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आर्मीनियाई लेखक-पत्रकार की हत्या | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तुर्की मीडिया ने ख़बर दी है कि तुर्की के आर्मीनियाई लेखक और पत्रकार रांत डिंक की राजधानी इस्तांबूल में गोली मारकर हत्या कर दी गई है. डिंक एक नामी अख़बार आगोज़ के संपादक थे और काफ़ी प्रसिद्ध भी. इस अख़बार ने लिखा है कि डिंक को इस्तांबूल में उनके दफ़्तर के बाहर तीन गोलियाँ मारी गईं. तुर्की ऐसे लेखकों में से एक थे जिन पर "तुर्की की पहचान" का अपमान करने के लिए मुक़दमा चलाया गया था. इस तरह के अपमान के ख़िलाफ़ तुर्की में सख़्त क़ानून लागू है. अक्तूबर 2005 में उन्हें छह महीने की जेल की सज़ा सुनाई गई थी जिसे स्थगित कर दिया गया था. उन्होंने 1915 के आर्मीनियाई नरसंहार के बारे में कुछ लिखा था. तुर्की क एनटीवी चैनल ने कगहा है कि पुलिस को डिंक की हत्या के सिलसिले में एक किशोर की तलाश है जिसने सफ़ेद रंग का हैट और डेनिम जैकेट पहनी हुई है. चैनल ने डिंक के शव को उनके अख़बार के दफ़्तर के बाहर रखा हुआ दिखाया गया है जिस पर सफ़ेद चादर पड़ी हुई थी. समाचार एजेंसी एपी के अनुसार 53 वर्षीय डिंक को कुछ तुर्की राष्ट्रवादियों की तरफ़ से धमकियाँ मिली थीं जो डिंक को देशद्रोही कहते हैं. डिंक तुर्की में काफ़ी प्रसिद्ध थे और उन्हें तुर्की में आर्मीनियाई लोगों की सशक्त आवाज़ समझा जाता था. एपी के साथ एक बार बातचीत में डिंक ने बताया था कि कुछ तुर्क उनसे बहुत नफ़रत करते हैं और यह कहते हुए वह रो भी पड़े थे. उन्होंने यह भी कहा था कि वह ऐसे देश में नहीं रह सकते हैं जहाँ उन्हें पसंद नहीं किया जाता. आर्मीनियाई लोगों का कहना है कि 1915 में तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य ने संगठित रूप से आर्मीनियाई लोगों का नरंसहार किया था जिसमें हज़ारों आर्मीनियाई लोग मारे गए थे. तुर्की ऐसे किसी भी नरसंहार से इनकार करता है और उसका कहना है कि आर्मीनियाई लोगों की मौत प्रथम विश्व युद्ध की वजह से हुई थीं. तुर्की और आर्मीनिया के बीच कोई कूटनीतिक संबंध नहीं हैं. | इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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