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बुधवार, 07 जून, 2006 को 09:19 GMT तक के समाचार
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'यूरोपीय देशों ने रिपोर्ट को ख़ारिज किया'
सीआईए
स्विट्ज़रलैंड के सांसद डिक मार्टी ने सात महीने में जाँच पूरी की है और बुधवार को रिपोर्ट देंगे
ब्रिटेन ने काउंसिल ऑफ़ यूरोप में पेश की गई उस रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया है जिसमें उस पर और तेरह अन्य देशों पर संदिग्ध चरपंथियों को अवैध रूप से पूछताछ के लिए ले जाने में सीआईए का साथ दिया गया था.

संसद में इस बारे में उठाए गए सवालों के जवाब देते हुए प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कहा कि मानवाधिकार निगरानी संस्था की इस रिपोर्ट ने उस जानकारी में और कोई इज़ाफ़ा नहीं किया है जो अब तक प्राप्त हुई थी.

रिपोर्ट में जिन अन्य देशों पर आरोप लगे हैं, उनमें से पोलैंड और रोमानिया ने भी इसे ख़ारिज किया.

पोलिश प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके देश पर लगे आरोपों पर मानहानि का मामला दायर हो सकता है जबकि रोमानिया के संसदीय आयोग ने यह रिपोर्ट तैयार करने वाले स्विट्ज़रलैंड के सांसद डिक मार्टी के दावों को पूरी तरह अटकलबाज़ी बताया.

अभी तक इस बारे में अमरीका से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

मानवाधिकार संस्था काउंसिल ऑफ़ यूरोप की एक रिपोर्ट का कहना है कि संदिग्ध चरमपंथियों को इधर-उधर ले जाने के लिए 14 यूरोपीय देशों ने अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के साथ सहयोग किया.

ये रिपोर्ट बुधवार को सार्वजनिक हुई है और स्विट्ज़रलैंड के सांसद डिक मार्टी की तैयार की गई इस रिपोर्ट की एक प्रति बीबीसी ने देखी है.

डिग मार्टी ने इस दस्तावेज़ को पेरिस में काउँसिल ऑफ़ यूरोप के सामने प्रस्तुत किया.

इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इस बात के सुबूत मिलते हैं कि सीआईए के हिरासत केंद्र यूरोपीय देशों - पोलैंड और रोमानिया में स्थित हैं. हालाँकि ये दोनो देश इसका खंडन करते हैं.

सात महीने तक चली इस जाँच के बाद कहा गया है कि ठोस सबूतों के बावजूद ऐसा मानने के पर्याप्त संकेत हैं कि यूरोपीय देशों में कई जगहों को सीआईए ने इस्तेमाल किया है.

ऐसे संकेत भी हैं कि इन देशों की सरकारों ने विमानों को इन जगहों पर कुछ देर तक रुकने की इजाज़त दी और अमरीका को यह जानकारी दी जिससे इन लोगों की आवाजाही संभव हुई.

मानवाधिकार संस्थाओं का कहना है कि संदिग्ध चरमपंथियों को जिन देशों में ले जाया गया है उनमें उन्हें यातनाएँ दी जा सकती हैं.

बीबीसी संवाददाता टिम फ़्रैंक्स का कहना है कि ये आरोप बहुत ही सनसनीख़ेज़ हैं लेकिन सबूत जुटाने की मुश्किल बरकरार हैं.

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