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उपलब्धियों और विवादों भरा कार्यकाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पी वी नरसिंह राव ने ऐसे समय भारत में सरकार का नेतृत्व किया जब भारत में और कांग्रेस पार्टी में एक बड़ा बदलाव हुआ. मई 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की एक रैली में अचानक हत्या हुई और कांग्रेस के सामने खड़े हुए नेतृत्व के संकट के हल के लिए नरसिंह राव को आगे लाया गया. इसी वर्ष वे प्रधानमंत्री बने और उन्होंने अपने वित्तमंत्री मनमोहन सिंह को साथ लेकर भारत की अर्थव्यवस्था को खोला और आर्थिक सुधार के ऐसे कार्यक्रम चलाए जिनकी नींव पर ही भारत दुनिया के सबसे तेज़ अर्थव्यवस्थाओं की कतार में जा खड़ा हुआ. नरसिंह राव ने ही अपने शासनकाल में भारत में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लिए बने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू कीं. लेकिन उनके शासनकाल में कुछ दाग़ भी लगे. 1991 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद उनके ही कार्यकाल में ढहा दी गई जिसके बाद देश भर में दंगे हुए और विदेशों में भी इसकी प्रतिक्रिया हुई. इसके अलावा भ्रष्टाचार के भी कई मामलों में नरसिंह राव का नाम फँसा. उदारीकरण की राह
नरसिंह राव जब प्रधानमंत्री बने तो उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत डाँवाडोल थी और भारत दिवालिएपन के कगार पर था. फिर वे प्रख्यात अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को अपनी कैबिनेट में वित्त मंत्री बनाकर ले आए जिसपर कई लोगों को हैरानी हुई. मगर मनमोहन सिंह ने भारत की उदारीकरण की राह प्रशस्त की और फिर 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के समय कमान उन्हीं को सौंपी गई. नरसिंह राव 1996 में जब सत्ता से बाहर हुए तो वह गांधी-नेहरू ख़ानदान से अलग पहले ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिन्होंने पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया. और नरसिंह राव के जाते-जाते भारतीय अर्थव्यवस्था ना केवल पटरी पर आ गई बल्कि उसने गति भी पकड़नी शुरू कर दी. भ्रष्टाचार नरसिंह राव भ्रष्टाचार के भी तीन मामलों की लपेट में आए. ये थे - सेंट किट्स मामला, लखूभाई पाठक रिश्वत मामला और झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड. 1996 में पहले तो सत्ता हाथ से गई और उसके बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में उनपर आपराधिक मुक़दमा भी चला. उन पर आरोप था कि उन्होंने जुलाई 1993 में एक अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अपनी कॉंग्रेस पार्टी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए एक क्षेत्रीय दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के सदस्यों को भारी धनराशि दी. चार साल बाद एक अदालत ने उनको दोषी भी ठहरा दिया और भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी भी ठहरा दिया. भारतीय इतिहास में पहली बार किसी प्रधानमंत्री को दोषी ठहराया गया था. मगर मार्च 2002 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने नरसिंह राव को सभी आरोपों से बरी कर दिया. |
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