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'भारत में सबसे ज़्यादा एड्सग्रस्त होंगे'
भारत में एड्स की स्थिति के बारे में विश्व बैंक का अनुमान है कि वर्ष 2005 तक भारत में सबसे ज़्यादा एचआईवी ग्रस्त लोग होंगे. भारत सरकार और यूएनएड्स का आकलन है कि देश में लगभग पैंतालीस लाख लोग एड्स का शिकार हैं. एक तरफ़ बीमारी का कष्ट तो दूसरी तरफ़ समाज की ओर से उठती सवालिया निगाहों का दंश, एड्स पीड़ित को भारत में अब भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. ये आँकड़ा देश की जनसंख्या का एक प्रतिशत से भी कम ही है और शायद यही वजह है कि इतनी बड़ी संख्या में एड्स पीड़ितों के बावजूद देश को कम प्रभावित वाले देशों की श्रेणी में ही रखा गया है. देश के छह प्रदेशों में इसकी स्थिति ख़ासतौर पर चिंताजनक मानी जाती है. इसमें तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर और नगालैंड शामिल हैं. इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 1998 में मारे जाने वालों में से एड्स की वजह से दो प्रतिशत लोगों की जान गई थी. एक अनुमान के अनुसार देश में हर साल लगभग 3,30,000 युवा एड्स का शिकार होते हैं. भारत में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की प्रमुख मीनाक्षी दत्ता घोष का कहना है कि इस दिशा में काम किया जा रहा है मगर पुरुषों में कॉन्डम के इस्तेमाल को लेकर अब भी उत्साह नहीं है और सरकार के लिए ये चिंता का विषय भी है.
भारत में एड्स की कई वजहों में असुरक्षित यौन संबंध एक प्रमुख वजह है. देश के कुल मामलों में से 84 प्रतिशत मामले तो इसी वजह से होते हैं. यौनकर्मियों और उनके ग्राहकों में एड्स की दर काफ़ी ऊँची है. उसके अलावा संक्रमित सुई का इस्तेमाल करने वालों की संख्या भी कम नहीं है. लोगों में जागरूकता का अंदाज़ा इसी बात से लगता है कि एक आम ट्रक चालक एचआईवी के बारे में सुनकर पूछता है कि क्या ये किसी नई कंपनी का नाम है? ट्रक चालकों का एक जगह से दूसरे जगह जाना और उनका असुरक्षित यौन संबंध में लिप्त होना भी एक प्रमुख वजह है. भारत सरकार इस बारे में लोगों को जागरूक करने के साथ ही और क़दम उठाने की दिशा में भी गंभीरता से काम करने का दावा कर रही है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री सुषमा स्वराज के अनुसार सरकार ने अब तक तो जागरूकता फैलाने का काम किया है मगर अब सरकार पूरी जानकारी देने की कोशिश में है. इसी तरह ऐंटीरेट्रोवायरल ड्रग्स की ऊँची क़ीमतों को कम कराना भी सरकार की प्राथमिकताओं में से है. मगर सरकार को अभी लोगों में जागरूकता फैलाने वाले कार्यक्रमों को और प्रभावी बनाना होगा. कॉन्डम के इस्तेमाल को बढ़ावा देना होगा और ग़ैर-सरकारी संगठनों के साथ ही अन्य संगठनों को भी इसमें शामिल करना होगा. भारत में एड्स की वजह से समाज में व्यक्ति की स्थिति भी इतनी ख़राब हो जाती है कि एक तरफ़ तो वह बीमारी से जूझ रहा होता है और दूसरी तरफ़ वह समाज की हिकारत भरी नज़रें झेल रहा होता है. उसे न सिर्फ़ समाज बल्कि कभी-कभी तो परिवार से भी उपेक्षा ही मिलती है ऐसे में वह व्यक्ति एक तरह से दोहरी मार ही झेल रहा होता है. इस बारे में संगठन काम तो कर रहे हैं मगर फिर भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी ही है. |
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