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तसलीमा का प्रधानमंत्री से अनुरोध | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बांग्लादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन ने ख़ुद को भारत की नागरिकता दिए जाने या फिर लंबी अवधि का निवासी प्रमाणपत्र दिए जाने के मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है. तस्लीमा नसरीन ने शनिवार को प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि अगर वह पश्चिमी देशों में ही रहती रहीं तो उनके लेखन कार्य में प्रगति नहीं हो सकेगी. नसरीन ने कहा है कि चूँकि वह बांग्लादेश वापस नहीं जा सकतीं इसलिए कोलकाता में रहना चाहती हैं क्योंकि कोलकाता को वह अपना दूसरा घर मानती हैं. नसरीन ने अपने पत्र में कहा है कि वह उनका जीवन अनिश्चितताओं और दुख से भरा हुआ है और 1994 में बांग्लादेश में अपना घर छोड़ने के बाद से ही वह कट्टरपंथियों की धमकियों के साये में जीने के लिए मजबूर हैं. उन्होंने कहा है कि उन्हें यूरोपीय संघ ने उसी समय शरण और नागरिकता दी थी जब उन्हें बांग्लादेश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था. "हालाँकि इससे उन्हें शारीरिक रूप से तो पनाह मिल गई थी लेकिन अगर वह अपने ही लोगों से दूर रहती हैं तो एक लेखिका के रूप में वह अपना काम जारी नहीं रख सकतीं." नसरीन ने पत्र में कहा है, "मैं एक बंगाली हूँ, एक दक्षिण एशियाई हूँ और अगर मैं अपने इन लोगों से दूर रहती हूँ तो एक लिखिका के रूप में मेरी प्रगति नहीं हो सकेगी." तसलीमा नसरीन ने कहा कि उन्होंने भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए अर्ज़ी दी हुई है लेकिन सरकार ने अभी उसका कोई जवाब नहीं दिया है न ही लंबी अवधि के लिए निवासी प्रमाण-पत्र के बारे में कुछ कहा है. "इसलिए मैंने इस मामले में प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है." इस बीच पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने कहा है कि तसलीमा नसरीन के द्विखोंदितो नामक उपन्यास पर से प्रतिबंध नहीं हटाया जाएगा. सरकार का कहना है कि प्रतिबंध हटाए जाने से धार्मिक तनाव फैल सकता है. ग़ौरतलब है कि पिछले दशक में तस्लीमा नसरीन लज्जा नामक उपन्यास पर विवाद खड़ा हो गया था जिसके बाद उन्हें पश्चिमी देशों में पनाह लेनी पड़ी थी. |
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