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शनिवार, 10 मार्च, 2007 को 20:25 GMT तक के समाचार
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विवादों ने अब भी पीछा नहीं छोड़ा

कृष्ण मेनन
चीन युद्ध के बाद कांग्रेस में कृष्ण मेनन का रुतवा घटता गया
हाल में ही ब्रिटेन की आंतरिक ख़ुफ़िया एजेंसी एमआई-5 की फाइलों के कुछ अंश प्रकाशित हुए हैं जिसमें भारत के पूर्व रक्षा मंत्री और ब्रिटेन में भारत के पहले उच्चायुक्त कृष्ण मेनन को अनैतिक, बेईमान और षडयंत्रकारी बताया गया है.

ये छवि उस छवि के बिल्कुल विपरीत है जिसमें कृष्ण मेनन को उच्च कोटि का स्वतंत्रता सेनानी, गुट निरपेक्ष आंदोलन का जनक और जवाहरलाल नेहरू का अत्यंत क़रीबी माना जाता है और जिन्होंने भारत के हितों के लिए हमेशा लड़ाई लड़ी.

कैंब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज में भाषण के दौरान कृष्ण मेनन ने एक बार कहा था, “वो हमेशा मेरे बारे में कहते हैं कि मैं एक विवादास्पद व्यक्तित्व हूँ. असली सच ये है कि विवाद मेरा पीछा करते हैं और उनसे समझौता करने की भावना के तहत उनसे आधे रास्ते में ही मिल लेता हूँ.” उनके ये शब्द उनके व्यक्तित्व का सही बखान करते हैं.

लंबे और दुबले पतले, हमेशा सेविल रो का सूट पहनने वाले कृष्ण मेनन को उनके चौड़े माथे, नुकीली नाक और बेतरतीब बालों से हमेशा भीड़ में भी पहचाना जा सकता था. लंदन में इंडिया लीग के सचिव के रूप में उन्होंने क़रीब तीन दशकों तक भारत की आज़ादी की आवाज़ ब्रिटेन में उठाई.

जब भारत आज़ाद हुआ तो उन्हें ब्रिटेन में भारत का पहला उच्चायुक्त बनाया गया. ब्रिटेन की आंतरिक खुफ़िया एजेंसी ने लगभग 30 सालों तक उन पर नज़र रखी, टेलीफ़ोन पर उनकी अत्यंत गोपनीय और अंतरंग बातचीत सुनी और उनपर पूरी फ़ाइल तैयार की जिसमें उन्हें एक खलनायक की तरह दिखाया गया.

कितना सच

कितनी सच्चाई है इन आरोपों में. ये जानने के लिए हमने बात की छह वर्षों तक उनके निजी सचिव रहे और बाद में विदेश सचिव और राज्यपाल बने रोमेश भंडारी से.‘‘जिस इंसान ने ब्रिटिश राज का विरोध किया, एक आंदोलन उठाया उनके बारे में वो लोग इस किस्म के व्यक्ति के बारे में क्या सोचेंगे. महात्मा गाँधी को भी तो नंगा फकीर कहते थे. उस समय इनके प्रति जो विचार थे उस पर क्या विश्वास कर सकते हैं. अंग्रेज़ों के प्रति हमारे क्या विचार थे, जिन्होंने यहाँ क़त्लेआम किया उनके बारे में हम क्या सोचते हैं, क्या समझते हैं. कृष्णा मेनन के प्रति एमआई-5 जो सोचती है उस पर क्या विश्वास कर सकते हैं? उनका तो वो विरोधी थे. वे भारत के हित में काम करते थे. बेईमान कैसे कह सकते थे. मुझे तो मालूम नहीं है. उनके पास तो कभी कोई पैसा होता ही नहीं था.’’

 कृष्णा मेनन के प्रति एमआई-5 जो सोचती है उस पर क्या विश्वास कर सकते हैं? उनका तो वो विरोधी थे. वे भारत के हित में काम करते थे. बेइमान कैसे कह सकते थे. मुझे तो मालूम नहीं है. उनके पास तो कभी कोई पैसा होता ही नहीं था
रोमेश भंडारी

1957 में सुरक्षा परिषद में कश्मीर के मुद्दे पर नौ घंटे लगातार भाषण दिया जो दो दिनों तक चला. उन्होंने बिना पढ़े (एक्सटेम्पोर) लगातार भाषण दिया जिसकी पूरी दुनिया में चर्चा हुई.

पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह याद करते हैं.‘‘उन्होंने नौ घंटे कश्मीर के ऊपर तक़रीर की उससे दुनिया को पहली दफ़ा पता लगा कि हिंदुस्तान का कोई केस कश्मीर के ऊपर है. 1961-62 में आए तो मैं भी प्रतिनिधिमंडल का सदस्य था. कश्मीर पर चर्चा में वे दो बार शामिल हुए और लोगों के ऊपर काफ़ी प्रभाव डाला. जब वे जनरल एसेंबली में बोलते थे तो हॉल भर जाता था.’’

उन्होंने नौ घंटे कश्मीर के ऊपर तक़रीर की उससे दुनिया को पहली दफ़ा पता लगा कि हिंदुस्तान का कोई केस कश्मीर के ऊपर है

मेनन शीत युद्ध के दौरान अमरीका विरोधी मुहिम में सबसे आगे थे. उनका अमरीका विरोध इतना ज़बरदस्त था कि टाइम पत्रिका ने उनको ‘हिंदू विशिंस्की’ कहकर पुकारा था. विशिंस्की उस ज़माने में सोवियत रूस के विदेश मंत्री हुआ करते थे. टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक इंदर मल्होत्रा कहते हैं कि कृष्ण मेनन जैसे बेबाक और मुँह फट लोग बहुत कम थे और यही कारण है कि पश्चिमी राजनयिक उन्हें पसंद नहीं करते थे.

