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बुधवार, 15 फ़रवरी, 2006 को 12:10 GMT तक के समाचार
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चुनाव खर्च पर पार्टियों में सहमति नहीं
चुनाव आयोग
चुनाव आयोग ने पिछले एक दशक में कई सुधार किए हैं लेकिन खर्चों पर अभी भी नियंत्रण नहीं है
भारत में चुनाव का खर्च सरकार की ओर से दिए जाने के प्रस्ताव पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की बैठक बिना किसी सहमति के समाप्त हो गई है.

इस बैठक में 50 में से 34 मान्यता प्राप्त पार्टियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया.

चुनाव आयोग की ये बैठक केंद्र सरकार की पहल पर हुई क्योंकि केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग से इस मामले में उसकी राय माँगी थी. इसका उद्देश्य चुनावों में धनबल का प्रभुत्व कम करना है जिससे चुनाव ज़्यादा लोकतांत्रिक ढंग से हो सकें.

पिछले 23 सालों में इस मामले में छह समितियों ने अपनी रिपोर्ट दी है लेकिन इनमें से किसी पर भी अमल नहीं किया जा सका है.

बुधवार को हुई बैठक के बाद विभिन्न दलों ने इस विषय पर भिन्न-भिन्न विचार व्यक्त किए.

भिन्न-भिन्न विचार

कांग्रेस के प्रतिनिधियों का कहना था कि लोकसभा चुनाव के लिए प्रति उम्मीदवार 15 लाख रूपए और विधानसभा के लिए अधिकतम छह लाख रूपए के ख़र्च की जो मौजूदा सीमा है, उसका कड़ा निरीक्षण होना चाहिए.

लेकिन पार्टी ने ये भी कहा कि यदि उम्मीदवार चाहें तो उन्हें इससे ज़्यादा ख़र्च करने की अनुमति होनी चाहिए.

चुनाव प्रचार
चुनाव प्रचार में होने वाले खर्चों में कटौती की भी बात उठी

उधर विपक्षी दल भाजपा का कहना था कि चुनाव के लिए पूरे ख़र्च की सीमा निर्धारित करनी चाहिए और उम्मीदवारों को उससे ज़्यादा ख़र्च करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए.

भाजपा ये भी चाहती है कि आदर्श आचार संहिता संबंधित क़ानून पारित होना चाहिए.

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने इस कदम का विरोध किया क्योंकि उसके अनुसार बड़े राजनीतिक दलों के लिए ये सरकारी ख़र्च चुनाव सब्सिडी का काम करेगा.

मुख्य चुनाव आयुक्त बीबी टंडन का कहना था, "ज़्यादातर पार्टियों का मानना था कि आंशिक रूप से चुनाव का ख़र्च सरकार को देना चाहिए लेकिन इस दिशा में और भी काफ़ी कुछ करना होगा. लेकिन कुछ राजनीतिक दल इस कदम के पूरी तरह ख़िलाफ़ हैं."

चुनाव आयोग का कहना था कि वह सभी पक्षों के सुझावों के आधार पर सिफ़ारिशें तैयार करेगा और फिर राजनीतिक दलों को एक और मौका देगा और इसके बाद ही अंतिम रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजेगा.

इंद्रजीत गुप्ता समिति रिपोर्ट

मतदाता
आम आदमी के लिए चुनाव लड़ना इस समय तो संभव नहीं दिखता

केंद्र की यूपीए सरकार ने पिछले साल दिसंबर में इंद्रजीत गुप्ता समिति की रिपोर्ट और इसे लागू करने के विषय में चुनाव आयोग की राय माँगी थी.

इसमें मुख्य रुप से 10 सुझाव दिए गए हैं.

इनमें राजनीतिक दलों को एक किराया मुक्त मुख्यालय भवन उपलब्ध करवाना, एसटीडी की सुविधा के साथ एक मुफ़्त फ़ोन और टेलीविज़न चैनलों में चुनाव प्रचार के लिए समय उपलब्ध करवाने जैसी सुविधाएँ शामिल हैं.

इसके अलावा मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के लिए डीज़ल या पेट्रोल का इंतज़ाम, पोस्टर आदि के लिए कागज़ और छपाई का इंतज़ाम और हर उम्मीदवार के लिए उसके चुनाव क्षेत्र में एक सीमित संख्या में चुनाव कैंप का इंतज़ाम करना भी प्रस्तावों में शामिल है.

ये चुनाव सुधार, केंद्र में सत्तारुढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के न्यूनतम साझा कार्यक्रम का भी हिस्सा है.

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