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हिंदी में भाषण पर पित्रोदा की माफ़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या भारत में हिंदी बोलने के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए? यह एक ऐसा सवाल है जिसको लेकर इन दिनों एक नया विवाद छिड़ा हुआ है. और यह विवाद शुरु हुआ पिछले शनिवार को जब मुंबई में चल एक प्रवासी भारतीय सम्मेलन में एक वक्ता ने हिंदी में भाषण दिया और बाद में कार्यक्रम की अध्यक्षता करने वाले ने इसके लिए बाक़ायदा माफ़ी मांगी. अब देश के अलग-अलग हिस्सों में इसका विरोध हो रहा है. ख़बरें हैं कि हिंदी के कुछ साहित्यकार इस मामले में राष्ट्रपति तक भी जाने की तैयारी कर रहे हैं. यह विवाद बड़ा इसलिए भी हुआ क्योंकि भाषण देने वाले और माफ़ी मांगने वाले दोनों ही महत्वपूर्ण लोग थे. दिल्ली और मुंबई से प्रकाशित होने वाले एक हिंदी अख़बार ने इस मामले पर रिपोर्ट प्रकाशित की. हिंदी में अपनी बात रखने वाले थे मैगसेसे अवार्ड से सम्मानित राजेंद्र सिंह और माफ़ी मांगने वाले थे भारत में टेलीकम्यूनिकेशन क्रांति के जनक सैम पित्रोदा. इस रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के अलवर इलाक़े में पानी के संरक्षण का महत्वपूर्ण काम करने के लिए मैगसेसे अवार्ड से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने इस प्रवासी भारतीय सम्मेलन में हिंदी में अपनी बात रखने की अनुमति मांगी और उसका स्वागत होने के बाद उन्होंने हिंदी में भाषण दिया. लेकिन कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षता कर रहे सैम पित्रोदा ने सदन से इस बात के लिए माफ़ी मांगी कि एक वक्ता ने हिंदी में भाषण दिया. सैम पित्रोदा इस समय राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हैं और उन्हें केंद्रीय मंत्री का दर्जा प्राप्त है. ख़बरें हैं कि इसके तुरंत बाद इस बात पर आपत्ति भी जताई गई कि राष्ट्रभाषा में अपनी बात रखने के लिए शर्मिंदा होने की कोई ज़रुरत नहीं है. |
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