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अन्याय का प्रतिकार इस तरह...
मुख़्तार माई
मीरवाला के स्कूल को अन्याय के प्रतिकार के तौर पर स्थापित किया गया
पाकिस्तान के दक्षिणी पंजाब इलाक़े में इस तरह के कई स्कूल हैं जहाँ बिजली नहीं है, बच्चे ज़मीन पर बैठते हैं और उन्हें कोई बहुत ज़्यादा सुविधाएँ हासिल नहीं हैं.

लेकिन मीरवाला का एक स्कूल थोड़ा अलग है क्योंकि इसे अन्याय के प्रतिकार के तौर पर स्थापित किया गया था.

सामूहिक बलात्कार की शिकार बनाई गई मुख़्तार माई नाम की एक महिला ने मुआवज़े में मिली रक़म को स्कूल बनाने में ख़र्च कर दिया ताकि बच्चे पढ़ लिख सकें और अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकें.

मीरवाला गाँव के क़बाइलियों की पंचायत ने फ़रवरी 2002 में मुख़्तार माई के सामूहिक बलात्कार का आदेश दिया. क़बाइली पंचायत ने उसे उसके भाई के कथित अपराध के लिए ये सज़ा सुनाई थी.

बाद में मामला अदालत में पहुँचा और मुख़्तार माई को क़रीब साढ़े छह लाख रुपए का मुआवज़ा दिया गया. इसी रक़म से उन्होंने स्कूल खोलने का फ़ैसला किया.

बच्चों का भविष्य

उनका कहना है,"मैं इस रक़म को ख़ुद पर ख़र्च नहीं करना चाहती थी. अगर मैं आराम का जीवन गुज़ारने लगूँ तो फिर इन बच्चों का भविष्य कैसे सँवरेगा?"

 मैं इस रक़म को ख़ुद पर ख़र्च नहीं करना चाहती थी. अगर मैं आराम का जीवन गुज़ारने लगूँ तो फिर इन बच्चों का भविष्य कैसे सँवरेगा?
मुख़्तार माई

मुख़्तार माई को ख़ुद कभी स्कूल जाकर पढ़ने लिखने का अवसर नहीं मिला, लेकिन उन्होंने अपनी लड़ाई लड़ने और महिला अधिकारों की आवाज़ उठाने के लिए नई पीढ़ी को शिक्षित करने का नायाब तरीक़ा ढूँढ लिया.

उनका कहना है कि मर्दों का दिमाग़ बदलने के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

इसीलिए उन्होंने मुख़्तार माई गर्ल्स स्कूल और अपने पिता के नाम पर लड़कों के लिए फ़रीद गुज्जर स्कूल की स्थापना की.

इन स्कूलों में, ज़ाहिर है, बच्चों को बहुत सुविधाएँ हासिल नहीं हैं. मेज़-कुर्सियाँ नहीं हैं इसलिए बच्चे गेहूँ का भूसा बिछाकर नीचे बैठते हैं. लेकिन स्कूल में वो ख़ुश रहते हैं.

चार साल की समीना कहती है, "मुझे स्कूल आने में बहुत ख़ुशी होती है और अँगरेज़ी मुझे ख़ास तौर पर पसंद है."

बदलते समीकरण

लेकिन इन स्कूलों की वजह से मीरवाला में रहने वाले पुराने ख़याल के कुछ लोग असमंजस की स्थिति में आ गए हैं.

कई अभिभावक अपने बच्चों को इन स्कूलों से दूर रखना चाहते हैं. मुख़्तार माई कहती हैं कि पुरानी पीढ़ी के लोग इस बात से डरे हुए हैं कि नई पीढ़ी शिक्षित होने पर उनके विचारों को नहीं मानेगी.

"उनको लगता है कि वो अपनी शक्ति और सत्ता खो देंगे," मुख़्ताई माई ने कहा.

उनका कहना है कि इन स्कूलों के बिना उनकी अपनी ज़िदगी बेमानी हो जाएगी और साथ ही उन बच्चों की भी जो इन स्कूलों में पढ़ने के लिए आते हैं.

क़रीब तीन साल पहले जब ये ख़बर सामने आई कि मुख़्तार माई के साथ बलात्कार करने का आदेश स्थानीय पंचायत ने दिया तो दुनिया भर में तहलका मच गया.

मुख़्तार माई ने कहा कि बलात्कार के बाद उन्होंने आत्महत्या करने की भी सोची थी, लेकिन फिर उन्होंने तय किया कि अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने की बजाए वो दूसरों का जीवन सँवारेंगी.

पाकिस्तान में महिलाओं के साथ बलात्कार कोई बहुत नई बात नहीं है, लेकिन जिस तरह से पंचायत ने बलात्कार का आदेश दिया उससे सभी लोग सकते में आ गए.

देहाती इलाक़ों में पंचायत ही न्याय का एकमात्र ज़रिया मानी जाती हैं और कई बार इन पंचायतों में जंगल का न्याय किया जाता है.

जैसे मीरवाला की पंचायत ने मुख़्तार माई को सज़ा इसलिए सुनाई क्योंकि उनके भाई शकूर पर मस्तोई क़बीले की एक लड़की के साथ बलात्कार करने के आरोप लगे थे.

लेकिन बाद में ये तथ्य सामने आए कि शकूर पर लगाए गए आरोप ग़लत थे और 12 साल की लड़की का अपहरण करके बलात्कार करने वाले लोग ही बाद में पंचायत में सज़ा सुनाने वालों में भी शरीक थे.

हालाँकि बाद में मुख़्तार माई के साथ बलात्कार करने वालों को गिरफ़्तार करके सज़ा सुनाई गई.

भरी पंचायत से चार लोग मुख़्तार माई को ज़बरदस्ती खींच कर ले गए. मुख़्तार माई दया की भीख माँगते हुए गिड़गिड़ाती रही लेकिन पंचायत में मौजूद 150 लोगों में से किसीने उनकी नहीं सुनी.

अपराधियों को सज़ा मिलने के बाद मुख़्तार माई ने तय किया कि वो चुप नहीं रहेंगी.

और उनके हौसले अब भी बुलंद हैं. उनका कहना है, "अगर मैं सफल नहीं हुई तो मौत आने तक भी मैं संघर्ष जारी रखूँगी."

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