मल्होत्रा कहते हैं, “वे अमरीका को भी जम कर लताड़ा करते थे. जर्मनी में एक दफ़ा वे टेलीविज़न देख रहे थे तो टेलीविज़न पर पॉलेन आयर आए. उन्होंने टेलीविज़न पर जूता उतारकर फेंकना शुरू किया तो एडवाइजर ने उन्हें रोका. एक बार अमरीका के बहुत अच्छे राजदूत माने जाने वाले सर पीयर डिक्शन ने उनसे कहा कि कोई बुरा मानने की बात नहीं, हमारी चमड़ी बहुत सख़्त है. इस पर कृष्णा मेनन ने कहा कि मैं यह जानता हूँ, इसीलिए आप दुनिया के बेहतरीन जूते बनाते हैं.’’

अक्खड़ व्यवहार

मेनन कई बार अपनी कड़ी बोली और रुखे और अक्खड़ व्यवहार के कारण न सिर्फ़ मुसीबत में फँसे बल्कि एक ख़ास वर्ग में बहुत अलोकप्रिय भी हुए.

लेकिन रोमेश भंडारी उनकी इन अदाओं में भी उनकी दरियादिली देखते हैं, ‘‘ बहुत पढ़े-लिखे व्यक्ति थे. उनके पास एक ऐसी ख़ासियत भी थी. वे नाराज होकर डाँट देते थे उसके बाद ठंडे पर जाते थे. उसके बाद वे महसूस करते थे कि हम उसके साथ ज़बर्दस्ती की है तो अपने ढंग से माफी भी माँग लेते थे. अगर आप उनसे कुछ चाहते हैं तो सबसे बड़ी बात होती वे नाराज़ हो जाएँ. नाराज़ होकर उन्होंने गेटआउट कह दिया तो यक़ीनन वह काम हो जाता था.’’

कृष्ण मेनन का सबसे ख़राब समय तब आया जब 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया. उस समय वो भारत के रक्षा मंत्री थे. हार का ठीकरा उनके सिर पर फोड़ा गया. विपक्ष के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता भी उनके ख़िलाफ़ हो गए और उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पडा.

इंदर मल्होत्रा ने उस घटनाक्रम को बहुत नज़दीक से देखा था, ‘‘ जब लड़ाई शुरू हो गई तो कांग्रेस पार्टी में भी इनके ख़िलाफ़ इतनी सख़्त मुहिम शुरू हो गई कि 10-15 दिन तो पार्टी यह कहती रही कि चीनियों को फ़ौज देख रही है. हम तो कुछ नहीं कर सकते लेकिन इस आदमी को यहाँ से निकालना है. हालाँकि तब नेहरू जी ने उनका बचाव करने की कोशिश की.”

ढलान की ओर

नेहरू की मौत के बाद कांग्रेस में उनका रसूख़ कम होता चला गया और नौबत यहाँ तक आ गई कि 1967 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफ़ारिश के बावजूद उन्हें मुंबई से कांग्रेस का टिकट नहीं दिया गया और मज़े की बात ये कि उनकी इस बदहाली पर बहुत कम आँसू बहाए गए.

 उनके पास एक ऐसी ख़ासियत भी थी. वे नाराज होकर डाँट देते थे उसके बाद ठंडे पर जाते थे. उसके बाद वे महसूस करते थे कि हम उसके साथ ज़बर्दस्ती की है तो अपने ढंग से माफी भी माँग लेते थे. अगर आप उनसे कुछ चाहते हैं तो सबसे बड़ी बात होती वे नाराज़ हो जाएँ. नाराज़ होकर उन्होंने गेटआउट कह दिया तो यकीनन वह काम हो जाता था
रोमेश भंडारी

पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह मानते हैं. ‘‘हर एक इंसान में प्लस-माइनस होते हैं और कृष्ण मेनन में दोनों बराबर थे. 1953 में जब मैं कैंब्रिज से यूपीएससी के इंटरव्यू के लिए वापस आ रहा था तो वे जहाज़ में मेरे बगल में बैठे थे. मैं उस समय 21 वर्ष का था और जहाज़ को आने में 48 घंटे लगते थे तो मैंने उसका पूरा फायदा उठाया.’’

कहने का मतलब ये कि कृष्ण मेनन के दो चेहरे थे. एक बहुत मेहनती, ज़हीन, तेज़-तर्रार और दूसरा रुखा, कटु और दंभ से भरा हुआ बदमिज़ाज व्यक्ति. इंदर मल्होत्रा की भी नज़र उनके इन परस्पर विरोधी रूपों पर गई है. ‘‘अगर आप वज़ीर हैं या वज़ीर-ए-आज़म हैं तो अपना पसंदीदा सा क्लिप बनाएँगे और कहेंगे कि तुम अपने सुपीरियर के ख़िलाफ़ बोलो. यही उन्होंने आर्मी में किया. उन्होंने जितनी देश की सेवा की उसपर ख़ुद पानी फेरा है.’’

कुछ भी हो उन्हें पश्चिमी देशों की राजधानियों में न तो पसंद किया गया और न ही उनपर ऐतबार किया गया. लेकिन पूँजीवादी दुनिया से बाहर अफ़्रीका, एशिया और लैटिन अमरीका ने उन्हें हमेशा अपने मूल्यों के नज़दीक पाया और वहाँ उनकी इज़्ज़त भी हुई. भारत में भी उनके बारे में दो धुर विरोधी राय रही. कुछ ने उन्हें जीनियस माना तो कुछ ने 1962 में चीन से हुई भारत की हार के लिए उन्हें पूरी तरह से ज़िम्मेदार ठहराया.

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