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फ्रांस में पगड़ी पर पाबंदी का विरोध
फ़्रांस के स्कूलों में हिजाब और पगड़ी जैसे धार्मिक प्रतीकों के पहनने पर पाबंदी लगाए जाने की फ़्रांस सरकार की योजना का विरोध करने के लिए शनिवार को दुनिया के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए. लेकिन फ़्रांस के सिख समुदाय ने उस प्रदर्शन में शामिल होने से इनकार कर दिया जिसका आयोजन एक कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी ने किया था. हालाँकि पहले सिखों ने मोर्चे में शामिल होने का फ़ैसला किया था मगर शुक्रवार को सिखों ने एक बैठक कर इससे अलग रहना तय किया.
फ्रांस के एक सिख नेता चैन सिंह ने बीबीसी को बताया कि मोर्चे का आयोजन करनेवाली पार्टी काफ़ी कट्टरपंथी है और उसने पहले ही से यहूदियों और अन्य धर्मों के ख़िलाफ़ काफ़ी कड़ा रूख़ अपनाया हुआ है. चैन सिंह ने कहा,"हमारी लड़ाई क़ानून के ख़िलाफ़ है और दूसरे धर्मों से हमारा कोई बैर नहीं है. इसलिए हम मोर्चे से दूर रहे". वैसे 31 जनवरी को फ़्रांस में सिखों ने एक बहुत बड़ा प्रर्दशन आयोजित किया है जिसमें भारत और विदेशों से भी कई सिख नेता भाग लेने पेरिस आएँगे. क़ानून
फ़्रांस में पिछले साल एक सरकारी आयोग ने राष्ट्रपति ज़ाक शिराक से ये सिफ़ारिश की थी की फ्रांस की धर्मनिरपेक्ष नीति को देखते हुए शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक प्रतीकों के पहनने देने पर रोक लगा दी जानी चाहिए. राष्ट्रपति शिराक ने इस सुझाव को मानते हुए फ़्रांस के शिक्षा मंत्री को फ़रवरी तक इस संबंध में फ़्रांस की संसद में क़ानून पेश करने को कहा. ये क़ानून सितंबर महीने से लागू हो सकता है और इस कारण वहाँ के 15,000 सिखों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. प्रतिक्रिया फ्रांस के 19वर्षीय कर्मवीर सिंह उन लोगों में से एक हैं जिन्हें इस क़ानून के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी. कर्मवीर कहते हैं,"मैंने पाँच जगह कोशिश की और हर जगह से यही जवाब मिला कि पहले मुझे अपनी पगड़ी उतारनी पड़ेगी तभी मुझे प्रवेश मिलेगा". कर्मवीर की तरह फ़्रांस में ऐसे 3,000 और सिख विद्यार्थी हैं जिन पर इस क़ानून का असर पड़ सकता है. 14 साल के विक्रमजीत सिंह कहते है,"अगर मुझे पगड़ी और स्कूल के बीच किसी एक को चुनना पड़ा तो मैं पगड़ी ही रखूँगा". सिख नेताओं का कहना है कि वे सरकार से किसी विशेष रियायत की उम्मीद नहीं करते और वे बस ये चाहते हैं कि उन्हें उनके धर्म का पालन करने दिया जाए. |
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