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राज्यपालों को हटाना ग़लतः वाजपेयी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चार राज्यों के राज्यपालों को हटाने के लिए केंद्र सरकार की तीखी आलोचना करते हुए इसे लोकतंत्र का अपमान बताया. अपने लोकसभा क्षेत्र लखनऊ में उन्होंने पत्रकारों से कहा कि केंद्र का ये क़दम आपत्तिजनक है और इसका विरोध किया जाएगा. वाजपेयी ने कहा,"जिस तरह से राज्यपालों को हटाया गया उससे उनकी स्थिति दिहाड़ी मज़दूर जैसी हो गई है". उन्होंने कहा कि राज्यपालों को पाँच वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है और उन्हें तब तक अपना कार्यकाल पूरा करने देना चाहिए जब तक कि वे कोई अनुचित कार्य नहीं करते. माँग वाजपेयी ने गृहमंत्री शिवराज पाटिल से माँग की कि या तो वे इस बात से इनकार करें कि राज्यपालों को इसलिए हटाया गया क्योंकि उनके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध थे या वे इसे कारण बताने के लिए संघ से माफ़ी माँगें. उन्होंने कहा,"जो कारण बताया गया है उसका खंडन नहीं किया गया है. अगर ये बात सही नहीं है तो गृहमंत्री को इससे इनकार करना चाहिए या उनको संघ से माफ़ी माँगनी चाहिए". वाजपेयी ने कहा कि कुछ लोगों के बीच विचारधाराओं का अंतर हो सकता है मगर आरएसएस का कोई सदस्य संवैधानिक पद पर रह सकता है. बर्ख़ास्तगी और प्रतिक्रिया शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री, गुजरात के राज्यपाल कैलाशपति मिश्रा, हरियाणा के राज्यपाल बाबू परमानंद और गोवा के राज्यपाल केदारनाथ साहनी को बर्ख़ास्त कर दिया गया था. राष्ट्रपति भवन से दो जुलाई को जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार इन चारों राज्यपालों से कहा गया है कि वे अपना पद तुरंत छोड़ दें. मगर विज्ञप्ति में उन्हें हटाए जाने का कोई कारण नहीं बताया गया. इससे पहले भी चारों राज्यपालों से इस्तीफ़ा देने को कहा गया था लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था. भाजपा ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के इस क़दम को 'राजनीति से प्रेरित और असंवैधानिक' बताया है. मगर गठबंधन के प्रमुख घटक कॉंग्रेस ने भाजपा पर इस मामले को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया है. ऐसी संभावना है कि भारतीय जनता पार्टी सोमवार से शुरू हो रहे संसद के सत्र में इस विवाद को भुनाने की कोशिश करेगी. |
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