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कांगो में 50 विद्रोही मारे गए
कोंगो में संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक
अफ्रीकी देश कांगो में संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों ने एक अभियान के दौरान पचास से ज़्यादा विद्रोहियों को मारने का दावा किया है.

संयुक्त राष्ट्र उन विद्रोहियों को निरस्त्र करने का अभियान चला रहा है जिनपर आरोप है कि उन्होंने पिछले सप्ताह नौ शांतिरक्षकों को मार दिया था. वे सारे बांग्लादेशी शांतिरक्षक सैनिक थे.

कांगो में संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख कर्नल फ़ाबी तेबेरो का कहना है कि उत्तरी शहर बुनिया से तीस किलोमीटर दूर हुए एक अभियान में पचास से अधिक विद्रोही मारे गए हैं.

कर्नल फ़ाबी तेबेरो का कहना है वे विद्रोहियों को शांतिपूर्वक निरस्त्र करना चाहते थे लेकिन भारी संघर्ष में उलझ गए.

उन्होंने बताया कि इस अभियान में शामिल पाकिस्तानी सैनिकों की जवाबी कार्रवाई में पचास विद्रोही मारे गए लेकिन कई अन्य भाग निकले.

संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि पिछले सप्ताह हुई बंग्लादेशी शांति रक्षक सैनिकों की हत्या के लिए 'एफ़ एन आई' से संबधित ये विद्रोही ज़िम्मेदार हैं. संयुक्त राष्ट्र उन्हें निरस्त्र करने का प्रयास कर रहा है लेकिन अब भी अनुमानित पंद्रह हज़ार विद्रोही इतूरी के इलाक़े में घूम रहे हैं जहाँ कांगो की सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है.

इस हिंसा की वजह से वहाँ के विस्थापित नागरिकों को सुयंक्त राष्ट्र की मदद भी नहीं पहुँच पा रही है.

कांगो के रक्षा मंत्री एडोल्फ़ी ओनुसुंबा ने कहा है कि वह बांग्लादेशी शांति रक्षक सैनिकों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार लोगों से ज़रूर निबटेंगे.

"हम इस पर सहमत हैं कि यह फिर नहीं होना चाहिए और इसलिए हम एकजुट होकर काम करेंगे और उस घटना में शामिल किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को ग़िरफ़्तार करेंगे. "

उधर बांग्लादेश की राजधानी ढाका में बीबीसी संवाददाता का कहना है कि कांगो में मारे गए बांग्लादेश सैनिकों के शव बुधवार को वापस लाए गए. इस मौक़े पर बांग्लादेश में राष्ट्रीय शोक मनाया गया.

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया शवों को लाने के मौक़े पर हवाई अड्डे पर ख़ुद मौजूद थीं. इन सैनिकों को नायकों सा सम्मान दिया जा रहा है जिन्होंने विश्व शांति के प्रयास में अपनी जान गँवाई है.

क़रीब आठ हज़ार बांग्लादेशी सैनिक बारह देशों में शांति रक्षक के रूप में तैनात हैं और पाकिस्तानी शांति सैनिकों के साथ मिलकर दुनिया के एक तिहाई शांतिबल का हिस्सा हैं.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इसके पीछे एक कारण धन का लालच भी है. संयुक्त राष्ट्र के अभियानों से सेना को लाखों डॉलर की आमदनी होती है और एक ग़रीब देश को दुनिया में अपनी भूमिका निभाने का मौका भी मिलता है.

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