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रूस-चीन का संयुक्त सैनिक अभियान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
रूस और चीन के सेनाओं ने पीस मिशन 2005 के नाम से संयुक्त सैनिक अभियान शुरू किया है. ये अभियान एक हफ़्ते तक चलेगा. दोनें देशों के लिए अपनी तरह का ये पहला संयुक्त सैनिक अभियान है जिसमें जल, थल और वायु सेना हिस्सा ले रही हैं. माना जा रहा है कि कुल मिलाकर क़रीब दस हज़ार सैनिक इसमें शामिल होंगे. ये अभियान रूस के पूर्वी इलाक़े वलादिवोस्टोक में शुरू होगा जिसके बाद इसे चीन के शान्डूंग इलाक़े में किया जाएगा. ये सैनिक अभियान दोनों देशों के लिए एक अहम क़दम है. अहमियत हाल के दिनों में राजनीतिक स्तर पर भी दोनों देशों में तालमेल की बात उभर कर सामने आई है और इस अभियान से तालमेल बिठाने की प्रकिया को और बल मिला है. ये संयुक्त सैनिक अभियान दोनों देशों के उस नज़रिए को भी दर्शाता है कि विश्व में सिर्फ़ एक देश हावी नहीं होना चाहिए और अमरीका के मुक़बले एक और सामान्तर शक्ति होनी चाहिए. चीन की बढ़ती सैनिक शक्ति को लेकर अमरीका चिंता जताता रहा है. एक ओर अमरीका का कहना है कि वो इसे लेकर चिंतित नहीं है लेकिन साथ ही अमरीका कह रहा है कि वो घटनाओं पर नज़र रखे हुए है. ताइवान भी अभियान पर नज़र रख रहा है हालांकि ये ताइवान के आसपास नहीं हो रहा और न ही ताइवान और चीन के बीच के विवाद में रूस के दख़ल देने के कोई आसार नज़र आ रहे हैं. फ़ायदा संयुक्त अभियान से दोनों देशों को व्यवहारिक स्तर पर काफ़ी फ़ायदा होगा. आने वाले दिनों में चीन को हथियार बेचने के नज़रिए से देखा जाए तो ये अभियान रूस के लिए फ़ायदेमंद है क्योंकि यहाँ वो चीन को अपने हथियार दिखा पाएगा. जबकि चीन के लिए ये अभियान मुश्किल और जटील स्तिथियों से निपटने का एक अभ्यास है. लेकिन इस सैनिक अभियान से क्षेत्र के सैनिक संतुलन में कोई ख़ास बदलाव नहीं आएगा. रूस और चीन लंबे समय से एक दूसरे के विरोधी रहे हैं और आज भी दोनों के बीच दूरियाँ बनी हुई हैं. चीन के सामरिक लक्ष्यों को लेकर रूस आशंकित है जबकि एक स्थाई सहयोगी के तौर पर रूस को लेकर चीन आश्वस्त नहीं है. अगर आने वाले दिनों की बात की जाए तो कोई स्थाई रिश्ता बनता नज़र नहीं आ रहा. |
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