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पंजाब-हरियाणा में राज्य सरकारों के ख़िलाफ़ नाराज़गी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या राजग हरियाणा में अपने संभावित नुकसान की भरपाई पंजाब में कर लेगा? या क्या कांग्रेस हरियाणा में दो-दो बहुकोणीय मुकाबलों का लाभ लेकर पंजाब के अपने नुकसान को पाट लेगी? चुनावी महाभारत में उतरे दो प्रमुख गठबंधनों के रणनीतिकारों के मन में यह सवाल ज़रूर सबसे प्रमुख होगा. कभी एक ही प्रदेश का हिस्सा रहे ये दोनों प्रदेश पिछले कई चुनावों में एक-दूसरे से अलग दिशा में फैसला करते हैं. पर दोनों राज्यों में एक बात की समानता तो है ही - और वो यह कि दोनों के शासक दल मुश्किल में फंसे लगते हैं. उन्हें न सिर्फ अपने ख़िलाफ़ मतदाताओं की नाराज़गी झेलनी पड़ रही है बल्कि गठबंधन का खामियाजा भी उनके ख़िलाफ़ गया है. हरियाणा का गठबंधन पिछली बार हरियाणा में भाजपा और इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) ने राज्य की सभी दस सीटों पर कब्जा कर लिया था. दोनों को पांच-पांच सीटें मिली थीं. भाजपा ज़मीनी स्तर पर आईएनएलडी से कमज़ोर थी तब भी गठबंधन के लाभ से उसके बराबर सीटें पा गई. दोनों दलों के बीच कभी भी रिश्ते बहुत मधुर न थे पर उनकी टूट चुनाव से ठीक पहले हुई. कहा जाता है कि भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व रिश्ते तोड़ने के पक्ष में हीं था, लेकिन प्रदेश इकाई को लगता था कि पार्टी के भविष्य के लिए चौटाला से अलग होना लाभकर होगा. इसमें संदेह नहीं कि इससे पार्टी को हल्का लाभ हुआ है पर बनियों और पंजाबी रिफ्यूजियों की पार्टी वाली इसकी छवि अभी खत्म नहीं हुई है. और इससे पार्टी को चुनावी मुकाबले के समय पसीने छूट रहे हैं. ऐसे में भाजपा को यदि हरियाणा में एक या दो स्थान मिल जाते हैं तो उसे संतोष ही होगा वरना पूरी तरह धुल जाने का ख़तरा भी मौजूद है. चौटाला परिवार
शासक आईएनएलडी भी मतदाताओँ की नाराजगी के चलते परेशान है. अधिकांश राज्यों की तरह यहां विकास न होने से नाराजगी नहीं है. विकास, लोगों की सामान्य जरूरत की चीजें और सरकार का कामकाज पिछली सरकारों से बुरा नहीं रहा है. लोग असल में चौटाला और उसके बेटों की तानाशाही वाली शैली से नाराज हैं. पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक कामकाज की बात तो है ही नहीं विधायी कामकाज में भी उनकी शैली एकदम तानाशाहों वाली है. सरकारी और लोगों की संपत्ति की लूट के लिए चौटाला सरकारी द्वारा पुलिस और गुंडों की मदद लेना, इनकी मदद से विरोधियों को चुप रखना, अधिकारियों और मंत्रियों को अपमानित करने और तानाशाही शासन चलाने के किस्से ही आज हरियाणा में आम चर्चा का विषय है. पर पार्टी को अभी भी जाटों में अच्छा खासा समर्थन है जो राज्य में सबसे बड़ा और ताकतवर समूह है. पर खेती-किसानी की परेशानियों के चलते इस समुदाय का एक हिस्सा आईएनएलडी के खिलाफ वोट कर सकता है. इसके अलावा हरियाणा की राजनीति में जाटों के बीच ज़्यादा लोकप्रिय होना हरदम लाभ ही नहीं पहुंचाता. इससे बाकी सारी जातियों के लोग एकदम बिदक जाती हैं. इनेलोदरा इस चुनौती को समझती है क्योंकि कुछ ही दिनों बाद राज्य में विधानसभा होने वाले हैं. सो चौटाला अपने दोनों बेटों को चुनाव मैदान में उतारने समेत हरसंभव जतन कर रहे हैं. पर हरियाणा से आ रही खबरें बताती हैं कि इस बार उनके लिए मैदान आसान नहीं हैं. पर कोई भी प्रतिद्वंद्वी पार्टी आईएनएलडी को हल्के से नहीं ले सकती और कम से कम आधी सीटों पर उसकी चुनौती मजबूत है. चौधरी बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी भी जाट वोटों में सेंध लगाने की कोशिश में है. पर हाल के वर्षों में इसकी ताकत गिरी है और लगता नहीं कि दो-दो तीन सीटों के अलावा इसके उम्मीदवार मुख्य मुकाबले में आ पाएंगे. कांग्रेस को लाभ चौंकोने मुकाबलों का सबसे ज्यादा लाभ कांग्रेस को मिलता लग रहा है. पर इसे विडंबना ही कहेंगे क्योंकि पिछले चार वर्षों में पार्टी ने इस राज्य के लिए कुछ भी नहीं किया. राज्य कांग्रेस में भारी गुटबाजी है और भजनलाल तथा भूपिंदर सिंह हुड्डा-वीरेन्द्र सिंह के खेमे में अंत-अंत तक लड़ते-झगड़ते रहे हैं. पर सारी गिरावट के बावजूद कांग्रेस प्रदेश में 30 फीसदी से ऊपर ही वोट पाती रही हैं. सभी जातियों और समुदायों तथा हर इलाक़े में अकेले इसी का आधार है. 1991 में जब राज्य में चौकोना मुकाबला हुआ तब कांग्रेस ने 37 फीसदी वोट पाए गए थे जो देवीलाल के लोकदल को मिले वोटों से 12 फीसदी ज्यादा थे. और तब उसके राज्य की सभी दस सीटें जीती थीं. यह माना जा सकता है कि आईएनएलडी ने पिछले विधानसभा चुनाव में नाम अपनी लोकप्रियता कुछ गंवाई है. ऐसे में हम हर बार फिर कांग्रेस के लिए 1991 जैसे परिणामों की उम्मीद कर सलकते हैं. पर इस बार भाजपा तब के मुकाबले निश्चित रूप से ज्यादा वोट पाएगी. तब उसे मात्र 10 फीसदी वोट मिले थे. अगर कांग्रेस के पक्ष में चार फीसदी और वोटर भी आ गए तो उसे राज्य की दस में से नौ सीटें मिल जाएंगी. अनेक भारी भरकम उम्मीदवारों की मौजूदगी निश्चित रूप से परिणामों को इतना एकतरफा नहीं होने देगी पर पक्के तौर पर कांग्रेस का लाभ की स्थिति है. पंजाब में अकाली गठबंधन ऊपर पंजाब की कहानी हरियाणा से एकदम उल्टी है.
