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बचपन में माँ बनना ख़तरनाक है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया भर में हर साल जिन बच्चों की मौत होती है उनमें से लगभग दस लाख बच्चों की माँ ख़ुद बच्चियाँ होती हैं. मानवतावादी गुट सेव दी चिल्ड्रेन की एक नई रिपोर्ट में दुनिया के सौ से ज़्यादा देशों से आँकड़े जुटाए गए हैं जिनसे पता चलता है कि कई माओं की उम्र दस से 19 वर्ष के बीच है. रिपोर्ट में कहा गया है कि किशोरी माताओं को गर्भधारण और प्रसव के दौरान वयस्क माँओं के मुक़ाबले कहीं अधिक ख़तरे का सामना करना पड़ता है. प्रसव के दौरान इन बच्चियों को मौत का दुगना ख़तरा रहता है जबकि चौदह साल से कम की उम्र में माँ बनने पर यह ख़तरा पाँच गुना बढ़ जाता है. संस्था ने पाया कि बांग्लादेश, माली, नाइजर और नाइजीरिया में पंद्रह साल की लड़कियों में से दस प्रतिशत या तो गर्भवती हैं या बच्चे को जन्म दे चुकी हैं. पश्चिम में अमरीका आगे पश्चिम में यह प्रवृत्ति अमरीका में सबसे ज़्यादा देखने में आई है.. यह अनुपात जापान और नीदरलैंड्स के मुक़ाबले दस गुना ज़्यादा है. किशोरी माँओं के बच्चों के समय से पूर्व जन्म लेने की संभावनाएँ भी बहुत ज़्यादा हैं. संस्था का कहना है कि इस समस्या से निबटने का सबसे अच्छा तरीक़ा शिक्षा है. नाइजीरिया में जो लड़कियाँ कभी स्कूल नहीं गई थीं, उनमें गर्भधारण के मामले पढ़ी-लिखी लड़कियों से छह गुना ज़्यादा देखे गए.. सेव दी चिल्ड़्रेन ने किशोरावस्था की लड़कियों के स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दिए जाने और परिवार नियोजन की जानकारी सबको उपलब्ध कराए जाने पर भी ज़ोर दिया है. |
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