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गोहाना में फिर तनाव, कई दलित भागे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हरियाणा के सोनीपत ज़िले के गोहाना क़स्बे में जाट समुदाय की ओर से 16 सितंबर को बुलाई महापंचायत के कारण जाट और दलित समुदायो के बीच दोबारा तनाव पैदा हो गया है और भयभीत हुए कई दलित परिवारों ने दिल्ली में शरण ली है. पिछले महीने एक दलित युवक - राकेश कुमार की अज्ञात हमलावरों ने हत्या कर दी थी जिसके बाद कुछ दिन तक गोहाना में स्थिति ख़ासी तनावपूर्ण रही थी. अनेक दलित संगठनों ने उस समय हत्या के विरोध में प्रदर्शन किए थे और रैलियाँ भी की थीं. दिल्ली पहुँचे गोहाना के दलितों का कहना है कि उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं कि यदि वे अपनी सलामती चाहते हैं तो गोहाना छोड़कर चले जाएँ. उधर प्रशासन का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है. हरियाणा पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि पुलिस पूरी कोशिश कर रही है कि 16 सितंबर की प्रस्तावित महापंचायत को रोक दिया जाए या फिर स्थगित कर दिया जाए. जाट-दलित तनाव महत्वपूर्ण है कि गोहाना में जाट-दलित तनाव ख़ासा पुराना है. दो साल पहले वहाँ एक जाट व्यक्ति की हत्या हुई थी जिसके लिए जाट समुदाय के सदस्य, दलित समुदाय के राकेश कुमार को दोषी मानते थे. लेकिन केंद्रीय जाँच ब्यूरो ने उस मामले में जाँच में राकेश कुमार पर ऐसे कोई आरोप नहीं लगाए. जाट समुदाय के सदस्यों पर उस समय आरोप लगा था कि उस समय अनेक दलितों के घर जलाए जाने के मामले में जाट समुदाय के सदस्यों का हाथ है. इसके बाद पिछली 28 अगस्त को गोहाना में राकेश कुमार उर्फ़ लारा की अज्ञात हमलावरों ने हत्या कर दी. उस समय सोनीपत के पुलिस अधीक्षक नवदीप विर्क कहते हैं, "इस व्यक्ति -राकेश कुमार की आपराधिक पृष्ठभूमि थी. उनके ख़िलाफ़ हत्या से लेकर डकैती तक के सात मामले दर्ज थे. हो सकता है कि आपसी रंजिश में किसी ने उनकी हत्या की हो, हम जाँच कर रहे हैं." भयभीत दलित उस समय दलित समुदाय की ओर से अनेक रोष प्रदर्शन हुए लेकिन मामला कुछ दिन में ठंडा पड़ता दिखा. इसके बाद अब जाट समुदाय ने महापंचायत का आहवान किया है तो स्थिति फिर बिगड़ती नज़र आ रही है. गोहाना से दिल्ली पहुँची दलित समुदाय की सदस्य आशा ने बीबीसी को बताया, "गोहाना में हर रोज़ हमें धमकियाँ मिलती थीं. वहाँ हमारे 50 परिवार रहते हैं लेकिन अब लगभग सभी गोहाना छोड़ चुके हैं." एक छात्रा काजल का कहना था कि स्कूल में शिक्षकों का रवैया भी बुरा था. काजल के अनुसार एक शिक्षक का कहना था, "तुम्हें पढ़-लिखकर क्या करना है?" दलितों के नेता दशरथ रावन का कहना था, "पिछले दो साल से इन लोगों को विभिन्न प्रकार की धमकियाँ दी जा रही हैं. सरकार ऊँजी जात के लोगों को रोकनी की कोशिश नहीं कर रही. जब कातिलों को पकड़ने की माँग की जाती है तो लाठियाँ बरसाई जाती हैं." | इससे जुड़ी ख़बरें कल भी हम झोपड़ी में थे, आज भी...30 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस दलित आंदोलन: अंबेडकर के बाद05 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना दलितों के प्रति हिंसा: एक नज़र05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस दलितों ने माँगा पूजा का अधिकार12 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस दलित आंदोलन और राजनीति की कमियाँ05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस मानवाधिकार और दलित समाज की स्थिति05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस दलित होने का मतलब और मर्म05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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