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मौत के क़रीब जाकर मिली आजादी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मिर्ज़ा ताहिर हुसैन सज़ा-ए-मौत के बेहद क़रीब पहुँच चुके थे लेकिन पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने क्षमादान देकर उन्हें नई ज़िंदगी दे दी. ब्रिटेन में लीड्स के रहने वाले ताहिर सैर सपाटे के लिए 1988 में पाकिस्तान गए थे जहाँ टैक्सी ड्राइवर जमशेद ख़ान की हत्या के मामले में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. हालाँकि हर अदालती सुनवाई में ताहिर ये कहते रहे कि अपनी जान बचाने कोशिश में ये हादसा हुआ. इस कशमकश में उन्होंने अपनी ज़िंदगी के 18 साल सलाखों के पीछे बिता दिए. उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई. जेल के दमघोंटू कमरे में बैठ कर ताहिर अपनी मौत का इंतज़ार कर ही रहे थे कि जनरल मुशर्रफ़ ने उन्हें जीवनदान दिया और इसी माह वे रिहा हो गए. 1988 में जब वे जेल गए तब 18 साल के थे. अब 36 वर्ष के हो गए हैं. इसलिए उत्तरी इंग्लैंड के एक गुप्त ठिकाने पर वह आजाद माहौल में अपने को ढालने की कोशिश कर रहे हैं. हादसा पहली बार बीबीसी के साथ बातचीत में वे 18 साल पहले हुए हादसे का ज़िक्र करते हैं.
उनका कहना है कि रावलपिंडी में उन्होंने एक टैक्सी किराए पर ली लेकिन रास्ते में ही ड्राइवर जमशेद ख़ान ने पिस्तौल निकाल कर उन्हें लूटने की कोशिश की. ताहिर कहते हैं, "जब मुझे लगा कि पिस्तौल का निशाना मेरी ओर नहीं है तो मैं झपटा और उसकी कलाई पकड़ ली. इसी जद्दोजहद में गोली चल गई जो ड्राइवर को लगी." ताहिर अपनी जवाबदेही समझते हुए पुलिस स्टेशन गए और ड्राइवर ख़ान को चिकित्सा सुविधा दिलाने की पहल की. यहीं मामला उलटा पड़ गया. ताहिर कहते हैं कि पुलिस उन्हें ही दोषी मान बैठी. मदद ताहिर कहते हैं कि गिरफ़्तारी के बाद उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि उनके क्या वैधानिक अधिकार हैं और किनसे मदद की गुहार लगाई जाए. लगभग दो दशक के इंतजार के बाद प्रिंस चार्ल्स ने पहल की जिसके बूते वो रिहा हुए. ताहिर कहते हैं कि अगर मुक़दमे के शुरू में ही सरकारी स्तर पर हस्तक्षेप होता तो शायद इतना इंतज़ार न करना पड़ता. लेकिन 12 फुट लंबी और नौ फुट चौड़ी कालकोठरी में उन्हें 18 साल तक इंतजार करना पड़ा. जेल की कोठरी से महज 10 फुट की दूरी पर फाँसी का तख़्ता था. ताहिर कहते हैं कि तख़्त के आस पास की हलचल से ही वो भांप लेते थे कि किसी की अंतिम घड़ी आ गई है. दुख ताहिर को ड्राइवर जमशेद ख़ान की मौत का अब भी अफ़सोस है. जमशेद ख़ान की माँ उन्हें माफी दिए जाने से ख़फा हैं. ताहिर हुसैन कहते हैं, "जो हुआ उसे तो मैं बदल नहीं सकता लेकिन मुसलमान होने के नाते मैं भावनाओं को समझ सकता हूँ. जिन स्थितियों में उन्होंने अपना बेटा खोया, उसके लिए मुझे दुख है." वो कहते हैं कि पाकिस्तान की जेलों में कई कैदी निर्दोष हैं और अब वे उनकी मदद करने की कोशिश करेंगे. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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