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रविवार, 09 मई, 2004 को 10:09 GMT तक के समाचार
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सदियों पुरानी समस्या है चेचन्या की
चेचन्या का नक्शा
चेचन्या का अधिकतर हिस्सा रूस से घिरा है
चेचन्या रूस के दक्षिणी हिस्से में स्थित गणराज्य है जो मुख्यतः रूस से घिरा है. मगर इसका कुछ हिस्सा पड़ोसी देश जॉर्जिया को भी छूता है.

एक समय में चेचन्या अपनी तेल संपदा, अपनी अर्थव्यवस्था और अपने बुनियादी ढांचे के कारण एक संपन्न क्षेत्र माना जाता था मगर स्थानीय अलगाववादियों और रूसी सैनिकों के बीच बरसों से जारी लड़ाई ने चेचन्या को बर्बाद सा कर दिया है.

ऐतिहासिक तौर पर चेचन्या पिछले लगभग 200 साल से रूस के लिए मुश्किल बना हुआ है.

रूस ने लंबे और रक्तरंजित अभियान के बाद 1858 में चेचन्या में इमाम शमील के विद्रोह को कुचला.

महान रूसी लेखक लेव तोल्स्तोय और लर्मोंतौफ़ 19वीं शताब्दी के उन लेखकों में आते हैं जिन्होंने अपनी कृतियों में इस विद्रोह की चर्चा की है.

चूहे बिल्ली का खेल

रूसी सुरक्षाबल
रूस को चेचन्या पर अधिकार बनाए रखने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ी है

पहले विद्रोह की आग के ठंढी पड़ने के लगभग 60 साल बाद जब रूस में क्रांति हुई तो चेचन फिर रूस से अलग हो गए.

पर ये आज़ादी कुछ ही समय तक बनी रही और 1922 में रूस ने फिर चेचन्या पर अधिकार कर लिया.

दूसरे महायुद्ध के वक़्त चेचन फिर रूस से अलग हो गए.

रूस को ये अच्छा नहीं लगा और लड़ाई थमते ही रूसी नेता स्टालिन ने चेचन अलगाववादियों पर दुश्मनों से सहयोग का आरोप लगाकर उन्हें साइबेरिया और मध्य एशियाई क्षेत्रों में निर्वासित कर दिया.

1957 मे ख्रूश्चेव सत्ता में आए और इसके बाद ही चेचन अलगाववादी वापस आ पाए.

सोवियत विघटन के बाद

1991 में सोवियत संघ टूटा और इसके बाद फिर चेचन्या की आज़ादी का मुद्दा उठा.

सोवियत विघटन के तुरंत बाद सोवियत वायु सेना में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके दूदायेव ने रूस से अलग होने की घोषणा कर दी.

राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने अपने सैकड़ों अफ़सरों को फ़ौरन ग्रोज़्नी भेजा मगर चेचन विद्रोहियों ने उन्हें हवाई अड्डे से ही बसों में बिठाकर लौटा दिया.

इसके बाद तीन साल तक विद्रोहियों का हौसला बढ़ता गया. दूदायेव रूस का और उग्र विरोध करने लगे और उधर रूस सरकार इस बात पर विचार करती रही कि हालात को कैसे संभाला जाए.

शांति समझौता

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1997 में चेचन विद्रोही अस्लान मस्खादौफ़ को चेचन्या का राष्ट्रपति चुना गया

1994 में रूस ने वहाँ सेना भेजी मगर चेचेन लोगों ने ज़ोरदार विरोध किया जिसमें दोनों तरफ़ के लोग भारी संख्या में मारे गए.

रूसी सैनिकों की मौत होने के बाद सरकार पर दबाव बढ़ा और उन्हें 1996 में विद्रोहियों के साथ शांति समझौता करना पड़ा.

समझौते के तहत चेचन्या को स्वायत्तता दी गई मगर पूरी आज़ादी नहीं मिली.

1997 में चेचन सेना के प्रमुख जनरल अस्लान मस्खादौफ़ को राष्ट्रपति चुना गया.

मगर मस्खादौफ़ चेचन्या के बर्बर सरदारों को नियंत्रित नहीं कर सके और वहाँ अपराध और अपहरण बढ़ता गया.

अगस्त 1999 में चेचन विद्रोही पड़ोसी रूसी गणराज्य दागेस्तान चले गए और वहाँ एक मुस्लिम गुट के अलग राष्ट्र की घोषणा का समर्थन कर दिया जो कि चेचन्या और दागेस्तान के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर बनाया जा रहा था.

लेकिन तब तक रूस में व्लादीमिर पुतिन प्रधानमंत्री बन चुके थे और उनकी सरकार ने सख़्ती दिखानी शुरू कर दी.

जनमत संग्रह

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अख़मद कदिरौफ़ 2003 में विवादास्पद चुनाव के बाद राष्ट्रपति बने

पुतिन सरकार ने मार्च 2003 में एक विवादास्पद जनमत संग्रह करवाया.

इसके तहत चेचन्या के लिए नए संविधान को मंज़ूरी दी गई और चेचन्या को और स्वायत्तता दी गई.

मगर ये स्पष्ट कर दिया गया कि चेचन्या रूस का हिस्सा है.

अक्तूबर 2003 में चेचन्या में राष्ट्रपति पद के लिए भी विवादास्पद चुनाव हुए और अख़मद कदिरौफ़ की इसमें एकतरफ़ा जीत हुई.

अस्लान मस्खादौफ़ को चुनाव में खड़ा नहीं होने दिया गया.

कदिरौफ़ को रूस समर्थक माना जाता रहा है और जीत के बाद उन्होंने वादा किया था कि वे आतंकवाद को ख़त्म कर देंगे.

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