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खाड़ी नीति में बदलाव की ज़रूरत नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के पूर्व वरिष्ठ राजनयिक एसके लांबा का कहना है कि इराक़ में बंधक बनाए गए तीन नागरिकों के मामले के संदर्भ में भारत की खाड़ी नीति में किसी बदलाव की ज़रूरत नहीं है. बीबीसी हिंदी के साप्ताहिक कार्यक्रम - आपकी बात बीबीसी के साथ में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए लांबा ने कहा कि इसके बदले सरकार को सऊदी अरब जैसे देशों के साथ बातचीत का स्तर बढ़ाना चाहिए और ऐसे एजेंटों की जाँच-परख कड़ी कर देनी चाहिए जो भारत से लोगों को काम करने के लिए खाड़ी देशों में भेजते हैं. "भारत को निश्चित रूप से खाड़ी देशों के साथ संबंधों पर ज़्यादा ध्यान देना होगा लेकिन मैं नहीं समझता कि खाड़ी नीति में किसी बड़े बदलाव की ज़रूरत है." लांबा का कहना था कि तीस लाख से ज़्यादा भारतीय लोग खाड़ी के देशों में काम करते हैं और सात अरब डॉलर से ज़्यादा का धन खाड़ी के देशों से भारत आता है. इसके अलावा भारत की क़ीब 80 प्रतिशत तेल ज़रूरतें खाड़ी के देशों से ही पूरी होती हैं. अनेक देशों में भारत के दूत रह चुके लांबा ने कहा, "मेरा ख़याल है कि भारत की खाड़ी नीति बिल्कुल साफ़ है और क्षेत्र के अधिकतर देशों के साथ उसके अच्छे संबंध हैं." "खाड़ी देशों में बहुत से भारतीयों के काम करने से यह साफ़ है कि वहाँ उन्हें इज़्ज़त की नज़र से देखा जाता है." हालाँकि लांबा का यह भी कहना था कि भारत सरकार को खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों के साथ और नज़दीदी संपर्क क़ायम करने की ज़रूरत है. उनकी पासपोर्ट और वीज़ा संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए और ज़्यादा केंद्र बनाए जाने चाहिए. लांबा ने कहा कि यह अच्छी बात है कि भारत में सरकारें बदलने का असर देश की विदेश नीति पर नहीं पड़ा है जो भविष्य में भी जारी रहना चाहिए. |
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