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'मानवाधिकारों का उल्लंघन' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लंदन स्थित मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा है कि 2003 में भी मानवाधिकार का एजेंडा अमरीका में 11 सितम्बर 2000 को हुई घटनाओं से ही प्रभावित रहा और विश्व सुरक्षा के नाम पर मनमाने ढंग से मानवाधिकारों को निशाना बनाया जाता रहा. एमनेस्टी इंटरनेशनल की महासचिव आयरिन ख़ान अमरीका द्वारा इस इस ऐजेंडे को बढ़ावा की नीति को सिद्वांतों का त्याग और दिशाहीनता मानती हैं. उन्होंने कहा, “मैं जब पीछे मुड़कर 12 महीनों को देखती हूँ तो लगता है कि ये दरअसल दुनिया के मूल्यों के ख़िलाफ़ जंग है. एक तरफ़ ये जंग कुछ ऐसे हथियारबंद धड़ों द्वारा लड़ी जा रही है जो आम लोगों पर हमला करने और मानवता के ख़िलाफ़ किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं, और दूसरी तरफ़ हम देखते हैं कि कुछ ऐसी सरकारें हैं जो विश्व सिद्वांतों और मानवाधिकारों का हनन करने के लिए वैसा ही उत्साह दिखाती है. इन दोनों पाटों के बीच आम आदमी पिस रहा है और उसकी जान और मानवाधिकारों का हनन हो रहा है.” रिपोर्ट में भारत और पाकिस्तान सहित दक्षिण एशियाई देशों में मानवाधिकारों की स्थिति पर खुल कर टिप्पणी की गई है. दक्षिण एशियाई देशों पर की गई टिप्पणियों के अंश - भारत सशस्त्र राजनीतिक गुटों के ख़िलाफ़ आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के नाम पर मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर बड़ी चिंताएँ रहीं. महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों जैसे कमज़ोर समूहों के ख़िलाफ़ संस्थागत तरीक़े से भेदभाव किया जाता रहा. गुजरात सरकार के सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों को दंडित नहीं करने को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं. हिंसा के गवाहों और मानवाधिकारवादियों को धमकियाँ दी जाती रहीं. राज्य की न्याय व्यवस्था को लेकर भी चिंताएँ हैं. पाकिस्तान साल की दूसरी छमाही में सिंध और बलूचिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा में भारी तेज़ी आई. अमरीका की 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई' के नाम पर सैंकड़ो लोगों को हिरासत में रखा गया. सरकार अब भी महिलाओं, बच्चों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को नज़रअंदाज कर रही है. बच्चों को जंज़ीरों में बाँध कर जजों के सामने लाया जाता है. ऐसे जज जिन्हें उनके मुकद्दमे की सुनवाई करने का अधिकार भी नहीं है. उनमें से कइयों को अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के ख़िलाफ़ मौत की सजा सुनाई गई. नेपाल सरकार और माओवादी विद्रोहियों के बीच शांति वार्ताएँ टूटने के बाद मनमाने ढंग से गिरफ़्तारी, लोगों के ग़ायब हो जाने, बिना न्यायिक सुनवाई के लोगों को मारने और सुरक्षा बलों के अत्याचार की घटनाएँ बढ़ी हैं. जबकि सात महीने तक चले युद्धविराम के दौरान मानवाधिकारों की स्थिति सुधरी थी. शांति वार्ताओं के टूटने क पीछे दोनों पक्षों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन की भूमिका रही है. बांग्लादेश सुरक्षाकर्मियों के हाथों उत्पीड़न की घटनाएँ आम रहीं. पुलिस हिरासत में कम से कम 13 लोगों की मौत हुई. पुलिस ने ज़रूरत से ज़्यादा बल प्रयोग किया. अल्पसंख्यक हिंदुओं और अहमदिया समुदाय के लोगों पर हमले हुए. श्रीलंका सरकार और तमिल छापामारों के बीच युद्धविराम और शांति वार्ताओं के कारण मानवाधिकारों की स्थिति सुधरी. हालाँकि युद्धविराम की शर्तों का उल्लंघन कर कई हत्याएँ की गईं और अपहरण किए गए. पुलिस हिरासत में उत्पीड़न के मामले आते रहे, हालांकि इससे निपटने के लिए कार्रवाई की घोषणा हुई. भूटान नेपाल में एक दशक से ज़्यादा समय से रह रहे भूटान के एक लाख से ज़्यादा शरणार्थियों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ है. मालदीव सरकार का शांतिपूर्ण विरोध करने वालों का दमन जारी रहा. लेकिन न्याय व्यवस्था की कमियों को थोड़ा सुधारा गया. |
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