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समय से पहले चुनाव का इरादा क्यों?
दिसंबर महीने की शुरुआत में चार हिंदीभाषी राज्यों में से तीन में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद से ही ये अटकलें लगने लगीं कि क्या पार्टी इसका फ़ायदा लेने के लिए आम चुनाव जल्दी करवा सकती है. उस समय तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्पष्ट कहा था कि ऐसा नहीं है और चुनाव तय समय पर ही होंगे मगर महीने के अंत में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने बयान दिया है कि समय से पहले चुनाव कराना पार्टी के हित में ही होगा. तो महीने भर के भीतर ही ऐसा क्या हो गया कि पार्टी ने सुर बदल लिए और पहले सितंबर 2004 में चुनाव कराने की बात कह रहे नेता अब समय से पहले चुनाव कराने पर विचार कर रहे हैं. वर्ष के अंतिम महीने में राजनीति का चक्र काफ़ी तेज़ी से घूमा है फिर वह चाहे उत्तर प्रदेश में भाजपा को कल्याण सिंह के रूप में दिख रही नई उम्मीद हो या फिर गठबंधन की राजनीति में कूद रही काँग्रेस. साल के अंत में हुए विधानसभा चुनाव में जिन तीन राज्यों में भाजपा को बड़ी जीत मिली उन राज्यों के अगर 1999 के लोकसभा चुनाव के आँकड़े देखें तो स्पष्ट है कि उन तीनों ही राज्यों में भाजपा को अच्छी सफलता मिली थी. इसलिए अगर इन प्रदेशों के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के सहारे वह समय से पहले चुनाव कराने के बारे में सोचे तो इस बार भी पार्टी कमोबेश वही प्रदर्शन दोहराएगी. पिछले चुनाव पिछले आम चुनाव तक मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ एक ही प्रदेश थे और उस समय राज्य में लोकसभा की 40 सीटें थीं. उन सीटों में से भाजपा को 29 सीटों पर जीत हासिल हुई थी और अनुसूचित जातियों की तो सभी छह सीटों पर पार्टी को ही जीत मिली. इसके अलावा उस समय अनुसूचित जनजातियों के लिए नौ सीटें आरक्षित थीं जिनमें से छह पर भाजपा को जीत मिली.
राज्य में उस समय कांग्रेस सत्ता में थी और अब कमान भाजपा के हाथ में आ चुकी है. इसी तरह राजस्थान में भी पिछले आम चुनाव के समय काँग्रेस सत्ता में थी और 25 संसदीय सीटों में से 16 पर भाजपा को जीत मिली थी. यानी इन प्रदेशों में तो पार्टी ने पिछली बार भी अच्छा प्रदर्शन किया था और वह पिछली बार अगर चूकी थी तो सिर्फ़ अपने ही पुराने गढ़ उत्तर प्रदेश में. एक परिवर्तन यह भी है कि उत्तराँचल अब अलग राज्य बन चुका है. इसलिए जब तक उसे उत्तर प्रदेश का किला सुधरने की कोई उम्मीद नहीं दिखती वह चुनाव में नहीं जा सकती थी. संभवतः इसीलिए पार्टी ने महीने की शुरुआत में कहा कि चुनाव निर्धारित समय पर ही होंगे. कल्याण सिंह की वापसी इसके बाद जैसे-जैसे महीना बीता उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से कई महीनों से गुपचुप चल रही बातचीत ने रंग दिखाया और पार्टी से 1999 में बाहर किए जाने के बाद उन्हें पहली बार लगा कि वाजपेयी को जन्मदिन पर बधाई देने की ज़रूरत है.
उन्होंने इस साल 25 दिसंबर को वाजपेयी को जन्मदिन की बधाई दी और कहा कि वह 'अपने नेता' को बधाई देने पहुँचे हैं. वहीं जब वह पार्टी से निकाले गए थे तब उन्होंने वाजपेयी को और संघ परिवार को न जाने कितनी ही बातें सुनाई थीं. इसके अलावा उस समय उनके धुर-विरोधियों में से एक माने जाने वाले पार्टी नेता लालजी टंडन ने भी अब कहा है कि कल्याण सिंह उनके पुराने सहयोगी रहे हैं और लोग आवेश में बहुत कुछ कह जाते हैं फिर बाद में उसे सुधार भी लेते हैं. राज्य के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार तो लालजी टंडन ही कल्याण सिंह को वापस लाने की पूरी कोशिश में लगे हैं. इस बीच 11-12 जनवरी को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की हैदराबाद में बैठक होनी है संभावना व्यक्त की जा रही है कि उसी दौरान कल्याण सिंह को पार्टी में शामिल करने पर विचार किया जा सकता है. उम्मीद है जल्दी ही सुनने को मिलेगा, "सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते." उत्तर प्रदेश का समीकरण उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों की ही नज़र है क्योंकि लोकसभा में सर्वाधिक सांसद इसी प्रदेश से आते हैं.
पिछले आम चुनाव में समाजवादी पार्टी को प्रदेश में 26 सीटें मिली थीं. वर्ष के बीच में प्रदेश में बदले राजनीतिक घटनाक्रम में सत्ता सपा के ही हाथ में आ गई है और उसी समय से सपा और भाजपा की नज़दीक़ियों की भी चर्चा है. मगर किसी समय के धुर-विरोधी दलों का नज़दीक आना मुश्किल होगा हालाँकि सपा के नेता मुलायम सिंह यादव के रुख़ में भाजपा के प्रति पहले की अपेक्षा काफ़ी नरमी दिखने लगी है. बहुजन समाज पार्टी को कमज़ोर करने के लिए ये दोनों पार्टियाँ परोक्ष रूप से कुछ समझौता भले कर लें मगर उसे जनता की नज़रों से दूर रखना इनकी मजबूरी होगी. यानी प्रदेश की राजनीति में भाजपा ने जिस तरह महीने भर में कुछ सफलता हासिल की है उससे निश्चित रूप से उसमें उत्साह आया है. यही उत्साह उसके कार्यकर्ताओं में भी दिखा था जब कल्याण सिंह प्रधानमंत्री वाजपेयी को बधाई देने पहुँचे थे. फिर शायद वही उत्साह जल्दी चुनाव कराने के पार्टी नेताओं के सुर के रूप में दिख रहा है. |
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