यहां कांग्रेस को लोगों की नाराजगी के साथ-साथ एक मज़बूत विपक्षी गठबंधन बन जाने का दोहरा नुकसान हो रहा है. पिछली बार भी यह गठबंधन था पर ख़ुद अकाली दल बिखरा था और तोहड़ा गुट ने हर जगह बादल गुट का खेल बिगाड़ा था. इससे कांग्रेस का काम आसान हो गया और उसने राज्य की 13 में से नौ सीटें जीती लीं. अकाली-भाजपा गठबंधन को सिर्फ तीन सीटें मिलीं जबकि एक सीट सिमरजीत सिंह मान को मिली, जो अकाली दल की तीसरे खेमे-अकाली पार्टी के उम्मीदवार थे. अगर तोहड़ा खेमा अलग न हुआ होता तो पिछली बार भी अकाली दल में एकता हो गई थी और भाजपा के साथ उसका गठबंधन मज़बूत है. और चूंकि भाजपा तथा अकालियों के सामाजिक आधार एकदम अलग-अलग हैं इससे भी गठबंधन को काफी लाभ होता है. भाजपा जहां शहरी हिन्दुओं की पार्टी है वहीं अकाली दल ग्रामीण सिख, किसानों, खासकर जाट सिखों की पार्टी है - जो आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे ताकतवर हैं. पहले राज्य में क्षेत्रीय आधार पर भी मत पड़ते थे - अकाली मालवा में मज़बूत थे तो कांग्रेस माझा और दोआबा में. पर अस्सी के दशक में राज्य जिस भारी राजनीतिक उथल-पुथल से गुज़रा उसने इस बंटवारे को काफी हद तक समाप्त कर दिया और अकालियों को सभी इलाकों में समान किस्म का समर्थन मिलने लगा. पर समाज के सभी वर्गों-समूहों में ठीक-ठाक आधार रखने वाली पार्टी सिर्फ कांग्रेस ही है. जाट सिखों में अगर उसे कम वोट मिलता है तो हिन्दू और सिख दोनों ही के दलितों में उसे भारी समर्थन मिलता है. राज्य की आबादी में दलितों की आबादी 28 फीसदी है. इसी चलते 2002 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस अकालियों को पटखनी देने में सफल रही थी. पर बाकी सिख समुदाय के लिए कांग्रेस अब अछूत नहीं है जैसा कि 1984 के आपरेशन ब्लू स्टार के बाद हो गया था. पिछला चुनाव न सिर्फ सामान्य ढंग से हुआ बल्कि सामान्य मुद्दों पर भी लड़ा गया. आतंकवाद, पहचान का सवाल और सिखों के अलग होने का मसला अब कहीं नहीं है - विकास, विभिन्न समूहों के दल ही चुनावी मुद्दा है. सरकार के कामकाज के ख़िलाफ़ और इस बार अगर भाजपा-अकाली गठबंधन को बढ़त लगती है तो अमरिंदर सरकार के ख़िलाफ़ चली उनकी मुहिम के चलते. उन पर किसान हितों की उपेक्षा का आरोप तो है ही, उनकी कार्यशैली पर भी सवाल उठते रहे हैं. सरकार अपना सामान्य कामकाज करने की जगह बादल और उनके परिवार के लोगों के पीछे ही पड़ी रही. मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्टल की लड़ाई ने भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया है. वैसे तो कांग्रेस ने दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ अपना गठबंधन बरकरार रखा है पर आतंकवाद वाले दशक में इनकी शक्ति काफी क्षीण हुई है. कांग्रेस का अगर बसपा से गठबंधन होता तो उसे ज़्यादा लाभ होता क्योंकि दोआबा के दलितों पर उसका ठीकठाक प्रभाव है. ऐसा कोई ठोस बाहरी समर्थन न मिलने से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ी हैं. तोहड़ा धड़े के अकाली दल में मिल जाने के बाद मुकाबले की शुरूआत ही कांग्रेस को 7 और भाजपा-अकाली गठबंधन को 5 सीटें मिलने की स्थिति में हुई है. अगर कांग्रेस को दो फीसदी वोट खिसक कर दूसरी ओर गए तो उसकी सीटें 4 रह जाएंगी और विरोधी गठबंधन आठ पर होगा. अगर 1999 चुनाव की तुलना में चार फीसदी वोट बदले तो कांग्रेस के साथ सिर्फ एक सीट बच जाएगी. ऐसे में कांग्रेस के लिए इसी बात का हौसला है कि यहां के नुकसान की भरपाई हरियाणा से हो जाएगी. |
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