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पाकिस्तान ने क्यों क्रूज़ हासिल किया? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के क्रूज़ मिसाइल परीक्षण से भारत के साथ उसके सामरिक संतुलन पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा लेकिन कूटनीतिक रूप से यदि देखें तो लगता है इसकी तरंगे नकारात्मक दिशा में ही बढ़ेंगी. और इस बार कारण ये नहीं होगा कि पाकिस्तान ने एक ऐसी मिसाइल का परीक्षण किया है जो परमाणु बम गिराने के भी काम आ सकता है, बल्कि कारण ये होगा कि दोनों देशों ने पिछले हफ़्ते ही एक समझौता किया है जिसके तहत वो मिसाइल परीक्षण से पहले एक दूसरे को लिखित जानकारी देंगे. पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता शौकत सुल्तान का कहना है कि इस समझौते में बात बैलिस्टिक मिसाइल की है न कि क्रूज़ मिसाइलों की. भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर बिल्कुल चुप्पी साध रखी है. लेकिन कूटनीति के जानकारों का कहना है कि एक ऐसा क़दम है जिसे टाला जा सकता था. समझौते की भावना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य और इन दिनों पाकिस्तान के साथ चल रही अनौपचारिक कूटनीतिक वार्ताओं में शामिल मतीन ज़ुबैरी कहते हैं कि जो पाकिस्तान कह रहा है वो शब्दों के हिसाब से बिल्कुल सही है.
पर साथ ही वो ये भी कहते हैं, "ये समझौते के शब्दों का नहीं उसके पीछे जो भावना थी उसका उल्लंघन है." उनका कहना है कि इस समझौते का उद्देश्य ही ये था कि एक दूसरे के प्रति विश्वास की भावना बढ़ाना और इसलिए पहले से ये जानकारी देने की बात थी. मतीन ज़ुबैरी कहते हैं, "लेकिन पिछले हफ़्ते उनकी टीम यहां आई और इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी जबकि इस परीक्षण की तैयारी तो पहले से ही चल रही होगी." पाकिस्तान ने ये भी कहा है कि इस परीक्षण से दोनों देशों का सामरिक संतुलन बेहतर हुआ है. शौकत सुल्तान कहते हैं कि भारत के पास ब्राह्मोस मिसाइल है और बाबर उसी का जवाब होगा. लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि पाकिस्तान के पास पहले से ही शाहीन के रूप में ऐसी मिसाइल है जो दक्षिणी भारत तक मार कर सकता है. आक्रामकता तो फिर इस मिसाइल की परीक्षण की ज़रूरत क्यों पड़ी और वो भी ऐसे समय में जब पूरी दुनिया में पाकिस्तान की छवि को परमाणु हस्तांतरण के मामलों से और चरमपंथी घटनाओं के तारों के जुड़ने से धक्का पहुंचा है? माना जाता है कि एक देश अपनी सैन्य शक्ति आक्रमण के लिए बढ़ाता है, रक्षा के लिए बढ़ाता है या फिर एक तरह की चेतावनी या डर पैदा करने के लिए बढ़ाता है. रक्षा मामलों के जानकार महमूद अली कहते हैं कि भारत पाकिस्तान के बीच 1947-48 की लड़ाई हो, 1965 और 1971 की लड़ाई हो या फिर 1999 का कारगिल युद्ध हो, आम सहमति यही है इनकी शुरूआत पाकिस्तान ने ही की थी. इसलिए ये कहना तो ग़लत होगा कि पाकिस्तान ने ये परीक्षण अपनी रक्षा के लिए किया है. दोनों देशों की सामरिक शक्ति की बात करें तो उसमें पाकिस्तान भारत से कहीं पीछे है इसलिए उसकी कोशिश उन पहलूओं को विकसित करने की है जो चेतावनी का काम करें और परमाणु हथियार इसमें बहुत ही कारगर होते हैं. महमूद अली का कहना है कि पाकिस्तान इसलिए परमाणु हथियारों पर ध्यान दे रहा है. मतीन ज़ुबैरी भी इस राय से सहमत हैं. उनका कहना है, "दोनों ही देश जानते हैं कि परमाणु हथियार के इस्तेमाल से वो तबाह हो जाएंगे. और इसका इसका इस्तेमाल एक डेटेरेंट या एक भय दिखानेवाले हथियार के रूप में ही होगा." एक राय ये भी है कि इसके पीछे घरेलू राजनीति का ज़्यादा हाथ है. मतीन ज़ुबैरी कहते हैं कि मुशर्रफ़ अपनी जनता को ये दिखाना चाहते हैं कि दुनिया के कहने से पाकिस्तान अपने परमाणु कार्यक्रम नहीं रोकेगा और वो किसी का पिछलग्गू नहीं है. |
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