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गुरुवार, 27 जनवरी, 2005 को 21:25 GMT तक के समाचार
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नागपत्तनम सूनामी के एक महीने बाद

सूनामी
ज़िंदगी को पटरी पर आने में अभी वक्त लगेगा
विनाशकारी लहर से नागपत्तनम में मची तबाही को एक महीना हो गया है, लेकिन एक भी नाव समुद्र में नहीं दिख रही है. इस ज़िले में करीब 20 हज़ार नावें नष्ट हो गई थीं.

नागपत्तनम के लाइट हाउस के निकट खड़े होकर देखने पर दूर-दूर तक खाली ज़मीन दिखती है जो 25 दिसंबर तक पूरी तरह आबाद थी. नाव से लौटते हुए मछुआरे, समुद्र तक की रेत में खेलते हुए बच्चों की हँसी, मछली बेचने वालों के झुंड और दुकानदारों के साथ मोल-भाव करती महिलाएँ अब यहाँ नहीं दिखते.

 कुछ लोगों की नावें सूनामी की चपेट में नहीं आई. वो अब भी समुद्र में जाने से डरते हैं. मछुआरों को समुद्र में जाने में छह महीने तक लग सकते हैं
पेरूवंदन, मछुआरा

मछुआरे पेरूवंदन की टूटी हुई नाव ही उसकी पहचान है. सरकारी राहत और मंदिर की छत अब उसका एकमात्र सहारा है. वो कहता है, "कुछ लोगों की नावें सूनामी की चपेट में नहीं आई. वो अब भी समुद्र में जाने से डरते हैं. मछुआरों को समुद्र में जाने में छह महीने तक लग सकते हैं."

राहत शिविरों से निकलकर ये मछुआरे अपने परिवारों के साथ विशेष तरह के बनाए मकानों में रह रहे हैं. एक कमरे का मकान पाँच से आठ सदस्यों के परिवारों के लिए इस समय घर का काम कर रहा है. पक्के मकान बनने तक उन्हें इन्हीं अस्थायी बस्तियों में रहना होगा.

कठिन संघर्ष

एक अन्य मछुआरा, भोगन हर सुबह अपने टूटे हुए मकान पर जाता है और शाम होने पर घर आता है. उसका कहना है कि सूनामी के फिर से आने का डर उसे समुद्र में जाने से रोक रहा है.

भोगन जैसे कई मछुआरे अपने पुराने इलाकों में जाने से घबरा रहे हैं.

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लाखों लोग बेघर हो गए सूनामी में

भोगन की बात सुनकर पास में खड़ी कुछ महिलाओं में बहस छिड़ गई. समुद्री तट पर मछली से लदी नावों से मछली लेकर यह औरतें नागपत्तनम में बेचती थीं. एक दिन 80 रुपए तो अगले दिन 100 रुपए तक वो कमा लेती थीं. पिछले एक महीने से उनका काम और पैसे कमाने का ज़रिया ठप पड़ा है. एक महीने बाद भी उनमें सूनामी का डर है.

ये महिलाएँ भी यहाँ नहीं रहना चाहतीं. वो समुद्र के इतने नज़दीक नए घर बनाने से डरती हैं. सरकार को उन्हें पक्के मकान बनाने के लिए कहीं और ज़मीन देनी होगी.

मछुआरों की समस्या सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. केंद्र सरकार ने नए नाव और जाल खरीदने के लिए ब्याज-मुक्त ऋण देने का आश्वासन दिया है मगर अभी कागज़ी कार्रवाई चल रही है.

उनकी पुनर्वास योजना पर काम कर रहे गैर-सरकारी संगठनों के संचालक राम मोहन कहते हैं, "विस्थापितों का एक बड़ा हिस्सा समुद्री तट पर मकान नहीं बनाना चाहता. वो समुद्र से कुछ किलोमीटर दूर नई बस्ती बनाना चाहते हैं. लेकिन वो समुद्री तट पर अपनी ज़मीन पर नियंत्रण भी नहीं खोना चाहते. समुद्र तट ही उनकी पहचान है. अगर वो अपने पुराने इलाके पर नियंत्रण खो देंगे तो उनके भविष्य का क्या होगा."

मछुआरों का पुनर्वास और उनकी जीविका से जुड़े सवालों का ज़वाब अभी किसी के पास नहीं है.

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