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जेएनयू चुनाव: सद्दाम नहीं आरक्षण मुद्दा है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव हमेशा से अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विवाद के लिए जाने जाते हैं लेकिन इस बार चुनावों में मुद्दा जाति आधारित आरक्षण है. हालांकि अधिकतर संगठन इस तथ्य से कतराते हैं और अपने मुद्दे गिनाते हैं लेकिन अगर कुछ नए संगठनों पर नज़र डाली जाए तो स्थिति साफ़ हो जाती है. चुनावों में लगातार जीत दर्ज़ करने वाले बड़े दल यानी वामपंथी संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया का तर्क है कि वो अपने काम के बल पर चुनाव लड़ रहे हैं. अध्यक्ष पद के उम्मीदवार धनंजय त्रिपाठी का रुख आक्रामक है. उनका कहना है,'' जेएनयू में जाति मुद्दा नहीं है. हम लड़ रहे हैं उन मुद्दों पर जिनके लिए हमने काम किया है. हमने छात्रों के लिए स्कालरशिप बढ़वाई है और उनकी भलाई के लिए काम किया है. बाकी वैचारिक मुद्दे हैं. इराक़ का मुद्दा है.'' ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी आईसा पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का समर्थन करती है लेकिन पार्टी के कार्यकर्ता यह मानने से इंकार करते हैं कि जाति के आधार पर चुनाव लड़े जा रहे हैं. पिछले दिनों आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान गठित संगठन यूथ फॉर इक्वलिटी ने भी अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं और उन्हें खासा समर्थन मिल रहा है. जेएनयू के सीनियर छात्रों में से एक कैसर कहते हैं,'' देखिए हर पार्टी में ऊंची जाति के लोग हैं जो आरक्षण का विरोध करते हैं. ये वर्ग कैसे वोट देगा कहना मुश्किल है. हो सकता है ये लोग यूथ फॉर इक्वलिटी को दें. वोटों का ध्रुवीकरण ज़रुर होगा जाति के नाम पर. '' दूसरी तरफ यूथ फॉर इक्वलिटी के अध्यक्ष पद की उम्मीदवार सोनिका त्यागी कहती हैं वो आरक्षण के ख़िलाफ नहीं है. उनका कहना है,'' हम चाहते हैं कि जाति के आधार पर आरक्षण ख़त्म हो. उन सभी को आरक्षण मिले जो ज़रुरतमंद हैं. गरीब हैं चाहे वो किसी भी जाति का हो.'' सोनिका यहां तक कहती हैं कि यूथ फॉर इक्वलिटी के लिए जीत हार मुद्दा नहीं है बल्कि हम स्वस्थ बहस चाहते हैं एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर. एक अन्य संगठन बहुजन समाज फ्रंट भी है जिनके पर्चे जाति व्यवस्था पर चोट करते हैं. इस दल ने एक ऐसा पर्चा निकाला है जिसमें पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्रियों की जाति का वर्णन करते हुए दर्शाया है कि इनमें नब्बे प्रतिशत ऊंची जातियों के हैं.
तो फिर जाति के आधार पर बहुकोणीय लड़ाई का फायदा किसको होगा. आम तौर पर एसएफआई को कड़ी टक्कर देने वाले संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थिति इस बार इन्हीं कारणों से ख़राब बताई जा रही है लेकिन पार्टी के पुराने कार्यकर्ता अशोक शर्मा इससे इंकार करते हैं. यह पूछे जाने पर कि क्या यूथ फॉर इक्वलिटी के कारण परिषद के वोट कम होंगे तो शर्मा कहते हैं,''‘ मंडल विरोधी आंदोलन के दौरान भी कैंपस में कभी भी जाति आधारित दलों को अधिक वोट नहीं मिला था इसलिए ये कहना सही नहीं होगा कि यूथ फॉर इक्वलिटी वो काटेगी.'' शर्मा कहते हैं,'' हमारा संगठन मजबूत है. जेएनयू का छात्र जागरुक है और वो जाति पर वोट नहीं डालेगा.'' हालांकि कुछ वरिष्ठ छात्रों से संपर्क करते ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है. पुराने छात्र अली असगर कहते हैं,'' पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर बहस होती थी. फलस्तीन, लेबनान, इराक़ पर जीत हार का फैसला होता था. इस बार सद्दाम हुसैन की फांसी को छोड़ दें तो कुछ और मुद्दा नहीं. ऐसे में कोई माने या नहीं माने आरक्षण बड़ा मुद्दा है.'' जीत हार के बारे में टिप्पणी को अगर फिलहाल बचा कर रख लिया जाए तो भी यह कहा जा सकता है कि इस बार जेएनयू चुनाव परिणामों में बड़ा उलटफेर भले न हो लेकिन वोटों का ध्रुवीकरण देखने लायक होगा. | इससे जुड़ी ख़बरें 'आरक्षण का फ़ैसला नहीं बदलेगा'16 मई, 2006 | भारत और पड़ोस आरक्षण पर विचार के लिए समिति17 मई, 2006 | भारत और पड़ोस जेएनयू, जवानी और वामपंथ30 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस जेएनयू में मनमोहन सिंह का विरोध14 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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