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परमाणु हथियारों पर गहरी चिंता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इन दिनों संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय की इमारत में बहुत से लोग ऐसे भी जमा हैं जो परमाणु हथियारों के खुद ही शिकार हैं और परमाणु बम झेलने के बाद भी जीवित रहे लेकिन कई दशक से विभिन्न रोगों से ग्रस्त हैं. जापानी भाषा में इन्हें ‘हिबकुशा’ कहा जाता है. इन लोगों ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय की इमारत में ही हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम हमलों पर आधारित एक प्रदर्शनी लगाई है. प्रदर्शनी में परमाणु हमलों से हुई अपार क्षति और बर्बादी के दृश्य दिल हिलाने वाले हैं और जो लोग इन चित्रों को देखने आते हैं मार्मिक दृश्यों से उनकी आंखे फटी की फटी रह जाती हैं. इसी प्रदर्शनी के पास अमरीकी विदेश विभाग ने कुछ पोस्टर लगा रखे हैं जो परमाणु हथियारों के प्रसार के खतरों को दर्शाते हैं. डरावने अनुभव सुनाव सुबोई एक ऐसे ही ‘हिबकुशा’ हैं जो हिरोशिमा शहर के रहने वाले हैं. उस प्रलयनुमा भयावह दिन को याद करके कहते हैं, “मेरा चेहरा, हाथ, पैर, पीठ, कमर सब कुछ झुलस गया था. धमाके के कारण मैं करीब 10 मीटर की दूरी पर जाकर गिरा और बेहोश हो गया था. कई घंटों के बाद जब मेरी आंख खुली तो सारा शहर तबाह हो चुका था, हर तरफ लाशें ही लाशें बिखरी हुई थीं, सड़कों पर, नदी में. इमारतें ढह गईं थीं, सब कुछ झुलस गया था.” उसके बाद महीने भर तक तो सुनाव सुबोई को कोई सुध ही नहीं थी. कई दशक बीत जाने के बाद भी आज यह सब बताते हुए अस्सी साल के सुनाव सुबोई की आँखें भर आती हैं. इन दशकों में सुनाव सुबोई को परमाणु बम के असर से कई भयंकर रोगों ने जकड़ लिया. धमाके के समय 20 वर्षीय छात्र रहे सुबोई दिल की बीमारी, आंतों का कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर और अनीमिया जैसे रोगों से जूझ रहे हैं. और यह साठ साल उन्होंने हस्पतालों के चक्कर ही लगाते बिताएं हैं. हिम्मत करके इस उम्र में भी वह परमाणु हथियारों के खात्मे के लिए विश्व भर में सम्मेलनों और प्रदर्शनों में भाग लेते हैं. लेकिन परमाणु अप्रसार संधि से उन्हें कोई उम्मीद नहीं है. सुबोई कहते हैं, “परमाणु अप्रसार संधि तो अब चरमराती हुई नज़र आ रही है. 2000 के सम्मेलन में परमाणु हथियारों को खत्म करने के वादे भी पूरे नहीं किए गए हैं. अमरीका ने परमाणु हथियारों के खात्मे की ओर कोई कदम नहीं उठाया है.” नागासाकी इसी तरह के विचार हितोशी कामीकावा के भी हैं जो नागासाकी के रहने वाले हैं और जिन्होंने 1945 में 10 साल की उम्र में परमाणु बम का हमला झेला था. कामीकावा कहते हैं,“ मेरी तो सबसे यही अपील है कि अब हिरोशिमा और नागासाकी कभी भी, कहीं भी न दोहराए जाएं.”
कोडामा मिचिको और हटकेयामा युको, हिरोशिमा की रहने वाली दो महिला ‘हिबकुशा’ हैं. हमलों के समय मिचिको सात साल की थीं और युको छह वर्ष की. चार किलोमीटर दूर होने के कारण कम नुकसान पहुँचा लेकिन हमले के बाद के सालों में उन्हे भी कई बीमारियों ने घेर लिया है. अब दोनों को सांस की और दिल की बीमारी लगी हुई है. उधर दुनिया भर से करीब 70 शहरों के मेयर भी इस सम्मेलन में भाग लेने आए हैं. यह सब 'मेयर्स फॉर पीस' नामक संस्था के तहत यहां जमा हुए हैं. एक पत्रकार सम्मेलन में इन मेयरों ने परमाणु हथियारों के खात्मे पर ज़ोर दिया. नागासाकी के मेयर इक्चो इटो कहने लगे, “ परमाणु बम का असर हिरोशिमा और नागासाकी में आज भी देखा जा सकता है. हमें इन माहाविनाश के हथियारों को, जो मानव जाति को ही सेकेंडों में खत्म कर सकते हैं, धरती से इनका अस्तित्व ही खत्म कर देना चाहिए.” इस समय दुनिया भर में करीब 40 हज़ार परमाणु बम मौजूद हैं. और इनकी क्षमता हिरोशिमा पर गिराए गए बमों की तरह के 10 लाख बमों के बराबर है. इतने बड़े भंडार से ही पूरी दुनिया को कई बार नष्ट किया जा सकता है. लेकिन इसके बावजूद कुछ परमाणु हथियार संपन्न देश इन हथियारों के भंडारों को और बढ़ाने पर तुले हैं. अमरीका के उर्जा मंत्रालय ने परमाणु हथियारों से संबंधित कार्यक्रम के लिए वर्ष 2010 तक के लिए करीब डेढ़ अरब डॉलर की और माँग की है. इसके साथ ही अमरीका सिर्फ परमाणु हथियारों पर ही कुल साढ़े सात अरब डॉलर की रकम खर्च करेगा. इस सम्मेलन में भाग लेने वाले ज़्यादातर लोगों का मानना है कि दुनिया के सभी देशों को हथियारों की कटौती की पहल करनी होगी लेकिन अमरीका जैसे शक्तिशाली देशों के ऊपर यह ज़िम्मेदारी और अधिक है. |
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