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शुक्रवार, 06 जुलाई, 2007 को 13:24 GMT तक के समाचार
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प्रसाद बनाने के लिए सबसे मंहगी बोली

अजमेर की दरगाह
उर्स के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु दरगाह पर पहुँचते हैं
धार्मिक सदभाव और सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध अजमेर स्थित ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की देग़ों में उर्स के दौरान प्रसाद पकाने के ठेके की अब तक की सबसे मंहगी बोली लगी है.

दरगाह को ये देग़(विशाल कड़ाह) मुगल बादशाहों ने दिए थे.

ख़ादिमों को एक समूह ने नीलामी की बोली के बाद एक करोड़ 41 लाख 51 हज़ार एक सौ रुपए में उर्स के दौरान देग में तबर्रक या प्रसाद पकाने का ठेका हासिल किया है.

इनमें से विशाल आकार की बड़ी देग़ अपनी मन्नत पूरी होने पर मुगल बादशाह अकबर ने ख़्वाजा के दरबार में भेंट की थी.

यह देगें दरगाह में बुलंद दरवाजे के पास स्थापित है. अकबर के नक्शेकदम पर चलते हुए बादशाह जहाँगीर ने दूसरी देग़ भेंट की थी. इसे छोटी देग़ कहा जाता है.

देग़ का यह ठेका उर्स के झंडे से शुरू होकर 15 दिन तक चलेगा. इन देग़ों में श्रद्धालु नकदी, सोने चाँदी के आभूषण, खाद्यान्न, सूखे मेवे और कीमती वस्तुएँ बतौर नज़राना भेंट करते हैं.

खादिमों की संस्था अंजुमन के सचिव सरवर चिश्ती ने बीबीसी को बताया कि देग़ से होने वाली आय अंजुमन को प्राप्त होती है.

नीलामी

 खाद्य सामग्री पकाते समय भारी आंच के बावजूद इन देग़ों का ऊपरी किनारा गर्म नहीं होता. यह इन देग़ों की ख़ूबी है
मोइन हसन चिश्ती, अध्यक्ष, अंजुमन

अंजुमन इस राशि से होने वाली आय का इस्तेमाल कल्याणकारी कामों में करती है. कई बार नीलामी हासिल करने वालों को नुकसान भी हुआ है.

नीलामी की कार्रवाई अंजुमन की देखरेख में होती है. इस बार भी नीलामी की कार्रवाई 21 घंटे तक चली.

बड़ी देग़ की क्षमता 4800 किलोग्राम और छोटी देग़ की क्षमता 2200 किलोग्राम चावल पकाने की है.

इन देग़ों में बादाम, पिस्ता, चावल, केसर, घी शक्कर और सूखे मेवों को मिलाकर खाद्य सामग्री बनाई जाती है. इन्हें श्रद्धालुओं में बाँटा जाता है.

श्रद्धालु इसे नियाज, तबर्रक या प्रसाद समझ कर ग्रहण करते हैं.

महान सूफी संत के प्रति आस्था रखने वाले लोग सभी धर्मों और वर्गों के होते हैं. इसलिए प्रसाद शाकाहारी ही होता है.

अंजुमन के अध्यक्ष मोइन हसन चिश्ती कहते हैं,"खाद्य सामग्री पकाते समय भारी आंच के बावजूद इन देग़ों का ऊपरी किनारा गर्म नहीं होता. यह इन देग़ों की ख़ूबी है."

अकबर के हाथों भेंट की गई बड़ी देग़ को अब मरम्मत की ज़रूरत है.

दरगाह के नाज़िम अहमद रज़ा कहते हैं,"दरगाह प्रबंधन ने इस ऐतिहासिक बर्तन की मरम्मत के लिए आठ लाख रुपए मंजूर किए हैं. इस पर अंजुमन रज़ामंद भी है लेकिन अब तक मरम्मत का काम शुरू नहीं हो सका है. हम अंजुमन की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं. इस बड़ी देग़ का मुआयना कर कारीगर अपनी रिपोर्ट प्रबंधन को सौंप चुके हैं."

यूँ तो कई धनी-मानी हस्तियाँ, राजा-बादशाह और राष्ट्रप्रमुख दरगाह की ज़ियारत करते रहे हैं. लेकिन निर्धन और मज़लूमों की आस्था इस हद तक है कि सब ख़्वाजा को ग़रीब नवाज़ कहते हैं.

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