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मंगलवार, 16 मई, 2006 को 12:02 GMT तक के समाचार
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चीन में सांस्कृतिक क्रांति के 40 वर्ष
माओ-त्से-तुंग
माओ-त्से-तुंग आधुनिक चीन के जनक माने जाते हैं.
चीन के इतिहास में 16 मई का एक ख़ास स्थान है क्योंकि आज से 40 वर्ष पहले इसी दिन चीन में सर्वहारा हितों की स्थापना के लिए एक सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत हुई थी.

इस क्रांति के नायक थे माओ-त्से-तुंग जिन्हें आधुनिक चीन का जनक भी माना जाता है.

16 मई, 1966 को शुरू हुई यह क्रांति 10 वर्षों तक चली और इसने चीन के सामाजिक ढांचे में कई बड़े परिवर्तन किए.

इस क्रांति की शुरुआत की घोषणा करते हुए माओ-त्से-तुंग ने चेतावनी दी थी कि बुर्जुआ वर्ग कम्युनिस्ट पार्टी में अपना प्रभाव क़ायम करके एक तरह की तानाशाही स्थापित करना चाहता है.

सांस्कृतिक क्रांति का अभियान माओ ने अपनी पार्टी को प्रतिद्वंद्वियों से छुटकारा दिलाने के लिए शुरू किया था.

क्रांति

शुरुआत में माओ और उनके समर्थकों ने हज़ारों रेड गार्डों को एकजुट करके उन्हें चीनी समाज के चार पुराने स्तंभों को ख़त्म करने के लिए कहा.

ये चार स्तंभ थे पुराने रिवाज, तौर-तरीक़े, संस्कृति और पुरानी सोच.

कॉलेजों को बंद कर दिया गया ताकि विद्यार्थी क्रांति पर ध्यान दे सकें और माओ ने देशभर के छात्रों का इस क्रांति में आगे आने के लिए आह्वान किया.

माओ-त्से-तुंग
इस क्रांति ने चीन के सामाजिक ढांचे को काफ़ी नुकसान भी पहुँचाया

इस अभियान ने लगभग उन सभी चीज़ों पर हमला करना शुरू कर दिया जो कि साम्यवाद के विरोध में थीं.

नतीजा यह हुआ कि इस पूरी क्रांति के दौरान सैकड़ों की तादाद में लोग मारे गए, हज़ारों लोगों को बर्बरता और यातनाएं झेलनी पड़ीं. इससे चीन के सांस्कृतिक ढांचे को काफ़ी नुकसान पहुंचा था.

इस क्रांति के दो वर्ष बाद यानी 1968 के अंत तक चीन गृहयुद्ध की स्थिति में पहुँच गया था.

इसके बाद माओ ने हिंसा रोकने के लिए रेड गार्ड के विलय की घोषणा कर दी थी.

बहस

माओ के इस क़दम को कई जानकार एक बड़े सामाजिक प्रयोग के तौर पर देखते हैं.

एक ऐसा प्रयोग जिसने चीन के पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे को उखाड़कर एक नए चीन की स्थापना की.

हालांकि कई आलोचक इसे माओ की महात्वाकांक्षाओं की उपज मानते हैं.

आलोचकों के अनुसार माओ ने इस सांस्कृतिक क्रांति का इस्तेमाल कम्युनिस्ट पार्टी में अपने विरोधियों को ख़त्म करने और सत्ता पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए किया था.

अपने इस प्रयास में माओ सफल तो रहे पर चीन को इसकी एक बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी.

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