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विश्वसनीयता ही समाचार माध्यमों की जान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भूमंडलीकरण और सूचना क्रांति के इस विकसित दौर में समाचार माध्यमों का विस्तार हुआ है और उनकी पहुंच भी बढ़ी है. एक ही समाचार आज कई समाचार माध्यमों से अलग-अलग ढंग से दिखाया और सुनाया जाता है. फिर भी एक अहम सवाल जो आम पाठक या दर्शक से लेकर बड़े-बड़े मीडिया दिग्गजों को सोचने के लिए मजबूर करता है, वह यह है कि आख़िर ये समाचार माध्यम कितने भरोसेमंद हैं और इनकी साख क्या है? क्या समाचार माध्यमों की प्रामाणिकता और निष्पक्षता या उनका 'संतुलित' दृष्टिकोण विश्वसनीय है? यदि हां, तो किस सीमा तक इन माध्यमों पर भरोसा किया जा सकता है? निजी मीडिया चैनलों की बाढ़ के इस युग में इस सवाल का जवाब खोजना आसान नहीं है. 'सबसे तेज' और 'सबसे जल्दी' पेश करने के नाम पर अक्सर ऐसे समाचार पेश कर दिए जाते हैं जो सच से न सिर्फ़ अलग होते हैं बल्कि कोसों दूर होते हैं. नित नए स्टिंग ऑपरेशनों और इंटरनेट पत्रकारिता के उन्न्त दौर में जब हैकिंग जैसी समस्याएं मौजूद हों तब यह बात और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. विश्वसनीयता समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता ही उसकी जान है. कभी राजनीतिक पूर्वाग्रह तो कभी धार्मिक पूर्वाग्रह, इन सबके चलते भी समाचार को उसकी समग्रता में न दिखाकर केवल चयनित पहलुओं को ही दिखाया या सुनाया जाना उचित नहीं कहा जा सकता. कुछ चैनल तो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए सिर्फ़ चयनित पहलुओं को दिखाते हैं. इससे पाठक या दर्शक के मन में भ्रांत सूचना छवियां बन जाती हैं जो कि किसी उद्देश्यपूर्ण समाचार माध्यम का लक्ष्य कभी नहीं हो सकतीं. क्षेत्रीय स्तर पर कुंजीलाल जैसा प्रकरण हो, राष्ट्रीय स्तर पर तहलका जैसे सनसनीखेज मामले हों या फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इराक़ में अमरिकी कार्रवाई ही क्यों न हो, इन सबकी रिपोर्टिंग पर सवालों का उठना आख़िर क्या दर्शाता है? सर्वप्रथम तो 'समाचार' को समझने की ही ज़रूरत है. क्या चीज़ समाचार है और क्या समाचार नहीं है, इनके बीच का अंतर जानना भी किसी समाचार माध्यम के लिए ज़रूरी है. इस पर भी ध्यान दिया जाना अपेक्षित है कि किसी माध्यम की साख एक दिन या कुछ महीनों में ही नहीं बन जाती. यह एक दीर्घकालिक विषय है जिसमें एक-एक क्षण विश्वसनीयता की एक-एक बूंद को जोड़ता जाता है. इसी प्रक्रिया से किसी माध्यम की साख का वह महासमंदर तैयार होता है जिस पर पाठक या दर्शक आंख मूंदकर भरोसा कर लिया करते हैं. छवि का ख़्याल आज भी ऐसे माध्यम या ऐसे चैनल हैं जिनके समाचारों को सुनने या देखने के बाद पाठक, श्रोता या दर्शक किसी पुष्टि की ज़रूरत महसूस नहीं करता. यह वास्तव में उस माध्यम या चैनल द्वारा वर्षों में कमायी गयी विश्वसनीयता है, वर्षों में जीता गया दर्शकों के हृदयों का विश्वास है. किसी समाचार या घटना की भलीभांति पुष्टि करने के पश्चात ही उसे प्रसारित करना उचित है. यह ठीक है कि प्रत्येक चैनल की अपनी चैनल नीति होती है, फिर भी मात्र सनसनी फैलाने के लिए समाचारों में विकृति उत्पन्न करना या तथ्यों में हेरफेर करना दर्शकों या श्रोताओं के साथ अन्याय ही कहा जाएगा. निष्पक्षता और सच्चाई के साथ-साथ समाचारों के स्रोत को भी बताया जाना ज़रूरी है. ऊंचे स्तर के समाचारों में ऐसी विकृति जिसे सिद्धांतविदों ने 'डेफीनेशनल कंट्रोल’ या 'एपीसोडिक जर्नलिज़्म’ जैसा नाम दिया है, ठीक नहीं है. हमें याद रखना होगा कि यदि साधन पवित्र होंगे, उद्देश्य रचनात्मक होगा और पेशे के प्रति समर्पण होगा तो साध्य और परिणाम स्वयं ही बेहतर होंगे. संदेहों और भ्रांतियों की भीड़ में इस महत्वपूर्ण बात को जो माध्यम रेखांकित कर पाने में समर्थ होगा, वह निश्चित ही भरोसेमंद होगा. यही नहीं, भरोसा जीतने के लिए बाक़ी माध्यम भी धीरे-धीरे ही सही, उसी का अनुसरण करने लगेंगे जो सर्वाधिक भरोसेमंद है. इस प्रक्रिया में विज्ञापनबाज़ी और यशलोलुपता से बचने का भी ध्यान रखना अनिवार्य है. | इससे जुड़ी ख़बरें आईआईएमसी में वेब पत्रकारिता कार्यशाला10 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस अपेक्षा से अधिक अच्छा रहा यह अनुभव10 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस भोपाल में हुई पत्रकारिता कार्यशाला 08 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस बीबीसी की पत्रकारिता कार्यशाला इंदौर में06 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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