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गुरुवार, 28 सितंबर, 2006 को 15:48 GMT तक के समाचार
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उपवास से प्राण त्यागने पर उपजा विवाद

मृत्यु के शोक के बदले धार्मिक उत्सव में बदली अंतिम यात्रा
जयपुर की विमला देवी ने 22 दिनों तक अन्न जल का त्याग करके अपनी जान दे दी है.

जैन धर्म को मानने वाली विमला देवी ने सदियों पुरानी संथारा की परंपरा को अपनाते हुए अपने प्राण त्याग दिए जिसके बाद एक विवाद ने जन्म ले लिया है.

उनके प्राण त्यागने के इस निर्णय को जयपुर हाइकोर्ट में चुनौती दी गई थी और उस 5 अक्तूबर को सुनवाई होनी थी.

विमला देवी कैंसर से जूझ रही थीं और उनके बचने के आसार समाप्त हो चुके थे, 22 दिन पहले उन्होंने आमरण उपवास रखने का प्रण लिया जिस पर एक जैन मुनि और परिवार के सदस्यों ने सहमति दे दी.

उनके पति सोहन लाल भंसाली ने कहा, "उन्होंने संथारा का प्रण लिया था और 22 दिनों तक उन्होंने अन्न जल को छुआ तक नहीं."

उनकी मृत्यु के बाद परिवार के सदस्य रोने के बदले जैन नवकारा मंत्र का जाप कर रहे थे.

विमला देवी की शव यात्रा में बहुत बड़ी संख्या में जैन धर्मावलंबी शामिल हुए और एक धार्मिक उत्सव का सा माहौल दिखाई दिया.

आत्महत्या?

दूसरी ओर, कई लोगों का मानना है कि यह एक तरह से आत्महत्या है जिसे बढ़ावा देने के बदले रोका जाना चाहिए था.

अदालत में याचिका दायर करने वाले निखिल सोनी ने विमला देवी के उपवास को तुड़वाने का प्रयास किया था, उनका कहना था कि यह आत्महत्या का मामला है जिसे रोका जाना चाहिए.

'आत्महत्या नहीं'
 यह कोई आत्महत्या का मामला नहीं है, यह तर्क से लिया गया दृढ़तापूर्ण फ़ैसला है, यह बहुत पुरानी परंपरा है और इसकी तुलना आत्महत्या से नहीं की जा सकती
जैन साध्वी शुभंकर

सोनी ने पुलिस को भी इसकी सूचना दी थी लेकिन पुलिस ने यही कहा कि वह इस मामले में क़ानूनी राय ले रही है.

लेकिन जैन साध्वी शुभंकर ने कहा, "यह कोई आत्महत्या का मामला नहीं है, यह तर्क से लिया गया दृढ़तापूर्ण फ़ैसला है, यह बहुत पुरानी परंपरा है और इसकी तुलना आत्महत्या से नहीं की जा सकती."

पिछले कुछ वर्षों में सिर्फ़ राजस्थान में ही जैन समुदाय के भीतर संथारा का प्रण करके जान देने की अनेक घटनाएँ हो चुकी हैं लेकिन यह पहला मौक़ा है जब इस पर ज़ोरदार बहस छिड़ गई है.

जैन समुदाय के कई लोगों की दलील है कि यह उनका धार्मिक मामला है जिसमें किसी को दख़ल नहीं देना चाहिए लेकिन दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जिनका कहना है कि यह सती प्रथा जैसी ही धार्मिक कुरीति है.

जैन समुदाय के एक वकील राजीव सुराना कहते हैं, "इसे सती या आत्महत्या से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, यह बहुत पुरानी परंपरा है जिसे धार्मिक मान्यता प्राप्त है, यह वैसे ही है जैसे कि एक सिख का कृपाण रखना."

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