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गुरुवार, 15 जून, 2006 को 13:27 GMT तक के समाचार
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श्रीलंका समस्या से जुड़े कुछ सवाल
श्रीलंका
क्लेमोर माइन क्या होती है?

ये एक तरह की बारूदी सुरंग है लेकिन आम बारूदी सुरंगों से कहीं ज़्यादा घातक और भयानक. क्लमोर माइन को अमरीका ने विएतनाम के विद्रोहियों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था.

श्रीलंका में तमिल विद्रोही और सेना दोनों ही इसका इस्तेमाल करते आए हैं. आम तौर पर जो बारूदी सुरंगें हैं उनको ज़मीन के नीचे लगाना ज़रूरी होता है लेकिन क्लेमोर माइन अलग है. इसे एक छोटे से ब्रीफ़केस में रखा जा सकता है और इसे ज़मीन से ऊपर लगाया जा सकता है,

इसे झाड़ी के पीछे या पेड़ पर लगाया जा सकता है. इसको चलाने के लिए एक ही व्यक्ति की ज़रूरत पड़ती है और जब ये फटती है तो इसमें से हज़ारों स्टील की छोटी छोटी गोलियाँ निकलतीं हैं जो शरीर में घुस जाती हैं. क्लेमोर के जो प्रभावी मॉडल हैं उनसे आसपास के सौ मीटर तक इसका प्रभाव घातक होता है.

हाल के महीनों में श्रीलंका में हिंसा इतनी क्यों बढ़ी है?.

वर्ष 2002 में नॉर्वे के मध्यस्थों के ज़रिए श्रीलंका सरकार और तमिल विद्रोही बातचीत के लिए तैयार हुए. लेकिन अप्रैल 2003 में एलटीटीई बातचीत से पीछे हट गई और कहने लगी कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही है.

फिर एलटीटीई ने कहा कि उत्तरी श्रीलंका के तमिल बहुल इलाक़ों में अलग देश की माँग छोड़कर वो अंतरिम सरकार की बात मान सकते हैं लेकिन इसके लिए श्रीलंका के उदारवादी माने जाने वाले प्रधानमंत्री रणिल विक्रमसिंघे तैयार नहीं हो सके.

प्रधानमंत्री पर दबाव था राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा का जिन्हें लग रहा था कि एलटीटीई की माँगें सिंहला लोगों को मंज़ूर नहीं होंगी.

फिर नए चुनाव में एलटीटीई के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ रखने के पक्षधर राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे चुनाव जीत गए और तभी से दोनों पक्षों का रुख़ कड़ा होता गया है और हिंसा बढ़ती रही है.

इस लड़ाई में अब तक कितने लोग मारे गए हैं?

पिछले कुछ महीनों में बड़ी हिंसा में सैंकड़ों लोग मारे गए हैं. लेकिन 70 के दशक में जबसे एलटीटीई ने तमिलों के लिए उत्तरी श्रीलंका में अलग देश की माँग के लिए लड़ना शुरू किया है तबसे अबतक लगभग 65,000 लोग मारे जा चुके हैं और दस लाख से ज़्यादा लोग बेघर हो चुके हैं.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बारे में क्या कर रहा है?

नॉर्वे की मध्यस्थता के ज़रिए बातचीत कुछ समय से जारी है. लेकिन साथ ही ये भी है कि 11 सितंबर 2001 के बाद जो फ़िज़ा बदली है उससे एलटीटीई को काफ़ी नुक्सान उठाना पडा है.

हाल ही में एलटीटीई के रुख़ से परेशान और लगातार हिंसा से नाराज़ यूरोपीय संघ ने उसे आतंकवादी संगठनों की सूची में डाल दिया है.. अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देश पहले ही एलटीटीई को आतंकवादी राष्ट्र घोषित कर चुके हैं

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