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नेपाल में बैठक समय पर ही | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल के अधिकारियों का कहना है कि विपक्षी पार्टियों की बहिष्कार की धमकी के बावजूद अंतरराष्ट्रीय दाताओं की अहम बैठक तय समय पर ही होगी. नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहीं विपक्षी पार्टियों ने मांग की थी कि राजनीतिक मसला सुलझने तक इस बैठक को मुल्तवी कर देना चाहिए. नेपाल के सालाना बजट का आधा हिस्सा विदेशी मदद से आता है. ऐसे में अगले सप्ताह होने वाली ये बैठक नेपाल के लिए काफी महत्वपूर्ण है. दाता देश चाहते हैं कि वे इस मौके पर वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, मुख्य राजनीतिक पार्टियों, गैर-सरकारी संस्थानों और विशेषज्ञों से नेपाल की ज़रूरतों पर चर्चा कर सकें. समझौते की गुंजाइश कम वित्त मंत्री, प्रकाश चंद्र लोहानी ने बैठक की तारीख़ मुल्तवी करने से साफ इनकार कर दिया है. दाता देशों के ज़्यादातर प्रतिनिधियों ने आश्वासन दिया है कि वे इस बैठक में शामिल होंगे. हालाँकि कुछेक राजनीतिक संकट को सुलझाने के लिए तारीख़ आगे बढ़ाए जाने के पक्ष में भी हैं. लेकिन फिलहाल समझौता होने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं. ये पहला ऐसा मौका है जब सभी प्रमुख पार्टियों ने इस बैठक में हिस्सा लेने से इनकार किया है. नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने अक्तूबर 2002 में नेपाल में सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे और विपक्षी पार्टियां तभी से नेपाल नरेश का विरोध कर रही हैं. उनकी मांग है कि नेपाल में संसद बहाल किया जाए. माना जा रहा है कि इस बैठक में शामिल न होने का फैसला लेकर पार्टियाँ नेपाल नरेश पर दवाब बढ़ाने की कोशिश में हैं. |
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