| और भी पार्टियाँ हैं चुनाव में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
5 मई को चुनाव हो तो रहा है ब्रिटेन में लेकिन अक्सर आभास ये होता है जैसे चुनाव केवल इंग्लैंड में हो रहा हो. लेकिन असलियत ये है कि ब्रिटेन में इंग्लैंड के अलावा स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड भी हैं और ब्रिटेन की संसद के निचले सदन के लिए चुनाव वहाँ भी हो रहे हैं. ब्रिटेन में सत्ता काफ़ी हद तक केंद्र के हाथों में है यानि भारत की तरह का राज्य और केंद्र वाला संघीय ढांचा नहीं है. लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में ही सही स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में भी सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ है और स्कॉटलैंड में तो कुछ कर उगाही की भी गुंजाईश है. लेकिन सबसे बड़ा प्रांत होने के कारण दबदबा इंग्लैंड का ही रहता है और सरकार उसी की बनती है जिसने इंग्लैंड पर क़ब्ज़ा कर लिया. एक धारणा ये भी है कि ब्रिटेन में केवल तीन पार्टियों यानी लेबर, कंज़रवेटिव और लिबरल डेमोक्रेट्स का ही बोलबाला है. लेकिन ऐसा भी नहीं है. यहाँ कई और दल हैं चुनावी अखाड़े में. ब्रिटेन के चुनावों में ढोल ताशे भले ही नहीं बजते हों, लेकिन भारत की ही तरह यहां भी हर कोने का रंग अलग है. पार्टियाँ इंग्लैंड में मुख्य रूप से तीन राष्ट्रीय पार्टियां हैं- लेबर, कंज़रवेटिव और लिबरल डेमोक्रेट्स. लेकिन स्कॉटलैंड में इन तीनों के अलावा है क्षेत्रीय स्कॉटिश नेशनलिस्ट पार्टी. वहीं वेल्स में भी पहली तीनों पार्टियों के अलावा है राष्ट्रवादी पार्टी प्लाइड कुमरी. उत्तरी आयरलैंड का हिसाब बिल्कुल अलग है. यहाँ कोई भी राष्ट्रीय पार्टी नहीं है. यहाँ दो पार्टियां हैं जो उत्तरी आयरलैंड की स्वतंत्रता के हक में हैं और दो हैं जो ब्रिटेन के साथ रहना चाहती हैं. स्कॉटलैंड
इन चुनावों में स्कॉटलैंड के सीटों की संख्या 72 से घटाकर 59 कर दी गई है. क्योंकि स्कॉटलैंड की जनसंख्या में कमी आई है और सीटों का बंटवारा उसी आधार पर है. दरअसल जनसंख्या की इस कमी के कारण आप्रवासन रोकने की जो राष्ट्रीय पार्टियों की मुहिम है वो उनके स्थानीय उम्मीदवारों को उतनी नहीं जंच रहीं. स्कॉटलैंड के ग्लासगो क्षेत्र से लेबर उम्मीदवार मुहम्मद सरवर कहते हैं,"आप्रवासन को लेकर इंग्लैंड में बावेला मच रहा है मगर स्कॉटलैंड में उनकी संख्या गिर रही है. हमें कामकाजी आप्रवासियों की आवश्यकता है." स्कॉटलैंड की अपनी संसद है और स्थानीय मुद्दों को यहीं निपटाया जाता है और इसका नेतृत्व करता है फ़र्स्ट मिनिस्टर. मगर उनके अनुसार वित्त और सुरक्षा जैसे मामले लंदन के ही हाथ में रहते हैं. स्कॉटलैंड की राष्ट्रवादी पार्टी है स्कॉटिश नेशनलिस्ट पार्टी जिसने हमेशा एक स्वतंत्र स्कॉटलैंड की बात की है. उत्तरी आयरलैंड
वहां उत्तरी आयरलैंड की राजनीति अलग ही है. ये प्रांत पिछले कई दशकों से ब्रितानी शासन से अलग होने के लिए चल रहे आंदोलन के लिए जाना जाता है. यहां 18 सीट हैं जिनमें से चार आयरिश राष्ट्रवादी चरमपंथी संगठन आयरिश रिपब्लिकन आर्मी यानी आईआरए की राजनीतिक इकाई शिन फ़ेन के पास हैं. शिन फ़ेन के सांसद ब्रिटेन की महारानी के प्रति वफ़ादारी की शपथ नहीं लेते और निचले सदन में बैठते भी नहीं. उत्तरी आयरलैंड की असेंबली 2002 में भंग हो गई जब पृथक उत्तरी आयरलैंड की मांग करनेवाली पार्टियों और ब्रितानी शासन के साथ रहनेवाली पार्टियों के बीच सामंजस्य नहीं हो पाया. इसलिए स्थानीय मुद्दों की जवाबदेही भी इन दिनों सांसदों पर ही है. वेल्स वेल्स प्रांत अपनी ख़ूबसूरती के लिए मशहूर है और इस चुनाव में ख़ास बात ये है कि यहां के बड़े मुद्दों पर यहां के सांसदों का कोई ख़ास प्रभाव नहीं होगा. विकेंद्रीकरण के बाद से यहां के कई महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा स्थानीय असेंबली के हाथो में हैं. इन क्षेत्रों में यहाँ इंगलैंड से ज़्यादा खर्च किया जाता है और इसलिए असेंबली का महत्व काफ़ी है. ये ज़रूर है कि इनपर खर्च होनेवाला पैसा लंदन से ही आता है. यहां भी विकेंद्रीकरण के बाद इस नीति के आलोचकों ने कहा कि इससे इस प्रांत के अलग होने की राह और मजबूत होगी लेकिन हुआ उसका उल्टा. बीबीसी के चुनाव विश्लेषक माइकेल डंकन कहते हैं,"यहाँ का राष्ट्रवादी आंदोलन शिथिल पड़ गया है क्योंकि यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था की ख़राब स्थिति के लिए राष्ट्रवादी पार्टी प्लाइड कुमरी को ज़िम्मेदार ठहराया गया." वैसे कहा जाता है कि यहाँ भी कई वोटरों को अभी तक नहीं पता चल पाया है कि उनको प्रभावित करनेवाले कौन से फ़ैसले उनकी असेंबली में होते हैं और कौन से लंदन में. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||