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शुक्रवार, 29 अप्रैल, 2005 को 10:56 GMT तक के समाचार
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प्रमुख पार्टियों के घोषणापत्र
गोर्डन ब्राउन और टोनी ब्लेयर
लेबर पार्टी का घोषणापत्र जारी करते गोर्डन ब्राउन और टोनी ब्लेयर
चुनावी बिगुल बजते ही राजनीतिक दलों में मानो होड़ सी लग जाती है. जैसे छोटे बच्चों को लॉलीपॉप देकर लुभाया जाता है कुछ उसी अंदाज़ में वोटरों के सामने परोसी जाती है वादों से भरी थाल. कोशिश ये कि कोई भी व्यंजन रह न जाए. इस थाल का नाम होता है घोषणापत्र या फिर मैनिफ़ेस्टो.

पिछले पाँच सालों में कौन से वादे पूरे नहीं किए गए उनका ज़िक्र नहीं होता लेकिन अगले में क्या करेंगे उसकी लिस्ट ऐसी होती है मानो सिनेमाघरों के मार्निंग शो में टिकट की लंबी कतार. हर पार्टी का अपना वादा और अपना राग.

लेबर पार्टी का वादा है ब्रिटेन फ़ारवर्ड नॉट बैक.

प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने 112 पन्नों के अपने घोषणापत्र का केंद्रबिंदु एक मज़बूत अर्थव्यवस्था को बनाया है. इसी अर्थव्यवस्था की बदौलत स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा की बात की गई है.

साथ ही प्रधानमंत्री ने कहा कि ये सब सुविधाएं बिना कोई टैक्स बढ़े
बढ़ाए हुए ही मिलेंगी.

माइकल हॉवर्ड
कंज़रवेटिव पार्टी का घोषणापत्र लेकर आए माइकल हॉवर्ड

विपक्षी कंज़रवेटिव पार्टी के नेता माइकल हॉवर्ड ने कहा कि इस तरह के वादे वो पहले भी सुन चुके हैं. तो उनकी पार्टी कौन सी नई बात ला रही है.

कंज़रवेटिव पार्टी का वादा है टाइम फ़ॉर एक्शन यानी बातें बहुत हो लीं अब काम करने का समय है.

पार्टी ने अपना घोषणापत्र सरल रखने की कोशिश की है जिससे मतदाताओं को अपना मन बनाने में दिक्कत नहीं हो.

पहले ही पन्ने पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा गया है साफ़ हस्पताल, अच्छा स्कूल अनुशासन, नियंत्रित आप्रवासन, ज़्यादा पुलिस ऑफ़िसर और कम टैक्स.

यहां की तीसरी बड़ी पार्टी है लिबरल डेमोक्रेट्स पार्टी जिसे कंज़रवेटिव और लेबर के बीच की पार्टी के रूप में देखा जाता है.

चार्ल्स केनेडी
लिबरल डेमोक्रेट के घोषणापत्र के साथ चार्ल्स केनेडी

चार्ल्स केनेडी के नेतृत्व में इस पार्टी ने सही विकल्प का नारा दिया है.

इनका कहना है कि ये वोटरों को गुमराह करने की बजाए पारदर्शिता में विश्वास रखते हैं और इसी नीति पर चलते हुए पार्टी ने अपने मात्र 20 पन्नों के घोषणापत्र में नए टैक्स लगाकर सुविधाओं को बेहतर करने की बात की है.

तो पार्टियों ने चुनावी मुद्दों का एक खाका तो तैयार कर लिया है लेकिन यहां के चुनावों की एक ख़ास बात ये है कि ये चुनाव रैलियों और सभाओं से ज़्यादा टेलिविज़न, रेडियो और अख़बारों के ज़रिए लड़े जाते हैं.

ऐसे में बहस अक्सर घोषणापत्र के पन्नों से बाहर निकलकर भी होती है.

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