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संसद पर हमले में मौत की सज़ा बरक़रार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय संसद पर 13 दिसंबर, 2001 हुए हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद अफ़ज़ल की मौत की सज़ा बरक़रार रखी है. लेकिन शौकत हुसैन की मौत की सज़ा को घटाकर 10 साल की सज़ा कर दिया है. साथ ही उन पर 25 हज़ार रुपए का जुर्माना सुनाया गया है. जस्टिस पीवी रेड्डी की अध्यक्षतावाली दो सदस्यीय खंडपीठ का कहना था कि शौकत इस मामले में शामिल नहीं थे लेकिन उन्हें इस हमले की जानकारी थी. सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रोफ़ेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी और नवजोत संधू उर्फ़ अफ़साँ गुरु को बरी कर दिया है. हालांकि अदालत ने गिलानी के आचरण पर प्रतिकूल टिप्पणियाँ की हैं. हाईकोर्ट ने 29 अक्टूबर, 2003 के अपने फ़ैसले में नवजोत संधू उर्फ़ अफ़साँ गुरु और प्रोफ़ेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी को इस मामले से बरी कर दिया था. लेकिन हाईकोर्ट ने शौकत हुसैन गुरू और मोहम्मद अफ़ज़ल के विरुद्ध 'देश के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ने' और हत्या के साज़िश के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई थी. इसके पहले दिल्ली की पोटा अदालत ने 16 दिसंबर,2002 को चार लोगों, मोहम्मद अफज़ल, शौकत हुसैन, अफ़सान और प्रोफ़ेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी को दोषी करार दिया था. हमला भारतीय संसद पर हमला 13 दिसंबर, 2001 को हुआ था जिसमें पाँचों हमलावर मारे गए थे.
जिस समय संसद पर हमला हुआ था तब वहाँ लगभग 300 सांसद और नेता मौजूद थे. इससे पहले कि चरमपंथी संसद भवन के भीतर पहुँच पाते वहाँ छिड़े संघर्ष में वे मारे गए. भारत ने आरोप लगाया था कि इसके पीछे पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का हाथ है. जबकि पाकिस्तान ने हमले की निंदा करते हुए उसमें हाथ होने से इनकार किया था. उस हमले के बाद दोनों देशों के संबंध ख़राब हो गए थे और एक बार तो युद्ध की नौबत तक आ गई थी. |
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