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बुधवार, 11 फ़रवरी, 2004 को 08:19 GMT तक के समाचार
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तोता भौंकता है, कुत्ता साहब है

तोता
तोतों ने भी अब बोली बदली
क्या कुत्ते, तोते, बकरे और इनसान में कोई साझी बात है.

आसान जवाब है कि सब बोलते हैं.

मगर अपनी-अपनी बोलियाँ.

शायद कभी- कभार ये बोलियाँ आपस में मिल जाती हों और इनसान मैं-मैं करता हो, शायद भौंकता भी हो या ख़ुद ही बकरा, मुर्गा या तोता बन जाता हो.

लेकिन कभी किसी ने किसी तोते को भौंकते हुए नहीं सुना होगा.

मैंने सुना है.

इसका ज़िक्र ज़रा बाद में, पहले कुछ मेरी बोली सुन लें.

पिछले दिनों यूँ लगता था जैसे हर चीज़ कुछ अरसे लिए जानवर बन गई थी.

कुत्ता
एक कुत्ता साहब है

सड़क-सड़क गली-गली बकरे, मोबाइल फ़ोन पर ख़ूबसूरत बकरे के संदेश और जीतने वाले को एक लाख रुपए इनाम का लालच.

मतलब ये कि इन दिनों इन्सान और जानवर आपस में कुछ इस तरह घुलमिल गए कि उन्हें एक दूसरे से जुदा करना कुछ नामुमकिन सा लगता था.

सबसे पहले ईद के दिनों में बकरे और इनसान एक हो गए.

हर तरफ़ लोग बकरों पर झुके हुए, उनके मुँह मे हाथ डाल-डालकर उन्हें हँसाने की कोशिश करते नज़र आए.

और जब वे बकरे को हँसा चुके होते तो फिर एक दूसरे की तरफ़ गौर्वान्वित अंदाज़ से देखकर उसके दाम लगाते.

इस तरह मुर्गे भी पीछे ना रहे. हालाँकि बर्ड फ्लू की वजह से चंद एक ने उनसे हाथ खींच लिया था लेकिन इस पाक धरती के हट्टे-कट्टे दीवानों की एक बड़ी तादाद को भला कोई बर्ड कैसे डरा सकता है.

लोगों ने उसके भी तरीक़े निकाल लिए.

क़साई ने कहा साहब, अब मैं छुरी धोकर ज़िबह करता हूँ. और एक नानी ने टोटका निकाला, "मुर्ग़ी में ज़्यादा लहसुन डाल दो, सब फ्लू मर जाएगा."

सब मर गया.

बस नुक़सान हुआ तो बेचारे उन शादी वालों का जिनका आधे से ज़्यादा मुर्ग़ा मेहमानों के मुँह से बच गया.

और उन्हें अगले चंद रोज़ सुबह-शाम मुर्ग़ कोरमे पर ही गुज़ारा करना पड़ा.

लेकिन उनके साथ-साथ एक और विज्ञापन भी आया कि राजगढ़ के किसी साहब का बोलने वाला तोता खो गया है.

और जो भी उसे ढूंढकर लाएगा उसे 2500 रूपया ईनाम दिया जाएगा.

मेरे दोस्त अशर ने मुझे बताया कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि राजगढ़ के तोते के लापता होने का विज्ञापन आया है.

इससे पहले भी यह आ चुका है.

बल्कि इस पर उन्होंने एक व्यंग भी लिख दिया था कि तुम्हें तोते की पड़ी हुई है, राजगढ़ से तो पता नहीं कौन-कौन सी 'नस्लें' ग़ायब हो गई हैं.

उनका इशारा मेरी तरफ़ और राजगढ़ छोड़ने वाले मेरे जैसे चंद और लोगों की ओर था.

लेकिन फिर भी पाकिस्तान में मैं-मैं, टैं-टैं और भौंकने की आवाज़ें पीछा नहीं छोड़तीं.

आपको अक्सर लगता है कि हर कोई मैं-मैं कर रहा है.

और सिर्फ़ आप भौंक रहे हैं. इसके उलट बहुत कम ही होता है. ज़रा ख़ुशहाल इलाक़ों में चले जाएं. तो हर कोई टैं-टैं करता और एक बार फिर आप भौंकते ही नज़र आते हैं.

(कृपया भौंकने का कोई ग़लत मतलब ना निकालिए, इसे वैसे ही हमेशा से बदनाम किया जा रहा है.)

भौंकने से वो वाक़या भी सुन लें जिसका इशारा मैंने शुरू में दिया है.

पिछले दिनों में मुझे समुंद्री (फ़ैसलाबाद के पास का एक इलाक़ा) जाने का मौक़ा मिला. यह वही जगह है जहाँ अमरीका में बसने वाले सबसे अमीर पाकिस्तानी का घर है.

ख़ैर, वहाँ मैं एक घर में गया जो कि चिड़ियाघर के काफ़ी क़रीब था.

कहने का मतलब है कि वहाँ भैंसों और बकरों के अलावा मोर, कबूतर, कुत्ते, बिल्लियाँ, मुर्ग़ियाँ और तोते भी दिखाई दिए.

और ये सब कोई आम जनवर नहीं थे.

मसलन कुत्ते के बारे में पता चला कि उसकी क़ीमत सुज़ुकी कार से दोगुनी है यानी के छह-सात लाख रूपए, इसी तरह तोता और मोर भी थे.

ख़ैर, जो बात अनोखी थी वो थी कि तोता बिल्कुल बुल्टेरियर कुत्ते की तरह भौंकता था.

जब भी वो किसी बिल्ली या अनजान आदमी को देखता तो भौंकना शुरू कर देता.

घर वालों ने बताया कि जब कुत्ते अपने बाड़ों में बंद होते हैं तो यह तोता घर की हिफ़ाज़त करता है.

बाद में 'साहब - साहब' की आवाज़ सुनाई दी, मैं भी शिष्टाचारवश उठ खड़ा हुआ, थोड़ी देर के बाद 'साहब' आए तो, लेकिन चार टाँगों पर चलकर.

'साहब' उनके भारी भरकम क़द वाले कुत्ते का नाम था जिसके अपने भी दो नौकर थे.

'साहब' 'साहब' है. मेरी आज की बोली बस इतनी ही.

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