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शुक्रवार, 14 जनवरी, 2005 को 13:29 GMT तक के समाचार
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गैर सरकारी संगठनों का सच

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राहत सहायता तो बहुत थी पर बांटने में दिक्कतें आई
चेन्नई से नागापट्टनम के छह सात घंटे के रास्ते में हमें सैंकड़ों एसी गाड़ियाँ और ट्रक मिले जिनमें राहतकर्मी और राहत सामग्री प्रभावित इलाकों में जा रही थी.

जब हम सुबह नागापट्टनम पहुँचे तो शहर के सभी छोटे-मोटे होटल पूरी तरह से भरे हुए थे.

यहाँ बड़ी संख्या में ग़ैर-सरकारी संस्थाओं से जुड़े लोग ठहरे थे.

हाथों में दस्ताने और मुहँ पर पट्टी बांधे हज़ारों लोग सूनामी प्रभावित बस्तियों में राहत सामग्री बाँटते, सफाई में मदद करते, दवाई बाँटते नज़र आ रहे थे.

कई राहत शिविर पूरी तरह से इन ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के हाथों में ही थे. नागापट्टनम ज़िला प्रशासन के अनुसार कोई सवा सौ से ज़्यादा ग़ैर-सरकारी संगठन सूनामी प्रभावित क्षेत्रों में काम कर रहे थे.

ग़ैर-सरकारी संगठनों के अलावा भी सैंकड़ों राहतकर्मी, दवाईयाँ, खाने का सामान और अन्य राहत सामग्री लेकर प्रभावित क्षेत्रों में पहुँच रहे थे.

कुल मिलाकर इस त्रासदी में बेघर हुए लोगों की मदद के लिए एक लहर नज़र आती थी.

कहां देनी है मदद

कई ऐसे भी अनुभव हैं जब ये लहर दिशाहीन नज़र आई. हमारी मुलाक़ात राहतकर्मियों की कई ऐसी टीमों से हुई, जिन्हें अंदाज़ा ही नहीं था कि मदद कहाँ पहुँचानी है.

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लाखों लोग बेघर हो गए सूनामी में

बंगलौर से आए मैडिकल कॉलेज के छात्र क़रीब 350 लोगों के लिए तीन दिन के खाने की सामग्री लेकर आए थे, पर वो सड़कों पर घूम रहे थे और आधी से ज़्यादा सामग्री ऐसे गाँवों में बाँट चुके थे, जहाँ इसकी आवश्यकता नहीं थी.

जब वे हमसे मिले तो हमने उन्हें वेलण्कणी के एक राहत शिविर में पहुँचाया. कई ऐसे इलाक़े थे जहाँ पांच दिन बाद भी पूरी राहत नहीं पहुँची थी और कई प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री बर्बाद हो रही थी.

ग़ैर-सरकारी संगठन इसके लिए ज़िला प्रशासन को दोष दे रहे थे.

उनका कहना था कि प्रशासन उनके अनुभव को नज़रअंदाज़ कर रहा है. शुरू के एक-दो दिन में प्रशासन की तरफ से तालमेल में कमी मानी जा सकती है.

ये भी देखने में आया कि कई ग़ैर-सरकारी संगठन पूरी व्यवस्था अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहे थे.

जिससे त्रासदी के समय भी इन संगठनों और प्रशासन के टकराने के कुछ सुर सुनाई दे रहे थे.

नागापट्टिनम में हम तीन दिन रह कर कन्याकुमारी और केरल के प्रभावित इलाकों की तरफ निकल गए.

वहाँ भी ग़ैर-सरकारी संगठनों की अहम भूमिका नज़र आई.

जब हम तीन-चार दिन बाद फिर नागापट्टनम पहुँचे तो वो लहर काफी हद तक लौट चुकी थी.

अभी भी कुछ संगठनों के लोग वहाँ मौजूद थे, लेकिन अब होटलों में आसानी से कमरे उपलब्ध थे, यानी इन राहतकर्मियों की संख्या में भारी कमी आ गई थीं, प्रभावित इलाक़ों में अभी भी हालत ख़राब थीं, कई जगह तो मलबे में शव मिल रहे थे, और पुर्नवास का काम शुरू होना था.

अधिकारी कह रहे थे की समस्या यही है कि ग़ैर-सरकारी संगठन ख़बरों में रहना चाहते है, जबकि आवश्यकता है एक दीर्घकालीन योजना के तहत काम करने की.

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