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जॉर्डन के प्रस्ताव पर ठंडी प्रतिक्रिया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ में सैनिक भेजने केजॉर्डन के शाह अब्दुल्ला के प्रस्ताव पर इराक़ की ओर से ठंडी प्रतिक्रिया आई है. इराक़ के विदेश उपमंत्री हामिद अल बयाती ने बीबीसी से बातचीत में संभावना ज़ाहिर की कि इराक़ ये प्रस्ताव ठुकरा देगा. मगर उन्होंने ये ज़रूर बताया कि इराक़ के प्रधानमंत्री ईयाद अलावी ने मिस्र, बहरीन और ओमान को सैनिक भेजने के लिए पत्र लिखा है. इससे पहले जॉर्डन के शाह अब्दुल्ला ने कहा था कि यदि इराक़ की नई अंतरिम सरकार ने कहा तो उनका देश अपने सैनिक इराक़ भेजने पर विचार कर सकता है. इस तरह जॉर्डन इराक़ में सैनिक भेजने वाला पहला अरब राष्ट्र होता. 'इराक़ से लगी सीमाएँ' इस प्रस्ताव पर अल-बयाती का कहना था कि इराक़ के ऐसे पड़ोसी देशों से सेनाएँ लेने की संभावना कम ही है जिनकी सीमाएँ इराक़ के साथ लगी हों. उनका कहना था कि ऐसे देशों से सेनाएँ लेने पर सुरक्षा की स्थिति में और मुश्किलें आ सकती हैं.
इस बीच अमरीका ने अब्दुल्ला के बयान का स्वागत किया है. अमरीका का कहना था कि इससे नए इराक़ी शासन के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ता दिख रहा है. प्रस्ताव रखते हुए शाह अब्दुल्ला ने कहा था कि सैनिक भेजने के बारे में उनकी इराक़ी अधिकारियों से बात नहीं हुई है, लेकिन वह इराक़ को हर तरह से मदद देने को तैयार हैं. बीबीसी के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, "यदि इराक़ी हमसे सहायता माँगता है तो इनकार करना हमारे लिए आसान नहीं होगा." इराक़ की अंतरिम सरकार के नेतृत्व की सराहना करते हुए उन्होंने कहा, " सुरक्षा की समस्या उनके लिए एक बड़ी चुनौती होगी, और उन्हें हर किसी की सहायता की ज़रूरत होगी." अब्दुल्ला ने कहा, "राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को मेरा यही संदेश है कि आप हमें बताएँ कि क्या चाहते हैं और हम क्या कर सकते हैं, और हमारा 110 प्रतिशत सहयोग मिलेगा." मंशा इराक़ में मुसलिम देशों की सेना भेजने पर विचार कुछ समय से हो रहा है. इसके पीछे मंशा ये थी कि इन देशों की सेनाएँ इराक़ के लोगों की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था को बेहतर जानते और समझते हैं इसीलिए वे वहाँ की स्थिति को बेहतर तरीके से संभाल पाएँगे. बीबीसी के अरब मामलों के विश्लेषक मग्दी अब्दुलहादी का कहना है कि जब पहली बार ये बात कही गई तो उसका विरोध इराक़ की शासकीय परिषद ने ही किया. उनका मानना था कि दूसरे देश इराक़ में अगर अपनी सेना भेजेंगे तो वे अपने हित साधने की कोशिश करेंगे. मसलन, इराक़ी परिषद का मानना था कि अगर तुर्क सेना वहाँ आई तो वो कुर्दों के साथ दुर्व्यवहार कर सकते हैं जिनकी स्वायत्तता की माँग को तुर्की ने कभी पसंद नहीं किया. दूसरी ओर, अरब देशों के शासकों को ये डर भी था कि अगर उन्होंने युद्ध के बाद अपनी सेना इराक़ में भेजी तो उन्हें युद्ध समर्थक के रूप में देखा जाएगा. बीबीसी संवाददाता मैथ्यू कोलिंस कहते हैं कि शाह अब्दुल्ला का प्रस्ताव अमरीका के लिए कुछ राहत ज़रूर लाए हैं कि अरब मूल का कम से कम एक देश नई इराक़ी सरकार की मदद के लिए आगे आया है. साथ ही जॉर्डन के शाह ने अमरीका को एक चेतावनी भी दी. शाह अब्दुल्ला ने कहा कि अमरीका को मध्यपूर्व में तब तक एक शांतिदूत के रूप में नहीं देखा जाएगा जब तक कि वह इसराइल और फ़लस्तीन के मसले को हल नहीं करता. |
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