्रिया में जुटा हुआ था.

हालाँकि कई प्रभावित किसानों ने वहाँ भूमि अधिग्रहण का विरोध नहीं किया था, लेकिन कई किसानों ने तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के समर्थन के साथ इस प्रक्रिया का विरोध किया था.

तापसी मलिक भी विरोध करने वाले लोगों में आगे थीं.

इस घटना के एक महीने बाद हत्या की जाँच को केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया था. इसके बाद सीबीआई ने सत्तारूढ़ सीपीएम के वरिष्ठ नेता सुहरिद दत्ता और देबू मलिक को गिरफ़्तार किया था.

सीबीआई ने उनके ख़िलाफ़ एक विस्तृत चार्जशीट भी दाख़िल की थी. जानकारों के मुताबिक सीपीएम ने सिंगुर में विपक्षी पार्टियों के विरोध को कुचलने की ज़िम्मेदारी सुहरिद दत्ता और उनके सहयोगी देबू मलिक को सौंपा था लेकिन उनकी गिरफ़्तारी के बाद मार्क्सवादी पार्टी को धक्का लगा.

मई 2008 में पंचायती चुनाव में सिंगुर में तृणमूल कांग्रेस ने सीपीएम को हरा दिया था और तृणमूल कांग्रेस ने अनिच्छुक ग्रामीणों की ज़मीन वापसी के अपने संघर्ष को और तेज़ किया था.

सिंगुर में कड़े विरोध के कारण ही टाटा ने अक्तूबर में नैनो कार बनाने की अपनी फ़ैक्ट्री को पश्चिम बंगाल से बाहर गुजरात ले जाने का निश्चय किया था.

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