|
नासा की परीक्षा में भारतीय छात्र अव्वल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के 17 साल के एक लड़के ने अमरीकी अंतरिक्ष संस्थान नासा की अंतरराष्ट्रीय परीक्षा में पहला स्थान प्राप्त किया है. बलिया शहर से 55 किलोमीटर दूर नरही गाँव के निवासी सौरभ सिंह ने दुनिया भर के दो लाख छात्रों को पछाड़ कर नासा की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय परीक्षा में अव्वल स्थान हासिल किया है. इससे पहले केवल दो भारतीय इस परीक्षा में उतीर्ण हुए हैं. इनमें से एक हैं भारतीय राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और दिवंगत अंतरिक्षयात्री कल्पना चावला. 1960 की परीक्षा में राष्ट्रपति कलाम सातवें स्थान पर थे और 1988 में कल्पना चावला इक्कीसवें स्थान पर. अभिनंदन
अब आलम ये है कि स्थानीय नेता, प्रशासक, सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षक सभी उन्हें हाथों-हाथ ले रहे हैं. सौरभ कहते हैं, "ये सब इतना अजीब लगता है." सौरभ की ये सफलता इसलिए भी ख़ास है क्योंकि वो एक पिछड़े इलाक़े से हैं, जहाँ सड़कें नाम मात्र को हैं और बिजली कभी-कभार ही आती है. उनके पिता शिक्षक हैं और माँ एक स्थानीय स्वास्थ्य कर्मचारी. उनके पढ़ाई एक टूटे-फूटे मकान के धुँधली सी रोशनी वाले कोने में हुई. बारहवीं की परीक्षा में 72 प्रतिशत अंक प्राप्त करने के बाद सौरभ इंजीनियरिंग की तैयारी करने राजस्थान गए. वहाँ उन्होंने अख़बार में नासा के इम्तिहान के बारे में पढ़ा और उसमें बैठने का फैसला कर लिया. सौरभ सिंह कहते हैं, "अख़बार में विज्ञापन पढ़ने से पहले मैं नासा के बारे में जानता तक नहीं था. मुझे लगा कि सारे विषय जाने-पहचाने हैं और मेरे स्कूल के पाठ्यक्रम में थे, इसलिए मैंने सोचा कि भाग्य आज़मा लिया जाए." ढृढ़ इच्छाशक्ति सौरभ इस परीक्षा के लिए रोज़ाना 18 घंटे पढ़ाई करते थे. फाइनल इम्तिहान के लिए पहले चुने गए सौ छात्रों की सूची में उनका नाम आया.
फिर जब फाइनल के नतीजे आए तो बलिया के इस लड़के के पाँच विषयों में से चार में ए डबल प्लस और एक में ए पल्स ग्रेड मिला. उन्होंने ये साबित किया है कि अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो अभाव के बावजूद सफलता के शिखर पर पहुँचा जा सकता है. सौरभ अब राष्ट्रपति कलाम से भी मिल चुके हैं और नासा जाने को काफी उत्सुक हैं. वो कहते हैं, "नासा जाने के बाद मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूँगा. मैं अपना पूरा ध्यान विज्ञान पर लगाऊंगा और वापस आकर अपने देश के विकास के लिए काम करूँगा." उनके पिता राम किश्वर सिंह कहते हैं, "सभी उसकी सफलता में हिस्सा बंटाना चाहते हैं." सौरभ की सफलता की कुंजी साधारण-सी है. वो कहते है, "जहाँ चाह, वहाँ राह." "हाँ, ईमानदारी और ढृढ़ इच्छाशक्ति की कमी नहीं होनी चाहिए." |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||