|
भारतीय मदद से ब्रितानी रेल पटरी पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अँगरेज़ों ने भले ही 1853 में भारत में पहली बार रेल चलाई हो और उसके बाद देश भर में पटरियाँ बिछाई हों लेकिन अब ब्रिटेन में रेलवे सिग्नलों को ठीक करने के लिए उन्हें भारत की मदद लेनी पड़ी है. भारत से आए बारह रेलवे इंजीनियर ब्रिटेन पहुँचे हैं और लगभग सौ वर्ष पुरानी सिग्नल प्रणाली को ठीक करने में लगे हुए हैं. भारत में आज भी कई स्थानों पर यही सिग्नल प्रणाली चलती है इसलिए इन इंजीनियरों को इसका ख़ासा अनुभव है. यह काम पिछले तीन सप्ताह से इंग्लैंड के शहर मैनचेस्टर और उसके आसपास चल रहा है और अब ख़त्म होने वाला है, यह वही लाइन है जो लंदन को पश्चिम-उत्तर ब्रिटेन से जोड़ती है. भारत से आए बारहों इंजीनियर अपने काम के माहिर हैं और रेलवे के मैकेनिकल इंजीनियर हैं, उनके ज़िम्मे लोहे के सरिए और स्प्रिंग से चलने वाले पुराने सिग्नलों को दुरूस्त करने के काम की निगरानी करना है. पहले तय किया गया था कि इन पुराने सिग्नलों की जगह सुपर बॉक्स नाम के आधुनिक सिग्नल लगाए जाएँगे लेकिन बाद में पता चला कि नए सिग्नल एक सेक्शन में काम नहीं कर रहे इसलिए पुरानी व्यवस्था की ओर लौटना पड़ा. ब्रिटेन में रेल लाइनों की देखभाल करने वाली कंपनी नेटवर्क रेल ने कहा है कि इन लोगों को इसलिए बुलाना पड़ा क्योंकि काम समय पर ख़त्म करना था. नेटवर्क रेल का कहना था, "हमें इस काम के लिए सबसे योग्य लोगों की तलाश थी और भारत के लोग इस मामले में बेहतरीन साबित हुए." भारत का रेलवे नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्कों में है और भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा यातायात के लिए रेल पर ही निर्भर करता है. इस तरह के कामों के लिए ब्रिटेन का विदेश से लोगों को बुलाना कोई नई बात नहीं है, ब्रिटेन के अस्पतालों में तीस प्रतिशत से अधिक मेडिकल कर्मचारी दक्षिण एशियाई देशों से आते हैं जिनमें भारतीय डॉक्टरों और नर्सों की भारी तादाद है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||