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शुक्रवार, 10 अगस्त, 2007 को 16:57 GMT तक के समाचार
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एक शताब्दी से ज़्यादा के अनुभव

हबीब मियाँ
मियाँ के पेंशन काग़ज़ात के मुताबिक वे 70 साल पहले रिटायर हुए थे
आज़ादी के बाद से देश ने तरक्क़ी तो बहुत की है लेकिन लोगों में अब पहले जैसा प्यार नहीं रहा. पहले लोगों में मोहब्बत और अख़लाक़ था लेकिन अब वो बात कहाँ.

हमने तो अपनी 138 साल की उम्र के सफ़र में 60 साल पहले हुए भारत-पाकिस्तान बँटवारे को महसूस किया है, राजे-रजवाड़ों का राज देखा तो वहीं अंग्रेज़ हुकूमत और आज़ाद भारत का शासन भी देखा.

"पहले न हिंदू था, न मुसलमान. हिंदू मुसलमान पर मरता था और मुसलमान हिंदू पर". हिंदू का फ़ैसला मुसलमान करते तो मुसलमान का हिंदू. कोई विवाद होने पर आपस में बैठकर प्यार से सुलझा लेते.

पहले और बाद का फ़र्क

लेकिन अब इसमें फ़र्क़ आ गया है. हमने आजा़दी के बाद तरक्की तो बहुत कर ली लेकिन भाई सुख तो पहले ही था. अब वैसा सुख नहीं रहा. पचास साल पहले आँखों की रोशनी खो दी तो क्या, दिल की आँखों से अब भी दुनिया देख रहे हैं.

फ़र्क़
 पहले न हिंदू था, न मुसलमान. हिंदू मुसलमान पर मरता था और मुसलमान हिंदू पर’. हिंदू का फ़ैसला मुसलमान करते तो मुसलमान का हिंदू. कोई विवाद होने पर आपस में बैठकर प्यार से सुलझा लेते
हबीब मियाँ

देखो पहले जयपुर छोटा था, बस ज़मीन पर मकान बना लो, पट्टा मुफ़्त मिल जाता था लेकिन इंसानों की भीड़ बढ़ी तो कई समस्याएं पैदा हो गईं.

तुलसीदास ने कहा कि दया धर्म का मूल है, पाप या अभिमान नहीं. जब कि मुस्लिमों के लिए कहा गया कि, जिसमें शर्म नहीं, उसका ईमान कहाँ.

उस ज़माने में एक हिंदोस्तान था, पाकिस्तान तो था नहीं. कई तरह का फ़र्क आया है. जिसमें कुछ अच्छा है, और कुछ ख़राब. तब साहब या हाकिम का मतलब अंग्रेज़ होता था.

देश आज़ाद हुआ तो एक व्यक्ति किसी साहब का दस्तखत कराने गया लेकिन साहब को ढूँढता ही रहा. अंग्रेज़ चले गए और अपने साहब पीछे छोड़ गए.

हम तो महात्मा गांधी को ही सच मायनों में राष्ट्रपिता मानते हैं. वह हिंदू- मुसलमान को बराबर मानते थे. आज़ादी के बाद विवाद हुआ तो उन्होंने नेहरू और जिन्ना दोनों को वज़ीर बनाने की बात कही थी. हालांकि बात बनी नहीं थी.

हसरत
 कोई कहता है कि मेरा जीना दुश्वार है, मैं तो कहता हूँ कि मेरा मरना दुश्वार कर दिया. हज करने गया तो मदीना नहीं देख पाया. कोई मुझे एक आँख दे दे, मेरी हसरत मदीना की सूरत देखने की है. काश मुझे कोई मदीना दिखा दे
हबीब मियाँ

उस दौर में जयपुर में मंदिर मस्जि़द की एक दीवार थी. विवाद हुआ तो रास्ता निकाला गया कि नमाज़ और आरती के समय में कुछ ऐसा सामंजस्य हो कि दोनों की इबादत में बाधा न पहुँचे.

लगभग पाँच दशक पहले दिखाई देने बंद हो गया. उसी वजह से कुछ परेशानी है. "कोई कहता है कि मेरा जीना दुश्वार है, मैं तो कहता हूँ कि मेरा मरना दुश्वार कर दिया. हज करने गया तो मदीना नहीं देख पाया. कोई मुझे एक आँख दे दे, मेरी हसरत मदीना की सूरत देखने की है. काश मुझे कोई मदीना दिखा दे".

(बीबीसी संवाददाता नारायण बारेठ से बातचीत पर आधारित)

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