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अभाव की ज़िंदगी पर हौसले बुलंद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नाम- राजन, पर ये नाम उसे माँ-बाप.......नहीं, वो तो हैं ही नहीं, ये नाम उसे दोस्तों ने दिया है. आँखों में उम्र से पहले उभर आए लाल डोरे और चेहरे पर ज़माने भर की हक़ीकत की झुर्रियाँ और इन सब के बावजूद होठों पर मुस्कुराहट है और मन में है पढ़ने का जीवट. पिछले दिनों हम पटरी पर बसने वाले इस बचपन को जानने-सुनने के लिए जब ऐसे बच्चों के साथ काम कर रही एक संस्था, जमघट में पहुँचे तो वहाँ राजन से मुलाकात हो गई. आइए जानते हैं राजन की कहानी, उसी की जुबानी- "मैं जब सात साल का था, तब मुझे मेरी माँ अपने दूसरे पति के साथ दिल्ली लेकर आई थी. हम पुरानी दिल्ली बसअड्डा पहुँचे और वहीं मेरी माँ मुझे सोता हुआ छोड़कर चली गई. इसके बाद आजतक मेरी माँ मुझे नहीं मिली. मैं अनाथ हो चुका था. पुरानी दिल्ली के इसी बसअड्डे पर कुछ भीख माँगने वाले बच्चों से मेरी मुलाकात हुई और उन्हीं के साथ मैं भीख माँगकर अपना पेट भरने लगा. इससे पहले मेरा कोई नाम नहीं था. इन्हीं दोस्तों ने मेरा नाम रख दिया- राजन. मैं पुरानी दिल्ली से कुछ दोस्तों के साथ आईटीओ पर आ गया. यहाँ हम लालबत्ती पर गाड़ियों के शीशे साफ़ करके अपना गुजारा चलाने लगे. वहाँ से हम कनॉट प्लेस आ गए और कबाड़ बीनने लगे. यहीं पर हनुमान मंदिर के पास मैंने एक पूड़ी की दुकान पर काम भी किया. इसी दुकान पर काम करते हुए मेरी मुलाकात जमघट वालों से हुई और मैं अब जमघट का हिस्सा हूँ. अब मैं यहाँ अपने नए साथियों के साथ बहुत खुश हूँ. माँ का पता लग भी गया तो पता नहीं वापस जाउँगा या नहीं. मैं पढ़ना चाहता हूँ. यहाँ मैं पढ़ भी रहा हूँ और साथ में सिलाई भी सीख रहा हूँ. पूरी सही-सही तो नहीं, पर थोड़ी-बहुत चिट्ठी लिख सकता हूँ. मुझे क्रिकेट पसंद है. मुझे बॉलिंग करना नहीं आता पर मैं बैटिंग और फ़ील्डिंग करता हूँ. पिछले दिनों मैं पाकिस्तान भी गया था. मैं वहाँ क्रिकेट खेलने गया था. वहाँ 'क्रिकेट फ़ॉर पीस' का आयोजन किया गया था. पाकिस्तान में हमने कराची, लाहौर, इस्लामाबाद और रावलपिंडी देखा. नंदिता दास और सौम्या सेन मेरे साथ थीं. मुझे पाकिस्तान का हर शहर बहुत अच्छा लगा. अगर मेरे पास पासपोर्ट होता तो पाकिस्तान में ही रह जाता.
पुलिसवालों से कई बार मार खाई है. एक बार उन्होंने रात में सोते वक्त मुझे मारा था. मैं जमघट के लिए माइम शैली में नाटक करता हूँ. नाटक में मैं इन्ही पुलिसवालों की करतूतों को लोगों के सामने लाता हूँ. आज मुझे कोई भी रोल दे दिया जाए, मैं एक्टिंग कर लूँगा. आज जब कभी घूमने का मन होता है तो अपने पुराने अड्डे, कनॉट प्लेस चला जाता हूँ. वहाँ आज भी कुछ पुराने दोस्त मिल जाते हैं. वहाँ जाता पैदल हूँ पर आता बस से हूँ और वो भी बिना टिकट के. वैसे बिना टिकट ही मैं कई बड़े शहर घूम चुका हूँ. मैं मुंबई के अलावा हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून भी देख चुका हूँ. आज अपने जैसे बच्चों के साथ ही रह रहा हूँ और मैं इनके साथ खुश भी हूँ. सोचता हूँ कि थोड़ा पढ़-लिखकर लूँ तो फिर अपने जैसे बच्चों की मदद करूँगा". |
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