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राजस्थान में भाजपा की पकड़ क़ायम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भौगोलिक दृष्टि से भारत के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में सत्तारुढ़ भाजपा अपनी लोकप्रियता क़ायम रखते हुए 25 में से 21 सीटें झटक कर कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया है. कई दिग्गज नेता धाराशायी भी हो गए हैं. राजस्थान का मत सत्ता नेता पुत्रों पर मेहरबान रहा और तीन प्रमुख नेताओं के बेटे चुनाव जीतने में सफल रहे. कांग्रेस को राज्य की जाट पट्टी सीट आदिवासी अंचल में भारी पराजय का सामना करना पड़ा है. जाट पट्टी में कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री शीशराम ओला अपनी परंपरागत झुनझुन सीट बचाने में सफल रहे. लेकिन चूरू से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बलराम जाखड़ और सीकर से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नारायणसिंह पराजित हो गई है. कांग्रेस की हार पूर्व कांग्रेस मंत्री गिरिजा व्यास उदयपुर से हार गई हैं. पहली बार चुनाव मैदान में उतरी भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण की पत्नी सुशीला बंगारू ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री बूटा सिंह से जालौर सीट छीन कर अपने पति की पिछली हारका बदला ले लिया है.
अपनी दूसरी शादी को लेकर विवादों में फंसे फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र बीकानेर से चुनाव जीत गए है. केन्द्रीय वित्तमंत्री जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह ने राज्य में सर्वाधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की है. मानवेन्द्र ने बाडमेर चुनाव क्षेत्र में कांग्रेस के निवर्तमान सांसद सोनाराम को 2,71,888 मतों से पराजित कर दिया. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह अपनी मां की सीट झालावाड़ से जीतने में सफल रहे हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट दौसा से चुनाव जीत गए हैं. अब तक कांग्रेस के प्रभाव में रही आदिवासी बहुल बांसबाड सीट पर पहली बार भाजपा ने खाता खोला है. यहां से भाजपा के धन सिंह रावत को विजयी घोषित किया गया है. कांग्रेस को केवल अलवर, दौसा, सवाईमाधोपुर और झुन्झनू सीटों पर कामयाबी मिली है. रिकार्ड गत लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को नौ सीट भाजपा को 16 सीट मिली थी. भाजपा को उस समय झटका लगा जब केन्द्रीय राज्यमंत्री जसकौर मीणा सवाईमाधोपुर से चुनाव हार गए हैं.
राज्य में कांग्रेस ने इन चुनावों में जाट, ब्राह्मण नेतृत्व का प्रयोग किया था. इसमें जाट नेता नारायण सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और बीडी कल्ला को प्रतिपक्ष का नेता बनाया गया था. लेकिन कांग्रेस यह जाट कार्ड उलटा पड़ गया. इसी दौरान पारंपरिक जाट मुस्लिम गठजोड़ टूट गया और मुसलमानों ने जाट नेताओं पर पक्षपात के आरोप लगाए. कांग्रेस ने मुसलमानों की नाराजगी दूर करने के लिए सांसद अबरार अहमद को राज्य का कार्यकारी अध्यक्ष भी नियुक्त किया, लेकिन मतदान से एक दिन पहले ही श्री अहमद की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई. कांग्रेस ने मुसलमानों का समर्थन जुटाने के लिए अहमद पटेल और मोहसिना किदवई को भी धूमाया, पर वोट नहीं पड़ा. इन चुनावों में पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गललोत को प्रचार से दूर ही रखा. पार्टी के पोस्टरों में गहलोत कहीं दिखाई नहीं दिए. इन परिणानों से राज्य कांग्रेस में निराशा छा गई है. क्योंकि गत छह माह में कांग्रेस की यह दूसरी करारी हार है. उससे पहले विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था. |
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