BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 29 नवंबर, 2006 को 09:19 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'काम करने के बदले होती है पिटाई'

बच्चे
भारत में ख़तरनाक उद्योगों में बालमजदूरी पर पहले से प्रतिबंध लगा हुआ है
शांता (नाम बदला हुआ) किसी भी छह साल की लड़की की तरह दिखती है. फर्क सिर्फ़ इतना है कि उसके सिर पर एक खुला घाव है, हाथों में सूजन है.

उसके हाथों की चमड़ी सिलेटी हो गई है और पाँव की चोट की वजह से वह ठीक से चल भी नहीं सकती.

ये उन तीन लड़कियों में सबसे कम उम्र की है जिन्हें पिछले हफ़्ते फ़रीदाबाद के एक घर से बचाया गया था.

छह से 13 साल की इन बच्चियों की जमकर पिटाई हुई थी और ये एक ही घर में काम करती थीं.

आपको याद होगा कि केंद्र सरकार ने बड़े ज़ोर-शोर से बालश्रम क़ानून में संशोधन लाकर 14 साल से कम उम्र के बच्चों के घरों, ढाबों, चाय की दुकानों में काम पर प्रतिबंध लगाया गया था.

और ये घटना बिल्कुल सरकार की नाक के नीचे घटी. हैरत लोगों को इस बात हो रही है कि स्थानीय पुलिस ने इस नए क़ानून के तहत इन बच्चों से काम करवाने वाले परिवार पर आरोप नहीं लगाए.

'काम के बदले पिटाई'

 मुझे दिनभर पानी में काम करवाया जाता था और अगर मुझे ज़रा भी काम करने में देर हो जाती थी तो मुझे मालकिन डंडे से मारती थी. रोज़ सुबह मैं चार बजे उठती थी फिर घर के कपड़े धोती थी, झाड़ू पोछा लगाती थी.
शांता (बदला हुआ नाम)

शांता का कहना है कि वो इस परिवार के लिए पिछले एक साल से काम कर रही है.

शांता का कहना है कि उसका भाई उसे यहाँ छोड़ गया था. शांता कहती है, ‘‘मुझे दिनभर पानी में काम करवाया जाता था और अगर मुझे ज़रा भी काम करने में देर हो जाती थी तो मुझे मालकिन डंडे से मारती थी. रोज़ सुबह मैं चार बजे उठती थी फिर घर के कपड़े धोती थी, झाड़ू पोछा लगाती थी.’’

और काम के बदले उसे पिटाई के अलावा दिन में दो बार चावल खाने को दिए जाते थे.

रात ढलने पर उसे बाथरूम में सुलाया जाता था. शांता कहती है कि वो इसकी शिकायत नहीं कर सकी क्योंकि ज़रा से विरोध का मतलब था और अधिक पिटाई.

बाल श्रम क़ानून

शांता के अलावा रीटा और सुनीता का भी यही हाल था. दोनों से घर का काम करवाया जाता था और इन्हें बंद रखा जाता था.

ये लड़कियाँ अपने मालिकों के चंगुल से एक पड़ोसी की बदौलत बची. इस पड़ोसी ने इनकी पिटाई होते देख लिया था और एक स्थानीय स्वयंसेवी संस्था शक्ति वाहिनी को इस बारे में बताया.

बच्चे
बच्चों के शोषण के और भी मामले सामने आते रहे हैं

फिर पुलिस की मदद से इन लड़कियों को छुड़ाया गया. पर पुलिस ने इनके ख़िलाफ़ बालश्रम क़ानून नहीं लगाया.

उनपर केवल जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया.

शक्ति वाहिनी के ऋषिकाँत का कहना है, ‘‘इन लड़कियों को पश्चिम बंगाल से लाया गया, उनसे ग़ैर क़ानूनी ढंग से बंधुआ मज़दूरी करवाई गई और उनका शोषण किया गया फिर भी इनके ‘मालिकों’ को बाल श्रम क़ानून के उल्लंघन का दोषी नहीं पाया गया.’’

पर फ़रीदाबाद के पुलिस अधीक्षक महिंदर सिंह शेओरन का कहना है, ‘‘इन पर ये क़ानून इसलिए नहीं लगाया जा सकता क्योंकि इनके काम के ऐवज में इनके घर के लोग पैसा ले जाते थे. वैसे भी अगर इन्हें बेचा नहीं गया है तो फिर ये क़ानून इन पर नहीं लग सकता.’’

विशेषज्ञों का कहना है कि 10 अक्तूबर को संशोधित बाल श्रम क़ानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

हरियाणा राज्य के श्रम मंत्री बिरेंदर सिंह भी पुलिस और प्रशासन के क़दम को उचित मानते हैं.

हालाँकि अब मीडिया और स्वयंसेवी संस्था के दबाव के बाद उन्होंने पुलिस को इस परिवार के ख़िलाफ़ बालश्रम क़ानून लगाने को भी कहा है.

अक्तूबर में जब इस क़ानून में बदलाव लाए गए थे तभी स्वयंसेवी संस्थाओं ने संशय व्यक्त किया था कि इस क़ानून को लागू करना मुश्किल होगा.

और इस मामले से तो ऐसा ही प्रतीत होता है. बच्चे अपना बचपन खो रहे हैं, उनका शोषण हो रहा है और प्रशासन भी संवेदनहीन नज़र आता है.

इससे जुड़ी ख़बरें
बाल मज़दूरों को रखना हुआ ग़ैरक़ानूनी
09 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस
बाल मज़दूरी का अर्थशास्त्र
06 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>