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शुक्रवार, 11 जून, 2004 को 20:09 GMT तक के समाचार
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पश्चिम यूरोप का सबसे बड़ा इस्लामी केंद्र

इस्लामी सामुदायिक केंद्र
लंदन के पूर्वी हिस्से में स्थित मस्जिद से लगा हुआ है इस्लामी सामुदायिक केंद्र
मुसलमानों को चरमपंथ से जोड़कर यूरोपीय और पश्चिमी समाज में जो धारणाएँ हैं उसे दूर करने की कोशिश में लंदन में पश्चिमी यूरोप का सबसे बड़ा इस्लामी सामुदायिक केंद्र खुला है.

मुसलमानों के पवित्र काबा की मस्जिद के इमाम शेख़ अब्दुर्रहमान अस्सदीस ने शुक्रवार को इसका उदघाटन किया.

ख़ुतबे में उनका संदेश साफ़ था कि मुसलमानों को समाज के दूसरे तबकों के साथ मिलकर इस्लाम की सही तस्वीर सामने रखनी चाहिए और अगर कोई ग़लतफ़हमी है तो उसे दूर किया जाना चाहिए.

लगभग चालीस लाख पाउंड यानी तीस करोड़ रुपए की लागत से बना ये केंद्र इस क्षेत्र की मशहूर मस्जिद 'ईस्ट लंडन मॉस्क' से जुड़ा हुआ है.

ये सारा पैसा लोगों के सहयोग से इकट्ठा किया गया है क्योंकि बैंक से पैसा लेने पर ब्याज देना पड़ता और ये इस्लाम में हराम है.

अली
अली चाहते हैं कि लोगों के मन में मुसलमानों को लेकर जो ग़लत धारणाएँ हैं वे बदलें

लगभग दस हज़ार लोग इस जगह एक साथ नमाज़ अदा कर सकते हैं और केंद्र की छह मंज़िला इमारत में पुस्तकालय और सभागार के साथ ही एक जिम्नेज़ियम भी है.

केंद्र देखने के बाद सहज ही सवाल उठता है कि आख़िर क्या मक़सद है इस केंद्र को बनाने का?

केंद्र के मीडिया मामलों के प्रभारी बक़ाउल्लाह इस बारे में कहते हैं कि इससे महिलाओं, युवाओं और बच्चों को विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षित किया जाएगा.

वह कहते हैं कि ये केंद्र अनेक संस्कृतियों का मेल कराने वाले शहर लंदन की इस छवि के अनुकूल ही होगा.

इस केंद्र में महिलाओं और युवाओं की रुचियों की कई चीज़ें तो होंगी ही बच्चों के प्रशिक्षण और सूचना प्रौद्योगिकी जैसी सुविधाएँ भी मुहैया कराई जाएँगी.

नमाज़
इस मस्जिद में लगभग दस हज़ार लोग नमाज़ पढ़ सकते हैं

समुदाय के लोगों का आर्थिक विकास कैसे हो और धार्मिक या सामाजिक स्तर पर कैसे आगे बढ़ा जाए ये सब इस केंद्र के निर्माण के मक़सद हैं.

फिर इलाक़े के मुसलमान इस बात से ख़ुश भी हैं. उन्हें लगता है कि इससे मुसलमानों की छवि आम लोगों के मन में सुधरेगी.

कार्यक्रम में आए ऐसे ही एक मुसलमान अली कहते हैं, " आम लोग इससे समझेंगे कि मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं. वह भी दूसरों की तरह हैं और प्यार-मोहब्बत से लोगों के साथ मिलकर रहना चाहते हैं."

बात सिर्फ़ इस धारणा को ही बदलने की नहीं हैं हर मुसलमान का चरमपंथ से लेना-देना नहीं है बल्कि मुसलमानों में जो वर्ग अशिक्षित हैं वे भी इस केंद्र को उम्मीद की टकटकी लगाए देख रहे हैं.

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