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मंगलवार, 28 सितंबर, 2004 को 00:50 GMT तक के समाचार
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'इराक़ में चुनाव करवाना असंभव होगा'
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'इराक़ में सुरक्षा स्थिति सुधारे बिना चुनाव हुए तो विद्रोहियों को ही लाभ होगा'
जॉर्डन के शाह अब्दुल्ला ने कहा है कि इराक़ में अराजकता की स्थिति को देखते हुए वहाँ जनवरी में चुनाव करवाना असंभव होगा.

उन्होंने फ्रांस के अख़बार - फ़िगारो को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि यदि इराक़ में सुरक्षा स्थिति को सुधारे बिना चुनाव करवाए जाते हैं तो केवल विद्रोहियों को ही लाभ होगा.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि शाह अब्दुल्ला को अमरीका मध्यपूर्व में अपना महत्वपूर्ण दोस्त मानता है लेकिन उन्होंने इस विषय में बहुत ही सीधी और स्पष्ट बात की है.

अमरीकी और इराक़ी नेताओं ने ज़ोर देकर कहा है कि चुनाव जनवरी में ही होंगे चाहे उन्होंने ऐसे संकेत भी दिए हैं कि हो सकता है चुनाव देश के हर भाग में न हो सकें.

'अमरीकी सेना की वापसी'

जॉर्डन के शाह अब्दुल्ला इराक़ की स्थिती पर विचार विमर्श करने के लिए इन दिनों फ़्रांस में हैं.

फ़्रांस के विदेश मंत्री बारनिए
फ़्रांस ने शर्त लगाई की अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अमरीका के सानिकों की वापसी पर भी चर्चा हो

फ़्रांस की सरकार भी इराक़ की स्थिती को काफ़ी चिंताजनक मानती है.

फ़्रांस के विदेश मंत्री माइकल बारनिए ने अमरीका के उस प्रस्ताव का समर्थन किया है जिसमें इराक़ पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाए जाने की बात कही गई है.

लेकिन उन्होंने शर्त लगाई है कि इराक़ से अमरीकी सेनाओं की वापसी उस सम्मेलन के ऐजेंडे में शामिल हो और इराक़ियों को अपना भविष्य ख़ुद तय करने का मौक़ा मिले.

फ़्रांस का तो यहाँ तक कहना है कि इराक़ के जो राजनीतिक दल हथियारबंद विद्रोह कर रहे हैं उन्हें भी इस सम्मेलन में बुलाया जाना चाहिए.

'सद्दाम के सैनिक वापस लो'

उधर शाह अब्दुल्ला का कहना था कि इराक़ की मौजूदा स्थिती में चुनावों के दौरान सबसे ज़्यादा संगठित चरमपंथी होंगें और चुनावों पर उनका असर दिखेगा.

उनका कहना था कि ऐसी स्थिती में वहाँ हालात बेहतर होने की कोई उम्मीद नहीं है.

शाह अब्दुल्ला का कहना था कि इराक़ की गली-गली में अफ़रातफ़री का माहौल है और रोज़ाना सीमापार से घुसपैठ हो रही है और उन लोगों पर क़ाबू पाना मुश्किल हो रहा है.

उन्होंने सुझाव दिया है कि इराक़ी सेना में उन पूर्व सैनिकों को वापस लेना चाहिए जो सद्दाम हुसैन की सेना में शामिल थे.

शाह अब्दुल्ला का कहना था कि केवल पूर्व सैनिक ही वहाँ क़ानून व्यवस्था क़ायम कर सकते हैं.

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