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सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला ग़लत था: सोमनाथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय लोकसभा के अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने झारखंड मामले में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम फ़ैसले को ग़लत बताया है. बीबीसी हिंदी सेवा के कार्यक्रम 'आपकी बात, बीबीसी के साथ' में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए चटर्जी ने कहा, "न्यायपालिका का पूरा सम्मान करते हुए, मैं कहूँगा कि सुप्रीम कोर्ट को वो आदेश नहीं देना चाहिए था. यह न्यायपालिका का काम नहीं है." उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को तय तिथि से पहले ही विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने का आदेश दिया था. अदालत से सदन की कार्यवाही की रिपोर्ट भी माँगी थी. उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट द्वारा विश्वास मत के लिए निर्धारित तिथि पर झारखंड विधानसभा में जो कुछ भी हुआ वो सबके सामने है. न्यायालय उसके बाद क्या करता? क्या प्रोटेम स्पीकर और विधायकों को जेल भेजता? क्या विधानसभा में पुलिस भेजता?" उन्होंने कहा कि अंतत: मसले का हल सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नहीं बल्कि केंद्र सरकार की कार्रवाई से हुआ जिसने शिबू सोरेन को इस्तीफ़ा देने को कहा और उसके बाद झारखंड में नई सरकार का रास्ता बना. लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि लोकतंत्र के सभी स्तंभों को संविधान की परिधि में रहते हुए परस्पर सहायक रूप में काम करना चाहिए. उन्होंने कहा, "यदि ऐसा नहीं होता है और किसी एक अंग ने अपना काम छोड़ दूसरे का काम करने का प्रयास किया तो देश को एक गंभीर संकट का सामना करना पड़ेगा." लोकसभा में सदस्यों की अनुशासनहीनता पर दुख व्यक्त करते हुए चटर्जी ने कहा कि सदन की कार्यवाही में भाग लेकर लौटते समय उन्हें ख़ुद से ये सवाल करना चाहिए कि दिन भर में उन्होंने क्या किया, और क्या उन्होंने उनसे जुड़ी जनता की आस्था और खर्च होने वाले धन के साथ न्याय किया. चटर्जी ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष के रूप में अपने कार्यकाल से वो संतुष्ट नहीं हैं लेकिन उम्मीद जताई कि चीज़ें सही दिशा में जा रही हैं. उन्होंने देश के युवा वर्ग से संसदीय लोकतंत्र में भागीदारी कर उसे मज़बूत बनाने का आहवान किया. |
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